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Opinion: भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी, बॉर्डर की सामरिक चुनौतियां और भविष्य के खतरे

राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. चीन और म्यांमार की सीमाओं से सटे भारत के सबसे संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों की वजह से ये रणनीतिक तौर पर इस पर फोकस जरूरी है. भारत के दूसरे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और पूर्वी कमान के पूर्व कमांडर जनरल अनिल चौहान का मानना है कि  बुनियादी ढांचा (Infrastructure), संपर्क (Connectivity), स्थानीय लोगों की भागीदारी और सीमा की स्थिरता सीधे देश की सुरक्षा को प्रभावित करती है.

दक्षिण-पूर्व एशिया से नजदीकी और कई देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा करने की वजह से भारत की 'एक्ट ईस्ट' और 'इंडो-पैसिफिक' नीतियों में उत्तर-पूर्व (Northeast) का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है. इन सीमावर्ती क्षेत्रों को सिर्फ सेना की तैनाती का बफर जोन नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां लगातार आर्थिक विकास, तकनीकी जुड़ाव और सामाजिक मजबूती की जरूरत है.

भारत की रणनीतिक सोच में उत्तर-पूर्व का महत्व

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति में उत्तर-पूर्व (Northeast) क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है. मुख्य भारत से 'चिकन नेक' कहे जाने वाले संकरे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए जुड़ा यह क्षेत्र चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा करता है, जिससे भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से यह बेहद संवेदनशील बन जाता है. कठिन रास्तों, उग्रवाद और सीमित बुनियादी ढांचे के कारण अतीत में इसे एक दूर का पिछड़ा इलाका माना जाता था, लेकिन अब इसे भारत के भविष्य की कनेक्टिविटी और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के मुख्य केंद्र के रूप में देखा जा रहा है. 

'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत यह क्षेत्र भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाला मुख्य द्वार बन चुका है. 'भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग' और 'कलादान मल्टी-मॉडल प्रोजेक्ट' जैसी बुनियादी ढांचा योजनाएं न केवल व्यापार बढ़ाएंगी, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत करेंगी. 

चीन के साथ अरुणाचल प्रदेश सीमा पर जारी विवाद और म्यांमार संकट के कारण बढ़ी घुसपैठ ने इस क्षेत्र की सुरक्षा को और संवेदनशील बना दिया है, जिसके चलते अब इसे केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक और कनेक्टिविटी हब माना जा रहा है.

सुरक्षा और विकास का मिला-जुला मॉडल

सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य तैयारी को आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार से अलग नहीं किया जा सकता. आज के दौर में सड़कें, सुरंगें, पुल, रसद (Logistics) प्रणाली और इंटरनेट नेटवर्क केवल विकास के साधन नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरतें हैं. मुश्किल रास्तों और भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने ऐसे बुनियादी ढांचे (Dual-use Infrastructure) के विकास की वकालत की है जो सेना और आम जनता दोनों के काम आ सके. मजबूत सड़कें और रणनीतिक राजमार्ग जहां एक तरफ युद्ध या तनाव की स्थिति में सेना और भारी हथियारों को तेजी से बॉर्डर तक पहुंचाने में मदद करते हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों के लिए स्वास्थ्य, बाजार और आर्थिक अवसर खोलते हैं. आधुनिक युद्ध प्रणाली में गति, बेहतर संपर्क और मजबूत सप्लाई चेन ही जीत तय करती है, इसलिए यह सिविल-मिलिट्री मॉडल आज बेहद जरूरी हो चुका है.

बॉर्डर के गांव: देश के 'आखिरी' नहीं, 'पहले' गांव

सीमावर्ती दृष्टिकोण में एक सबसे महत्वपूर्ण बदलाव बॉर्डर के गांवों को देखने के नजरिए में आया है. पहले अरुणाचल प्रदेश और अन्य सीमावर्ती इलाकों के गांवों को देश का "आखिरी गांव" मानकर छोड़ दिया जाता था, लेकिन अब इन्हें भारत के "पहले गांव" (First Villages) के रूप में देखा जाता है. यह सोच मानती है कि संवेदनशील सीमाओं पर देश की मजबूती और उपस्थिति बनाए रखने के लिए इन गांवों में आबादी का टिके रहना बेहद जरूरी है. अगर आर्थिक तंगी या बुनियादी ढांचे की कमी के कारण लोग यहां से पलायन करेंगे, तो रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में देश की पकड़ कमजोर होगी. इसके विपरीत, अगर सीमावर्ती समुदाय आर्थिक रूप से मजबूत और जुड़े रहेंगे, तो वे स्थानीय खुफिया तंत्र (Local Intelligence) और दीर्घकालिक सुरक्षा को मजबूत करेंगे. सरकार का 'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' इसी प्राथमिकता को दर्शाता है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, दूरसंचार, पर्यटन, स्वास्थ्य और रोजगार को बढ़ावा दे रहा है.

तकनीक, युवा और नए अवसर

भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए तकनीकी तैयारी, साइबर लचीलेपन और डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य मानते हैं. उनका कहना है कि आने वाले समय में सुरक्षा सिर्फ पारंपरिक सेना पर नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर सुरक्षा, ड्रोन और आधुनिक संचार तकनीकों पर निर्भर करेगी. उत्तर-पूर्व के युवाओं के लिए यह दृष्टिकोण बेहद प्रासंगिक है, जहां भौगोलिक दूरी के कारण पहले अवसर सीमित थे. यदि यहां के युवाओं को कुशल और तकनीकी रूप से जागरूक बनाया जाए, तो यह क्षेत्रीय विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को मजबूत करेगा. इस क्षेत्र में उभर रहा स्टार्टअप इकोसिस्टम इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से युवाओं के लिए रोजगार और नवाचार (Innovation) के नए रास्ते खुल रहे हैं.

सेना और जनता का तालमेल व आपदा प्रबंधन

उत्तर-पूर्व क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा हमेशा बना रहता है. ऐसे में जनरल चौहान ने हमेशा नागरिक-सैन्य सहयोग (Civil-Military Cooperation) को मजबूत करने पर बल दिया है. संकट के समय भारतीय सेना की इंजीनियरिंग इकाइयां, बचाव दल और रसद क्षमताएं नागरिक प्रशासन के साथ मिलकर काम करती हैं. सुदूर इलाकों में लोगों को सुरक्षित निकालना, संचार नेटवर्क को बहाल करना, पुलों का निर्माण और चिकित्सा सहायता पहुंचाना सेना की एकीकृत प्रतिक्रिया का हिस्सा बन चुका है. यह मानवीय सहायता न केवल आपदा से बचाती है, बल्कि सेना और स्थानीय आबादी के बीच गहरे भरोसे का निर्माण करती है. मुश्किल हालातों में सेना का यह रूप जनता के बीच राज्य की विश्वसनीयता को मजबूत करता है और अलगाववादी ताकतों को कमजोर करता है.

यह नजरिया एक ऐसे आधुनिक रणनीतिक सिद्धांत को दर्शाता है जहां सुरक्षा, विकास, कनेक्टिविटी, तकनीक और मानवीय लचीलापन एक-दूसरे के पूरक हैं. उनकी सोच सीमाओं को केवल सैन्य मोर्चे के रूप में देखने के बजाय विकास के मोर्चे के रूप में देखती है. इसमें सेना के "नैतिक सेना" (Moral Army) होने के गौरवशाली लोकाचार (Ethos) की भी झलक मिलती है, जो केवल उग्रवाद को हराने का काम नहीं करती, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी ही जनता का दिल जीतकर, उनका सम्मान बहाल करके उन्हें देश की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करती है.

[यह लेखक के निजी विचार है.]

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