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निर्विघ्न कांवड़ यात्रा के लिए तैयार उत्तर प्रदेश

सनातन धर्म में आस्था रखने वाले यह मानते हैं कि शिव कहीं बाहर नहीं, वे हर उस जीव में विद्यमान हैं जो प्रेम, त्याग और तप से जीवन को साधता है. यही कारण है कि सनातन परंपरा भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं मानती. जो शिव का ध्यान करता है, वह स्वयं शिवमय हो जाता है. सावन में जब लाखों कांवड़िए कंधे पर गंगाजल लिए नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर चलते हैं, तो वे केवल जल चढ़ाने नहीं जाते, वे स्वयं उस तप की जीवंत छवि बन जाते हैं जिसे शिव ने कैलाश की एकांत साधना में साकार किया था.

उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दृष्टि में यही भाव सबसे गहरा है, कांवड़िया केवल एक श्रद्धालु नहीं, चलता-फिरता शिव का प्रतिरूप है और अब जबकि जल्द ही कांवड़ यात्रा शुरू होने वाली है, उत्तर प्रदेश इन तपस्वियों के स्वागत और उन पर पुष्प वर्षा को तैयार है.   निर्विघ्न कांवड़ यात्रा के लिए योगी सरकार ने समय रहते ही सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इसकी देखरेख कर रहे हैं. यह आस्था के प्रति ऐसी सम्वेदना है जिसमें शासन श्रद्धालु के साथ खड़ा दिखाई देता है. सड़कों की मरम्मत, बिजली-पानी की सुचारु व्यवस्था, चिकित्सा शिविरों की तैनाती, इन सबके पीछे यह भाव है कि किसी श्रद्धालु के पांवों में छाले न पड़ें.

सरकार जब सड़क को शिव-पथ मानकर संवारती है, तो वह प्रशासन और आस्था के बीच की दीवार गिरा देती है. इसी भाव से सुरक्षा की चिंता भी उपजी है. मार्ग पर सीसीटीवी और ड्रोन निगरानी, संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल, महिला श्रद्धालुओं के लिए विशेष सुरक्षा घेरा, गंगा घाटों पर गोताखोरों और जल पुलिस की तैनाती, ये सब उस भावना का विस्तार हैं जिसमें राज्य स्वयं को श्रद्धालु के सेवक के रूप में पाता है.   इसी सोच ने चिकित्सा और स्वच्छता से जुड़ी व्यवस्था को व्यवस्थित किया है. एंटी वेनम और एंटी रैबीज इंजेक्शन की उपलब्धता, जगह-जगह शिविरों में विश्राम और पेयजल की व्यवस्था, शौचालयों की नियमित सफाई और मार्ग की रोशनी, इन सबका उद्धेश्य यही है कि भक्त किसी कष्ट में न पड़े.

मार्ग पर मांस और मदिरा की दुकानें बंद रखने का निर्णय, दुकानों पर संचालक का नाम प्रदर्शित करने की अनिवार्यता, यह सब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, यह पवित्रता के सम्मान का प्रश्न है. शुद्ध आचरण और संयम ही तप की पहली शर्त है और योगी सरकार ने इस दिशा में कदम उठाए हैं तो कहा जा सकता है कि वह भक्तों के संकल्प में भागीदार बन चुकी है. इसी सहभागिता ने डीजे की ध्वनि को निर्धारित मानकों में बांधा है. भक्ति में उल्लास स्वाभाविक है, पर यह कोलाहल नहीं बनने पाए, इसके लिए स्पष्ट निर्देश भी दिए गए हैं. लाखों श्रद्धालुओं की सुगमता को केंद्र में रखते हुए ही यातायात प्रबंधन के तहत वैकल्पिक मार्ग, डायवर्जन प्वाइंट, आरक्षित पार्किंग और आपातकालीन कॉरिडोर बनाए गए हैं.

इसी तरह अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं पर दृष्टि रखने वाली विशेष टीमें, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों के विरुद्ध कठोरता की चेतावनी, यह दिखाती हैं कि सरकार आस्था की इस विराट धारा को किसी भी विघ्न से बचाने के लिए सतर्क है. हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तराखंड के प्रशासन से समन्वय और कांवड़ संघों से नियमित संवाद यह सुनिश्चित करते हैं कि यह सुरक्षा-चक्र किसी एक राज्य की सीमा में सिमटा न रहे.   नौ वर्षों के अनुभव ने योगी सरकार को यह सिखाया है कि आस्था की सेवा निरंतर परिष्कृत होने वाली प्रक्रिया है. हर वर्ष व्यवस्था में नई तकनीक, नए संसाधन और नए अनुभव जुड़ते हैं, ड्रोन निगरानी हो या डिजिटल हेल्पलाइन, ये सब पारंपरिक आस्था को आधुनिक प्रशासनिक कुशलता से जोड़ने के प्रयास हैं. पर इन सबके मूल में वही भाव है जिससे यह लेख शुरू हुआ था, कांवड़िया शिव का प्रतिरूप है, और उसकी सेवा शिव की ही आराधना है.  

शिव को औघड़दानी कहा जाता है. वे भक्त की भावना देखते हैं, उसकी हैसियत या साधन-संपन्नता नहीं. राजा हो या रंक, भस्म रमाए वनवासी हो या नगर का साधारण मजदूर, कांवड़ मार्ग पर शिव के लिए सब समान हैं. यही समानता की भावना उस प्रशासनिक निर्देश में झलकती है जिसमें मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि प्रदेश के हर जिले में व्यवस्था का स्तर एक जैसा होना चाहिए, चाहे वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा नगर हो या पूर्वांचल का दूरस्थ कस्बा. जब शासन खुद को इस समभाव में ढालता है, तो वह शिव-तत्व की उसी मूल भावना को आत्मसात करता है जिसमें भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं.   कांवड़ यात्रा की तैयारियों में जिस तरह पूर्व अनुभवों से सीख ली गई है, वह किसी योगी की साधना-प्रक्रिया जैसी ही लगती है.

प्रशासन ने बीते नौ वर्षों में यात्रा को शनैः-शनैः क्रमबद्ध ढंग से सुगम बनाया है. निरंतर सुधार की प्रक्रिया ही किसी भी बड़े जनआयोजन को सफल बनाती है, और यही प्रक्रिया कांवड़ यात्रा को साल-दर-साल अधिक सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाती जा रही है. इस पूरी तैयारी का सबसे अधिक भावनात्मक पक्ष यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे स्वतः आत्मसात कर लिया है. जब कोई मुख्यमंत्री स्वयं अधिकारियों को यह निर्देश देता है कि हर श्रद्धालु की सुरक्षा और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता है, तो वह यह संदेश देता है कि राज्य की संवेदना आस्था के साथ खड़ी है. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा की तैयारियां अब सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का रूप ले चुकी हैं.  

योगी सरकार के प्रयासों की वजह से ही उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा अब राज्य और समाज के साझा संकल्प का प्रतीक है. जब लाखों कांवड़िए कंधे पर गंगाजल लिए उत्तर प्रदेश की सड़कों पर उतरेंगे, तो उनके पीछे एक ऐसा तंत्र सक्रिय रहेगा जो हर कदम पर उनकी सुरक्षा, सुविधा और सम्मान का ध्यान रखेगा, क्योंकि सरकार जानती है कि वह किसी सामान्य यात्री की नहीं, शिव के उस अंश की सेवा कर रही है जो हर कांवड़िए के भीतर बसता है. यही भाव इस यात्रा को निर्विघ्न बनाने की सबसे बड़ी गारंटी है, और यही भाव उत्तर प्रदेश को हर वर्ष इस दायित्व के लिए और अधिक तैयार करता जा रहा है और इसी भाव की वजह से उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में लोगों को इंतजार है सावन के पहले दिन का. श्रद्धालुओं का मन श्रद्धा-आस्था से सराबोर है. जोश अभी से ही हिलोंरे लेने लगा है कि कब वह वक्त आए कि वे कंधे पर कांवड़ लेकर बम भोले का जयघोष करते हुए हरिद्वार, गोमुख और गंगोत्री की ओर बढ़ चलें.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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