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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक राष्ट्रवाद एक ही सिक्के के दो पहलू, गलत समझते आए अब तक लोग

भारत में इन दिनों चुनाव हो रहे हैं. देश में दो बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा है. भाजपा जो कभी पुराने समय में जनसंघ थी, वो हमेशा से ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करती रही है और वही उसका एक मजबूत प्लैंक (स्तंभ) रहा है. भाजपा इस राष्ट्रवाद की बात बहुत जोर-शोर से करती है और वहीं उसके विरोधी कहते हैं कि राष्ट्रवाद के बहाने दरअसल भाजपा समुदाय विशेष यानी हिंदुत्व की बात करती है. कुछ विरोधी तो उस पर फासीवादी और लोकतंत्र-विरोधी होने का भी आरोप लगाते हैं, हालांकि भाजपा अपने राष्ट्रवाद के सहारे ही 1984 की दो सीटों से 2019 के 303 सीटों तक पहुंची है और लगातार तीसरी बार सत्ता का दावा भी पेश कर रही है. 

समझना होगा राष्ट्रवाद का अर्थ

राष्ट्रवाद दरअसल नेशनलिज्म का तर्जुमा है और यह  शब्द यूरोप के पुर्नजागरण के बाद आया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रवाद शब्द का मतलब कुछ और भी होता है, लेकिन जब भारत की बात आए तो यहां दो राष्ट्रवाद आ जाते हैं. पहला है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और दूसरा है नागरिक राष्ट्रवाद. नागरिक राष्ट्रवाद ही बाद में जाकर राजनीतिक राष्ट्रवाद हो जाता है. आज भी लोगों में दुविधा है कि दोनों राष्ट्रवाद क्या एक है या ये दोनों अलग-अलग है? 

ये सवाल तो उठ ही जाता है कि पहले नागरिक आया कि पहले राष्ट्र आया, या फिर पहले संविधान आया उसके बाद राष्ट्र आया. ये समझने का विषय है कि पहले नागरिक ने राष्ट्र बनाया उसके बाद नागरिक राष्ट्रवाद से राजनीतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना की गई और बाद में संविधान बनाया गया. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और नागरिक राष्ट्रवाद या राजनीति राष्ट्रवाद कभी एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते. अक्सर माना जाता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अलग और नागरिक राष्ट्रवाद को अलग से देखने की जरूरत है. 

विविथता से भरा भारत 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लेकर  हमेशा उग्र सी भावना रहती है. एक पार्टी यानी भाजपा पर तो ये भी आरोप लगा है कि राष्ट्रवाद की आड़ में वह एक विशेष समुदाय को लेकर काम करती है. भारत में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे उदार शब्दों से जो उत्साह पैदा होता है, उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा जाता है. उसको राजनीतिक राष्ट्रवाद से नहीं जोड़ा जाता है. भारत देश में काफी विविधता है. देश में जो एकता पूरी तरह से संजोए हुए है वो किसी को नहीं दिखाई देता. भारत में विरोधाभासी विचार काफी हैं. अल्पसंख्यक की छोड़िए बहुसंख्यक में भी काफी विरोधाभास है. भारत में धार्मिक प्रथाओं के स्तर पर ही देखने की जरूरत है कि कितने विरोधाभास है. कितने विचार एक दूसरे से अलग हैं? आखिरकार सच तो एक ही है लेकिन उसे अलग-अलग तरीके से बुलाया जाता है.  

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिंदू राष्ट्रवाद

भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को नकारने का एक अलग कारण है. मुस्लिम आक्रामणकारी या शासक धार्मिक और नसलीय श्रेष्ठता पर शासन करने का आधार बनाया था. ये पूरी तरह से सच है, जिससे कोई भी इंकार नहीं करेगा. स्थानीय संस्कृति के साथ इस्लाम की मिलावट हमेशा नकारात्मक रूप से ही देखने को मिलेगा, जिसका कारण ये है कि जो विजेता है वो अपनी शक्ति को कमजोर नहीं करने देता साथ ही उसको वहां पर राज कहना होता हैं जहां पर उसने आक्रमण किया है. ऐसे में इस्लाम अपनाने वाले भारतीय से भी ये उम्मीद की जाने लगी की वो अपनी पुश्तैनी संस्कृति का भी त्याग कर दें. अब ये सवाल उठता है कि क्या भारत के मुसलमान भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को हिंदू राष्ट्रवाद के रूप में ही देखेंगे या देखते हैं? आदर्श तौर पर तो ऐसा नहीं देखना जाना चाहिए, बल्कि वो इंडोनेशिया जैसे मुसलमान हो सकते हैं, जहां उस देश की पुरानी संस्कृति को बदस्तूर कायम रखा गया है. वहां के नोटों से लेकर हवाई अड्डों तक आपको हिंदू-बौद्ध प्रतीक और चिह्न दिखाई देंगे. भारत में जिस गंगा-जमनी तहजीब की बात करते हैं, वह तो बिल्कुल सतही दिखावा है.

भारत को उसके अपने प्रतिमान से देखा जाना चाहिए, किसी बाहरी  धार्मिक नजरिये से कभी भी नहीं देखा जाना चाहिए. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जगह नागरिक राष्ट्रवाद पर ध्यान देना चाहिए. 2014 के बाद भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पूरी तरह से नागरिक राष्ट्रवाद की ओर कनर्वट हुआ है. उसे चाहे राजनैतिक राष्ट्रवाद कहिए या फिर भाजपा का राजनैतिक राष्ट्रवाद कहीये या फिर 2014 के बाद राजनीति की शैली, जिस प्रकार से एक चीज को बल मिल रहा है वो एक तरह से भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ही बल मिल रहा है. इसलिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक राष्ट्रवाद दोनों अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं. भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सनातन (यानी हिंदू) संस्कृति मानते हुए दबाने का प्रयास किया जाता है, जिसे सीधे तौर पर गंगा जमुनी तहजीब पर कुर्बान किया जाता है. इसके सबसे बड़े शिकार हुए हैं तो वो भारत के मुसलमान हुए हैं. 

भारतीय लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरोध में जो विचार आता है वो धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज्म का आता है. दोनों के युग्म के लिए भारत को अलग देखने की जरूरत ही नहीं है. देखा जाए तो भारत के संदर्भ में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक राष्ट्रवाद दोनों अलग नहीं बल्कि एक ही हैं. दोनों एक साथ मिलेंगे और उसी को सेक्युलरिज्म कहा जाता है जो वर्तमान में इस समय चल रहा है, जिसे बहुसंख्यकवाद की संज्ञा दी जा रही है. संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र के जिस मॉडल को अपनाया वो यही चाहते थे कि जिसकी संख्या ज्यादा हो वो सत्ता में रहें. लेकिन कुछ भी किसी पर थोपा न जाए. इसके लिए भारत की संस्कृति अपने आप में पर्याप्त है. भारत की संस्कृति में अगर कोई मुसलमान है तो वो इंडोनेशिया के तर्ज पर संस्कृति से जुड़कर अपने यहां इबादत कर सकेगा. सत्ता में अपनी भागीदारी नंबर यानी की संख्या के आधार पर कर सकता है. लोकतंत्र के जिस मॉडल को अपनाया है उसमें नंबर काफी मायने रखता है. अगर ये लोकतंत्र का मॉडल रहेगा तो हरदम बहुसंख्यकवाद कायम रहेगा. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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