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BLOG: कांग्रेस के लिए बड़ी कठिन है राह 2019 की

दिल्ली में कांग्रेस का 84वां अधिवेशन नये अध्यक्ष राहुल गांधी की जोरदार दहाड़ के साथ संपन्न हो गया. कांग्रेस ने 2019 के आम चुनावों को असरदार ढंग से लड़ने की मंशा जाहिर की लेकिन यह भी साफ कर दिया कि गठबंधन की राजनीति के लिए वह पूरी तरह से तैयार है. ऐसे संकेतों से कांग्रेस ने स्वीकार लिया कि अगले लोक सभा चुनावों में वह मोदी का अकेले सामना नहीं कर सकती. अधिवेशन में राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं से मजाक ही मजाक में कांग्रेस के भयंकर सच को साझा किया. उनका कहना था कि कांग्रेस कार्यकर्ता को अब लड़ना है और आपस की लड़ाई को कुछ महीनों के लिए हाशिए पर छोड़ देना है. सोनिया गांधी ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं से अहम और महत्वाकांक्षा को त्यागने की अपील की. इससे पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी कहा कि कांग्रेस को कोई दूसरा नहीं हराता बल्कि कांग्रेस को कांग्रेसी ही हराता है. अधिवेशन में मोदी और बीजेपी पर जमकर प्रहार किए गये. सत्तापक्ष पर चोट करके ही विपक्षी दल सत्ता में आ सकता है, इस लिहाज से ये हमले जरुरी भी थे. बीजेपी भी विपक्ष में रहते हुए ऐसा ही करती रही है लेकिन सवाल यह भी उठता है कि पांडव और कौरवों की लड़ाई में पांडवों जैसा शासन देने की रुपरेखा क्यों सामने नहीं रखी गयी.

कुल मिलाकर अधिवेशन ऐसे समय हुआ जब कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. उसके पास एक बड़ा राज्य कर्नाटक ही बचा है जहां अगले दो महीनों में चुनाव होना है. इसके आलावा तीन छोटे राज्य हैं. लोकसभा में उसके पास सिर्फ 48 सांसद हैं और राज्यसभा में भी उसके सांसदों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. वह एक एक करके चुनाव हारती जा रही है. मेघालय में सबसे ज्यादा सीटें पाकर सरकार नहीं बना सकी. यही हाल मणिपुर और गोवा का भी रहा. राहुल गांधी पर संजीदा नहीं होने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में सोनिया राहुल के लिए जरुरी था कि कार्यकर्ताओं में जोश भरा जा सके. उसमें यह विश्वास पैदा किया जा सके कि कांग्रेस ने मैदान छोड़ा नहीं है. वह रेस में है और विपक्षी दलों में सबसे आगे है. एक कांग्रेस नेता के लिए नेहरु गांधी परिवार का साया इसलिए जरुरी होता है क्योंकि यह साया चुनाव जितवाता है, वोट दिलाता है. अब अगर कांग्रेस नेताओं को लगने लगे कि नेहरु गांधी परिवार के पास चुनाव जिताने की कुव्वत नहीं बची है तो वह उसी तरह कट लेगा जिस तरह यूपी, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर पूर्व के राज्यों से दिग्गज कांग्रेस नेता कटे और बीजेपी में शामिल हो गए. अधिवेशन में सोनिया राहुल ने भरोसा दिलाने की कोशिश की कि कांग्रेस में बहुत जान बाकी है. इस हिसाब से इस अधिवेशन को कामयाब अधिवेशन कहा जा सकता है .

कांग्रेस में राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद से ही बुजुर्ग नेता बनाम बाबा ब्रिगेड के नेताओं की जंग छिड़ गई थी. इसका खामियाजा भी कांग्रेस को कुछ राज्यों में हुआ जहां बड़े नेता उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कांग्रेस से अलग हो गए. हरियाणा का यहां विशेष रुप से नाम लिया जा सकता है. कांग्रेस अघ्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने इसे साफ करने की कोशिश नहीं की. कुछ दिन पहले इंडिया टुडे के सम्मेलन में सोनिया गांधी ने कहा था कि राहुल गांधी युवा वर्ग को आगे लाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जब तक युवा कांग्रेस के साथ नहीं जुड़ेगा तब तक कांग्रेस मजबूत नहीं हो सकेगी. सोनिया ने तब कहा था कि राहुल गांधी युवा के साथ साथ पुराने नेताओं को भी साथ लेकर चलना चाहते हैं. कांग्रेस अधिवेशन में राहुल गांधी ने अपने शुरुआती चार मिनट के भाषण में ही साफ कर दिया था कि वह युवा के साथ साथ बुजुर्ग नेताओं को भी साथ लेकर चलना चाहते हैं. इससे साफ हो गया है कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी में कुछ नया नहीं होने वाला है. अन्य समितियों में भी बुजुर्ग नेताओं की कुर्सी बची रहेगी. इससे यह भी साफ हो गया कि कम से कम अगले लोकसभा चुनावों तक राहुल गांधी कांग्रेस संगठन में बहुत बड़े बदलाव करने वाले नहीं है. वैसे दिलचस्प बात है कि अधिवेशन का वेदवाक्य था ....अब बदलाव का वक्त है. संकट के दौर से गुजर रही कांग्रेस को देखते हुए राहुल गांधी के लिए राहत की बात है कि उन्होंने अपनी तरफ से युवा बनाम अनुभव के झगड़े का निपटारा कर एक बड़े विवाद से खुद को बचा लिया है . यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता का प्रतीक है और कहा जा रहा है कि ऐसी राय किसी बुजुर्ग नेता ने ही राहुल गांधी को दी होगी .

पिछले कुछ समय में भारत में राजनीति बहुत आक्रामक हुई है. अब व्यक्तिगत हमले तेज हुए हैं. कांग्रेस यहां बैकफुट पर नजर आती थी लेकिन अधिवेशन में पहले सोनिया और फिर राहुल ने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर निजी हमले कर साफ कर दिया है वह खुलकर खेलने को तैयार है. सोनिया ने मोदी को तानाशाह बता दिया .राहुल ने अमित शाह को हत्यारा करार दिया . राजनीति में कोई वक्त था जब ऐसे हमले सिर्फ चुनावों की गरमागरमी में ही हुआ करते थे लेकिन अब रोज ही ऐसे बयान आ रहे हैं . स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है लेकिन जब देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने तय कर लिया है कि ऐसा ही होना है तो तय है कि अगले लोकसभा चुनावों तक ऐसा ही चलेगा. लेकिन कांग्रेस को समझना होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निजी लोकप्रियता में कमी भले ही आई हो लेकिन आज भी उनका कद बहुत बड़ा है . आज भी लोग मोदी के प्रति आदरभाव रखते हैं और मानकर चलते हैं कि वह ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं . ऐसे में मोदी पर बिना किसी सबूत के आरोप लगाना कांग्रेस पर भारी भी पड़ सकता है . वैसे भी बीजेपी तो यही चाहती है कि अगला चुनाव मोदी बनाम राहुल हो जाए . ऐसा होने पर सरकरा का पांच साल का काम पीछे रह जायेगा और यह बीजेपी के फायदे में होगा . राहुल और सोनिया की मजबूरी है कि अपने कार्यकर्ता में जोश पैदा करने के लिए उन्हें मोदी और शाह को निशाने पर लेना है लेकिन उनके लिए यह भी देश की जनता को बताना जरुरी है कि सत्ता में आने पर उनकी किसानों बेरोजगारों को लेकर क्या नीति रणनीति होने वाली है .

हमारे यहां विपक्ष का काम सरकार को कोसना होता है . कांग्रेस यही काम कर रही है . पहले विपक्ष में रहते हुए बीजेपी भी यही राग अलापा करती थी . लेकिन बदल गया है वक्त . चूंकि मोदी और अमित शाह चौबीसों घंटे चुनावी राजनीति करते हैं और पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर चुनाव जीतना चाहते हैं तो ऐसे में उनका मुकाबला सिर्फ गाली देने से नहीं किया जा सकता . बयान देने से ही अब काम नहीं चलेगा . उदाहरण के लिए , देश में इस समय किसानों की आंदोलन चरम पर हैं . किसान परेशान हैं . आत्महत्या कर रहे हैं . मोदी सरकार ने उन्हें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के हिसाब से फसल के दाम देने की घोषणा की है लेकिन खुद किसान ही सरकार का फार्मूले पर सवाल उठा रहे हैं . ऐसे में कांग्रेस के अधिवेशन में किसानों पर बड़ी बात तो हुई लेकिन किसानों के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता नजर नहीं आया . राजस्थान में शेखावाटी इलाके में किसानों ने आंदोलन किया तो उसके साथ वाम दल नजर आए . सीपीएम के नेता जुड़े . वहां कांग्रेस कहीं नजर नहीं आई . सीपीएम जैसी पार्टी ने ( जिसका एक भी विधायक नहीं है ) वसुंधरा राजे सरकार को मजबूर किया और पचास हजार रुपये तक के कर्ज माफ करने का उसे ऐलान करना पड़ा . कांग्रेस की तरफ से सिर्फ बयान भर आया . इसी तरह महाराष्ट्र में तीस हजार किसान नासिक से मुम्बई तक पैदल आए . इनके साथ लाल झंडे नजर आए . लेकिन कांग्रेस का झंडा कहीं नहीं दिखा . शिवसेना तक ने किसानों के लिए चायपानी की व्यवस्था की लेकिन कांग्रेस का यहां भी बयान ही आया . राहुल गांधी से पूछा जाना चाहिये कि ऐसे मौकों पर अगर पार्टी कहीं नजर नहीं आती है तो फिर कैसे वह 12 करोड़ किसानों का 2019 में वोट हासिल कर पाएगी . जिसकी वह उम्मीद कर रही है . अधिवेशन में किसानों के लिए सत्ता में आने पर आयोग बनाने की घोषणा जरुर की गयी है लेकिन जब तक सड़क पर कांग्रेस का कार्यकर्ता नहीं उतरेगा तब तक वह मोदी से कथिक रुप से नाराज वोटर का दिल भी नहीं जीत पाएगा .

कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ तेजी से बढ़ रही है. इसकी पुष्टि महाअधिवेशन से हो गई. उससे पहले सोनिया गांधी ने भी साफ कर दिया था कि राहुल अपने मंदिर जाने को बढ़ा चढ़ाकर इसलिए बता रहे हैं क्योंकि बीजेपी ने कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी घोषित कर दिया था. चुनावी हिसाब से यह एक सही रणनीति है. लेकिन कांग्रेस को यह भी देखना होगा कि इस चक्कर में उस धर्मनिरपेक्ष राजनीति को कहीं छोड़ न दे जो लोकतंत्र की धुरी है . देश में एक बड़ा वर्ग ऐसे पढ़े लिखे हिंदुओं का है जो देश को राजनीतिक दलों के चश्मे से नहीं देखता है. 2014 में धर्म ने जरुर जाति को तोड़ा था लेकिन जरुरी नहीं है कि 2019 में ऐसा ही हो. जाति को साधने को हमारे यहां सोशल इंजिनियरिंग कहा जाता है . बात तीखी जरुर है लेकिन सच यही है कि चुनाव में जातिवाद यानि सोशल इंजिनियरिंग ही जीत हार तय करती है. यूपी में फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनावों में मायावती और अखिलेश ने यह दिखा दिया है. राहुल गांधी को इस तरफ भी ध्यान देना होगा. गठजोड़ का काम सोनिया करेंगी और राहुल कांग्रेस को मजबूत करेंगे . कुल मिलाकर अधिवेशन का लब्बोलुआब यही है .

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