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क्या इस बार वाकई खुद को बदलना चाहता है तालिबान?

अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया में जुटे तालिबान के राजनीतिक प्रमुख मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने दुनिया के मुल्कों के साथ अच्छे रिश्ते रखने का पैगाम देकर ये जताने की कोशिश की है कि अब तालिबान का चेहरा बदल चुका है. उन्होंने कहा है कि उनकी सरकार अमेरिका समेत सभी देशों के साथ अच्छे राजनयिक व आर्थिक रिश्ते रखना चाहती है. चूंकि उन्हें तालिबान की बनने वाली सरकार मे संभावित राष्ट्रपति के तौर पर देखा जा रहा है. लिहाजा यह बयान गहरे मायने रखता है.

शनिवार को काबुल पहुंचे बरादर ने ये भी कहा है कि अबकी बार तालिबान का शासन पहले से अलग होगा, जो समावेशी होगा. पाकिस्तान और चीन को अगर छोड़ दें, तो दुनिया के बाकी मुल्कों को उनकी इस बात पर इतनी जल्द यकीन होना बेहद मुश्किल लगता है. लेकिन पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान में हुए सारे घटनाक्रम पर नजर रखें राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर मुल्क पर राज करना है, तो इस बार तालिबान को बदलना ही होगा. क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में आए बदलाव का अंदाज़ा उन्हें लग चुका है.

लिहाज़ा ऐसे बदले हुए अफ़ग़ानिस्तान में वो बंदूक़ की नोक पर महिलाओं को एक बार फिर से घरों में क़ैद करके बच्चे पैदा करने को कह पाएंगे? ऐसा करना उनके लिए इस बार मुश्किल इसलिए भी होगा, क्योंकि कब्जे के बाद पिछले मंगलवार को महिलाओं ने अपनी निडरता दिखाई है और वे तालिबान के विरोध में पोस्टर लेकर काबुल की सड़कों पर निकली हैं. 20 साल पहले ऐसा करने की हिम्मत किसी में नहीं थीं.

तालिबान को बदलने की जरूरत इसलिये भी होगी क्योंकि सरकार चलाने के लिए उन्हें जो आर्थिक व तकनीकी मदद चाहिए, उसके लिए पहले उसे अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देशों से मान्यता पाने की गुहार लगानी होगी. वह तभी मिल पायेगी जबकि तालिबान 21वीं सदी के मानवाधिकार, महिलाओं के अधिकार, लिंग समानता जैसे मुद्दों पर पश्चिमी देशों की बात माने और उन पर अमल करके भी दिखाये. इसलिये अभी तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि तालिबान ने मजबूरीवश अपना 'उदार' चेहरा दिखाने की शुरुआत की है क्योंकि उन्होंने जो दावे टीवी कैमरों के सामने किये हैं, उसे जमीनी हक़ीक़त में बदलकर दिखाना होगा.

मुल्क पर दोबारा कब्ज़ा करने के बाद  17 अगस्त को तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था, "हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. हम यह तय करेंगे कि अफ़ग़ानिस्तान अब संघर्ष का मैदान नहीं रह गया है. हमने उन सभी को माफ़ कर दिया है जिन्होंने हमारे खिलाफ लड़ाइयां लड़ीं. अब हमारी दुश्मनी ख़त्म हो गई है. हम शरिया व्यवस्था के तहत महिलाओं के हक़ तय करने को प्रतिबद्ध हैं. महिलाएं हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने जा रही हैं."

लेकिन ज़मीन पर स्थिति इन दावों के बिल्कुल उलट देखने को मिल रही है. इसलिए उसकी नीयत पर शक का सवाल उठ रहा है कि 2021 का तालिबान क्या सचमुच बदल रहा है या महज़ यह एक दिखावा है? हालांकि ये वही मुल्ला बरादर हैं जिन्होंनेमउस समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके कारण अमेरिकी सेना को अपने 20 साल के अभियान को वापस लेने का समझौता करना पड़ा. उसे 2010 में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था और 2018 तक वह हिरासत में रहा. अमेरिका के दबाव के बाद ही पाकिस्तान ने उसे कतर स्थानांतरित कर दिया था, जहां बाद में वे दोहा में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख नियुक्त किए गए.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि तालिबान के इस नए शासन के कम से कम छह महीने गुज़र जाने के बाद ही उसके चेहरे पर कुछ ठोस भरोसा किया जा सकता है. पहले वे सत्ता संभालें, फिर देखते हैं कि सरकार कैसे काम करती है? क्या वो सऊदी अरब जैसा बनते हैं या संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई की नीतियां अपनाते हैं या फिर अपना अलग कोई रास्ता चुनते हैं? ये सब देखने के बाद ही कह सकते हैं कि सचमुच, अब बदल गया है तालिबान. 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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