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BLOG: एकजुट विपक्ष ने 2019 के पहले मोदी को दिलाई कबीर की याद

कबीर के दिल में तो राम बसे थे लिहाजा उनके हिसाब से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो काशी में शरीर त्यागते हैं या मगहर में. लेकिन सियासी जन्म-मरण को देखते हुए काशी और मगहर अचानक से महत्वपूर्ण हो चुके हैं. वैसे मोदी ऐसे पहले नेता नहीं है जो कबीरदास के नाम पर सियासत करने निकले हों.

एक दिन पहले खबर आती है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलते हैं. मैराथन बैठक के बाद सूत्र बताते हैं कि संघ को लगता है कि यूपी में पिछड़ों और दलितों के बीच योगी को और ज्यादा काम करने की जरुरत है. इस खबर के दो दिन बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कबीर की मरणस्थली संत कबीरदास नगर या यूं कहा जाए कि मगहर में रैली करने जा रहे हैं.

कबीरपंथी आरोप लगा रहे हैं कि चार साल मोदीजी अपने संसदीय क्षेत्र काशी कई दफे आए लेकिन कबीर की जन्मस्थली आने का वक्त नहीं निकाल पाए और मोदी को चुनावी साल में कबीर की याद याद आई है. इस आरोप में चाहे सच्चाई हो या ना हो, लेकिन यह बात जरुर सच है कि चुनावी साल में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को यूपी में खासतौर से कबीर में संभावना दिखने लगी है.

सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक हैं कबीर दरअसल, कबीर गरीबों, दलितों, पिछड़ों, शोषितों के मसीहा माने जाते हैं. कबीर की पहचान सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रुप में भी है. सामाजिक न्याय के लिए कबीर का नाम बड़े आदर से लिया जा सकता है. कबीर को दुनिया का पहला सच्चा समाजवादी भी कहा जा सकता है और इसका सबूत है उनका यह दोहा.

साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा ना रहूं, साधू ना भूखा जाए.

कबीर-मोदी की बातों में दिखती है समानता अब अगर मोदी के भाषणों की तुलना कबीरदास के दोहों से की जाए तो (सांप्रदायिक सौहार्द को कुछ कुछ छोड़कर) एक गजब की समानता दिखती है. मोदी कहते रहे हैं कि उनकी सरकार गरीबों के लिए है, पिछड़ों के लिए है, वंचितों के लिये है, कतार में खड़े आखिरी आदमी के लिए है आदि-आदि. दरअसल, यह सारा एक ऐसा वोटबैंक है जो आसानी से किसी को भी सत्ता तक ले जाता है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों के साथ यूपी की 80 में से 73 सीटों पर कब्जा किया था. पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों तक यह करिश्मा कायम रहा और उसने तीन चौथाई सीटों पर कब्जा किया.

माया-अखिलेख के साथ आने से याद आए कबीर यह सब इसलिए हो पाया क्योंकि विपक्ष बिखरा हुआ था, गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों के बीच संघ का किया काम कमल के काम आ गया था. लेकिन पिछले एक साल में कहानी बदली है. खासतौर से कैराना, गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा के उपचुनावों में हार या यूं कहा जाए कि विपक्ष के एक होने से हुई हार के बाद बीजेपी के होश उड़े हुए हैं. दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है और यहां मायावती-अखिलेश से एक साथ आने से (इसे इस तरह पढ़ा जाए कि दलितों और ओबीसी के एक साथ आने से) रास्ते में स्पीड ब्रेकर नजर आने लगे हैं. कबीर के बहाने दलितों के यहां घुसपैठ करने का मौका है जिसका फायदा मोदी उठाना चाहते हैं. कोई हैरानी नहीं होगी अगर आने वाले समय में हमें कबीर के नाम पर दलितों, वंचितों, शोषितों, पिछड़ों के लिए कुछ योजनाएं दिखाई या सुनाई पड़ने लगें.

बार-बार नहीं चढ़ेगी हिंदुत्व की हांडी मोदी सरकार दलितों को नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण की बात कर रही है. आने वाले मानसून सत्र में ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाला बिल और एससी एसटी एक्ट को फिर से मजबूत करने वाला बिल पास करवाने पर मोदी सरकार को पूरा जोर है. मोदी जानते हैं कि हिंदुत्व की हांडी बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती. एक बड़ा डर ये भी है कि अगर अगले लोकसभा चुनाव तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के पक्ष में नहीं आया तो उन्हें बड़े हिंदू वर्ग को जवाब देना पड़ सकता है. ऐसे में दलित ओबीसी वोट की पूंछ सत्ता के वैतरणी को पार करने में सहायक साबित हो सकती है. इसके सहारे मायावती और अखिलेश के गठबंधन में सेंध लगाई जा सकती है और इस सबके महासेतु कबीरदास साबित हो सकते हैं. कहा जाता है कि काशी में मरने से स्वर्ग मिलता है और मगहर में मरने से नर्क मिलता है. कबीरदास के खुद लिखा था.

क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा, जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा.

कबीर पर सियासत करने वाले पहले नेता नहीं मोदी कबीर के दिल में तो राम बसे थे लिहाजा उनके हिसाब से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो काशी में शरीर त्यागते हैं या मगहर में. लेकिन सियासी जन्म-मरण को देखते हुए काशी और मगहर अचानक से महत्वपूर्ण हो चुके हैं. वैसे मोदी ऐसे पहले नेता नहीं है जो कबीरदास के नाम पर सियासत करने निकले हों. इससे पहले सभी अन्य दल भी अपने अपने तरीके से कबीरदास का नाम लेते रहे हैं और सियासत चमकाने की कोशिश करते रहे हैं . लेकिन यूपी में नये चुनावी समीकरण और नई तरह की सोशल इंजिनियरिंग को देखते हुए कबीरदास का नाम और काम या यूं कहा जाए कि उनकी पहचान को नये सिरे से चमकाना जरुरी हो गया है.

मोहब्बत और चुनाव में सब जयाज है यूपी को सिर्फ सवर्ण वोटों के सहारे जीता नहीं जा सकता. यूपी की जातिवादी राजनीति को हिंदुत्व के दम पर तोड़ना भी मुश्किल नजर आ रहा है. गैर जाटव और गैर ओबीसी वोट बैंक पर फिर से कब्जा करना आसान नहीं है. ऐसे में अगर कबीर काम आ सकते हैं तो इस पर राजनीति करने में क्या हर्ज है. आखिर जंग और मोहब्बत के साथ साथ चुनाव में भी सब कुछ जायज होता है. इस बात को मोदी से बेहतर कौन जान सकता है जो अपने दम पर आखिरी दिनों में चुनाव को पलटाने की कला में माहिर हैं. देखना दिलचस्प होगा कि मोदी कबीर को किस रुप में याद करते हैं.

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