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कांग्रेस प्रधानमंत्री पद के लिए पहले ही खुद को क्यों किया रेस से बाहर? जानिए इस सियासी कुर्बानी के मायने

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए बाजी बिछने लगी है. बेंगलुरू में दो दिनों से 26 राजनीतिक दल इकट्ठा होकर भाजपानीत सरकार से दो-दो हाथ करने और महागठबंधन बनाने की रणनीति बनाने में सिर जोड़ कर जुटे हैं. कांग्रेस ने बैठक से पहले आम आदमी पार्टी को दिल्ली-अध्यादेश के मुद्दे पर समर्थन का ऐलान भी कर दिया. फिर भी, महागठबंधन की बैठक में कहीं कुछ है, जो जुड़ नहीं रहा है. विपक्षी दलों की बेंगलुरु में मंगलवार (18 जुलाई) को हो रही बैठक के दूसरे दिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने यह कहकर सबको चौंका दिया है कि कांग्रेस पीएम पद की रेस में नहीं है. खरगे ने कहा कि कांग्रेस को सत्ता को कोई लोभ नहीं है. उन्होंने यह कह कर एक बड़ा इशारा दे दिया है कि वे सत्ता के लिए या पीएम पद के लिए नहीं लड़ रहे हैं. अब इसे कांग्रेस की कुर्बानी समझी जाए या आत्मसमर्पण करना?  

कांग्रेस का ऐलान मजबूरी या बड़प्पन? 

पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को "मोदी सरनेम मानहानि" मामले में अभी तक राहत नहीं मिली है. उनका अगला चुनाव लड़ना भी संदिग्ध सा दिख रहा है. कांग्रेस की यह घोषणा कहीं भविष्य को देखते हुए की गयी राजनीतिक सौदेबाजी है या हताशा में किया गया फैसला, यह तो कांग्रेस के दिग्गजों को ही पता होगा, लेकिन इससे विपक्षी दलों की एकता में दिख रहा एक बड़ा रोड़ा हटता दिख रहा है. अब ये सभी दल बिना पीएम पद का प्रत्याशी घोषित किए ही चुनाव में जा सकते हैं. वैसे भी विंस्टन चर्चिल ने कभी कहा था, “विपक्ष का मुख्य काम सत्ता पक्ष को सत्ता से बेदखला करना है.” शायद यही वजह है कि नेता प्रतिपक्ष को पीएम इन वेटिंग भी कहा जाता है. इस वक्त भारतीय राजनीति की दिशा इसी तरफ जाती दिख रही है कि कैसे भी हो, मोदी को सत्ता से कैसे बेदखल किया जाए. आज, यानी 18 जुलाई को बंगलुरू में महाविपक्ष की बैठक हो रही है और इससे पहले पटना में भी ऐसी ही एक बैठक के जरिये मोदी के खिलाफ महाविपक्ष के जंग का ऐलान किया जा चुका है.

लेकिन, जब महाविपक्ष के 26 दलों के खिलाफ आज ही यानी, 18 जुलाई को एनडीए की बैठक में 38 दलों के शिरकत किए जाने की बात की जा रही है तब क्या सिर्फ 26 बनाम 38 के सहारे महाविपक्ष यह जंग जीत पाएगा? सवाल है कि ऊपर से जो महाविपक्ष एक दिख रहा है उसके अपने अंतर्विरोधों का क्या होगा? कौन देगा कुर्बानी? क्योंकि पटना बैठक के वक्त से ही “पहले दो तब लो” वाली बारगेनिंग शुरू हो चुकी थी तब ऐसे में आगे अभी क्या-क्या होना बाकी है, इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते है. निकट भविष्य में महाविपक्ष की दशा और दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले फैक्टरों को समझ लेना जरूरी है.

कुर्बानी देनी है, पर देगा कौन? 

महाविपक्ष की सबसे बड़ी कोशिश यही होगी कि हर सीट पर भाजपा (एनडीए) के उम्मीदवार के खिलाफ एक ही उम्मीदवार दिया जाए. यह रणनीति सही भी साबित हुई है कि वन टू वन लड़ाई में भाजपा को हराना थोड़ा आसान हो जाता है. लेकिन, यूपी, बिहार, दिल्ली, बंगाल और पंजाब में यह स्ट्रेटजी कैसे काम कर पाएगी, इस पर थोड़ा विचार किए जाने की जरूरत है. मसलन, पंजाब में कांग्रेस के 7 सांसद अभी ही है और कुल 13 सीटों में से आम आदमी पार्टी के पास सिर्फ एक सांसद. ऐसे में कौन किसके लिए कितनी सीटें छोड़ेगा? इसी तरह, दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें भाजपा के पास है लेकिन आप-कांग्रेस यहाँ किस तरह का फार्म्यूला अपने लिए तैयार करेंगे?

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस और वामपंथी दल किस आधार पर सीट शेयरिंग फार्म्यूला तय करेंगे? यूपी में मायावती एक अलग कोण बनाएंगी. अब यह कैसे तय होगा कि पंजाब में आप मजबूत है या कांग्रेस या बिहार में महज 40 सीटों का बंटवारा महागठबंधन के चार प्रमुख दलों (राजद + जद(यू) + वाम मोर्चा + कांग्रेस) के बीच किस आधार पर किया जाएगा? इस वक्त नीतीश कुमार की पार्टी के बिहार से 16 सांसद हैं. क्या नीतीश कुमार अपने सेटिंग सांसदों की कुर्बानी देंगे? हालांकि, इन शंकाओं का समाधान भी महाविपक्ष को खुद ही तलाशना है जिसका जवाब इसमें छुपा है कि कौन कितनी कुर्बानी देने के लिए तैयार है. वैसे एक अच्छा संकेत यह दिखा है कि बंगलूरू बैठक के पहले ही कांग्रेस ने दिल्ली अध्यादेश के मसले पर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की बात कही है जबकि पटना बैठक के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मुद्दे पर सदन में अपनी राय रखने की बात कही थी. 

नया गठबंधन और सोनिया गांधी की भूमिका

आज के बैठक का मुख्य एजेंडा है 2024 के आम चुनावों के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की ड्रॉफ्टिंग और गठबंधन के लिए जरूरी कम्यूनिकेशन पॉइंट्स तैयार करने के लिए एक सब कमेटी स्थापित करना. ऐसी ही एक सब कमेटी दो दलों के बीच विरोधाभासों को दूर करने के लिए काम करेगी. गठबंधन के लिए एक नाम का सुझाव दिया जाएगा और प्रस्तावित गठबंधन के लिए एक सामान्य सचिवालय की स्थापना की जाएगी. साथ ही नए संयोजक के नाम का भी ऐलान हो सकता है जिसके लिए कमोबेश नीतीश कुमार के नाम पर सहमति जताई जा चुकी है. अभी भी सबसे दिलचस्प तथ्य का सामने आना बाकी है कि क्या इस गठबंधन का नाम यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायन्स ही रहेगा या कोई नया नाम दिया जाएगा और क्या जो 26 दल आज की बैठक में शामिल हो रहे हैं, वे सारे के सारे नए गठबंधन में शामिल होंगे क्योंकि अभी भी कई दल ऐसे है जो यूपीए का हिस्सा नहीं हैं. फिर इस नए गठबंधन के नेता के नाम पर भी बात होगी. अभी यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी है. क्या 26 दलों वाले महागठबंधन की नेता भी सोनिया गांधी ही होंगी? क्या सभी दल इसके लिए राजी होंगे? या फिर इस मुद्दे पर भी कांग्रेस को कुर्बानी देनी होगी? आज की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष ने यह कह कर एक बड़ा इशारा दे दिया है कि हम सत्ता के लिए या पीएम पद के लिए नहीं लड़ रहे हैं. अब इसे कांग्रेस की कुर्बानी समझी जाए या आत्मसमर्पण करना? इस वक्त कांग्रेस महाविपक्ष की तस्वीर बनाने को ले कर थोड़ी नरम दिख रही है लेकिन साथी दल अलग-अलग राज्यों में कैसे समन्वय स्थापित कर पाएंगे, इसे ले कर सवाल अभी बने हुए हैं. 

26 बनाम 38 का गणित 

महाविपक्ष में अभी तक 26 दलों के शामिल होने की बात कही जा रही है जबकि आज ही एनडीए की बैठक में 38 दलों के होने का दावा किया गया. 18 जुलाई को दिल्ली में एनडीए की बैठक से ठीक पहले एनसीपी (अजीत पवार), लोजपा (रामविलास), उपेन्द्र कुशवाहा, ओपी राजभर, मुख्तार अंसारी के बेटे आदि को एनडीए में शामिल कर भाजपा ने महाविपक्ष के दावे को कमजोर साबित करने की कोशिश की. एक बड़ा अंतर एनडीए और महाविपक्ष में जो देखने को मिलता है वो यह कि जहां भाजपा छोटे से छोटे दलों तक को अपना साथी बनाने की हर संभव कोशिश करती है, वह भी तब जब वह इस वक्त अकेले 300 से ज्यादा सान्संदों के साथ सरकार में हैं, वहीं कांग्रेस या नीतीश कुमार की अगुवाई वाली विपक्षी एकता की कवायद से बहुत सारे महत्वपूर्ण छोटे दल गायब है. उन्हें या तो आमंत्रित नहीं किया गया या उन्हें अपने साथ लेने के लिए अतिरिक्त कोशिश नहीं की गयी जैसाकि भाजपा करती रही है. मसलन, ओवैसी की पार्टी हो या मायावती हो या चंद्रशेखर आजाद की पार्टी हो. खुले तौर पर ओवैसी भाजपा के विरोध में हैं और चुनाव भी इसी नाम पर लड़ते है जबकि इसका उलटा फ़ायदा भाजपा को हो जाता है. यूपी में चंद्रशेखर आजाद और मायावती का अपना कुछ वोट बैंक तो है ही. इसी तरह बिहार में मुकेश सहनी है, पप्पू यादव हैं. लेकिन, क्षेत्रीय राजनीति के कारण नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के लिए ये लोग महत्वपूर्ण नहीं रह जाते. लेकिन सच्चाई इसके उलट है. उपेन्द्र कुशवाहा, चिराग पासवान, मांझी, ओपी राजभर, अनुप्रिया पटेल जैसे छोटे दलों के नेताओं को भी अहमियत दे कर भाजपा यूपी-बिहार में बाजी मार ले जाती है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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