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भाषा पर हो रहे विवाद की जड़ में छलक रहा है हिंदी-द्वेष, सूत ना कपास और हो रही लट्ठमलट्ठ

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत स्कूलों में तीन भाषाएं पढ़ाने पर जारी बहस में छलक रहे हिन्दी-द्वेष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह हिन्दी द्वेष गैर-हिन्दी जन में ही नहीं बल्कि हिन्दी विभाग में पढ़ाने वाले कुछ प्रोफेसरों या कुछ हिन्दी पत्रकारों के नजरिए पर भी हावी है. ऐसे हिन्दी-द्वेषी बुद्धिजीवी यह भूल चुके हैं कि उनके लेखों और भाषणों से हिन्दी भाषा के इतिहास की विकृत समझ जनता के सामने प्रस्तुत हो रही है जिसके दूरगामी नुकसान हो सकते हैं. त्रिभाषा नीति से असहमत होने के बावजूद यहां उन आरोपों पर बिन्दुवार चर्चा की जाएगी जो हिन्दी के खिलाफ ताजा विवाद में लगाए जा रहे हैं.

क्या यूपी वाले तमिल सीखेंगे?

डीएमके के कई कैडरों के साथ ही हिन्दी विभाग और हिन्दी मीडिया से वेतन प्राप्त करने वाले प्रोफेसर और एडिटर भी यह सवाल पूछ रहे हैं!  तमिलनाडु में डीएमके की राजनीति हिन्दी-विरोध की जमीन पर खड़ी है इसलिए उनके बयान की प्रेरणा समझी जा सकती है मगर हिन्दी के प्रोफेसर और पत्रकार तथ्य और तर्क दोनों के प्रतिकूल सवाल क्यों उछाल रहे हैं! सर्वप्रथम यह स्पष्ट होना चाहिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाने का प्रावधान नहीं है. तीसरी भाषा के तौर पर कोई भी भारतीय भाषा पढ़ायी जा सकती है. तमिलनाडु के स्कूलों में इंग्लिश और तमिल के साथ तेलुगु या कन्नड़ या मलयालम पढ़ायी जा सकती है! ऐसे में तीसरी भाषा पढ़ाने के विरोध को पचास साल पुराने हिन्दी-विरोध की तरफ मोड़ देना राजनीतिक चतुराई हो सकती है मगर बौद्धिक ईमानदारी नहीं है इसलिए सभी बुद्धिजीवियों को ऐसा करने से बचना चाहिए.

केंद्र सरकार तीसरी भाषा के रूप में आवश्यक रूप से हिन्दी पढ़ाने से पीछे हट चुकी है मगर जब केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार ने ऐसा करने का प्रयास किया था तब भी तमिलनाडु या किसी अन्य राज्य में हिन्दी का प्रचार-प्रसार इसलिए नहीं किया जा रहा था कि हिन्दी को दूसरी भाषाओं पर वर्चस्व स्थापित करना है. गुलामी के लम्बे दौर में भारत की अवाम पर इंग्लिश को शासन-प्रशासन की भाषा के तौर पर थोपकर देश को राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक रूप से गुलाम बनाने के साथ ही सांस्कृतिक गुलाम भी बनाया गया था. दुनिया भर में कोलोनियल कब्जे का इन चारों मोर्चों पर विरोध किया जाता है. भारत में भी वही हुआ.

हिंदी है भारतीय उपमहाद्वीप की लिंक-लैंग्वेज

गुलामी के लम्बे दौर में यह बात भारत के लोगों के मन में साफ हो चुकी थी कि भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भाषा क्षेत्रों के बीच आपसी एकता का न होना हमारी गुलामी का प्रमुख कारण है. राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक मोर्चों पर कोलोनियल ताकतों का मुकाबला कैसे किया गया यह हमने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में पढ़ा है मगर सांस्कृतिक कोलोनाइजेशन का मुकाबला करने के लिए हिन्दी एंटी-कोलोनियल काउंटर-कल्चर की भाषा के रूप में कैसे विकसित हुई इसकी पर्याप्त समझ हमारे स्कूलों में नहीं दी जाती है.

अंग्रेजों के आने से सैकड़ों साल पहले से हिन्दी भारतीय उपमहाद्वीप की लिंक-लैंग्वेज थी. भारत के लोग आपस में संवाद करने के लिए हिन्दी का प्रयोग करते थे. हिन्दी का सीधा मतलब है हिन्द की भाषा. जैसे चीन की भाषा चीनी, रूस की रूसी, जापान की जापानी उसी तरह हिन्द की हिन्दी या हिन्दुस्तान की हिन्दुस्तानी भाषा थी. चूँकि हिन्दी पहले से भारतीय उपमहाद्वीप की लिंक-बोली थी इसलिए इंग्लिश के कल्चरल कोलोनाइजेशन के खिलाफ एंटी-कोलोनियल भाषा के रूप में स्वाभाविक रूप से पहली पसन्द के रूप में वह सभी को स्वीकार्य थी. 


भाषा पर हो रहे विवाद की जड़ में छलक रहा है हिंदी-द्वेष, सूत ना कपास और हो रही लट्ठमलट्ठ

तकनीकी रूप से किसी भी बोली के लिए लिपि निर्धारित करके उसे भाषा के रूप में विकसित किया जा सकता है. मगर दैनिक बोलचाल की बोली से आगे बढ़कर प्रशासन, साहित्य, समाजविज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी की भाषा बनने में किसी बोली को लम्बा वक्त लगता है जिसमें असीम ऊर्जा और संसाधन की जरूरत होती है. किसी समय संस्कृत भारत की सुप्रा-लैंग्वेज थी और देश के ज्यादातर इलाकों के विद्वान संस्कृत में बौद्धिक कार्य करते थे. आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में एक राज्य, एक संविधान और एक भाषा नाभिनालबद्ध हैं. चीन की भाषा चीनी, फ्रांस की फ्रांसीसी, रूस की रूसी, जर्मनी की जर्मन, ब्रिटेन की इंग्लिश भाषाएँ भी कमोबेश स्थानीय बोलियों के बीच से उभरकर अपने राष्ट्र-राज्य की प्रथम भाषाएँ बनी हैं. भारत ने इन देशों के अनुभव को देखते हुए मध्यम-मार्ग अपनाया ताकि हिन्दी के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों की भाषा का भी विकास होता रहे. यही कारण है कि हिन्दी को विभिन्न राज्यों के आपसी सम्पर्क भाषा के रूप में चुना गया.

तमिलनाडु के नेताओं का विरोध बेतुका

संविधान निर्माताओं की मूल परिकल्पना के अनुसार हर राज्य की एक राज्य-भाषा होनी थी और उस राज्य का सारा कामकाज और शिक्षण उसी भाषा में होना था और हिन्दी को इन राज्यों के बीच आपसी संवाद की भाषा बनना था. मगर संविधान निर्माताओं का यह सपना पूरा न हुआ और आज भी इंग्लिश कई भारतीय राज्यों के बीच सम्पर्क भाषा है. हालाँकि अभी तक किसी विद्वान ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि अगर तमिलनाडु सरकार द्वारा केंद्र सरकार से इंग्लिश में पत्राचार करने से तमिल भाषा समाप्त नहीं हुई है तो फिर केंद्र से हिन्दी में पत्राचार करने से तमिल कैसे खत्म हो जाएगी? और अब जब केंद्र सरकार ने तीसरी भाषा को पूर्णतः वैकल्पिक बना दिया है तो फिर हिन्दी के नाम पर त्रिभाषा नीति का विरोध करने का क्या तुक है!

यूपी के लोगों को तमिल सिखाने के लिए बेचैन बुद्धिजीवी यह भूल गये कि दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार किसी लैंग्वेज एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत नहीं किया गया था. इन बौद्धिकों की एक्सचेंज प्रोग्राम वाली दलील मान लें तो फिर यूपी-बिहार के स्कूलों में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, बांग्ला, मराठी, गुजराती इत्यादि सभी गैर-हिन्दी भाषाए पढ़ानी पड़ेंगी जो उन राज्यों की राज्य-भाषा हैं! जाहिर है कि हिन्दी  एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत नहीं सिखायी जा रही थी बल्कि वह भारत के राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक एकीकरण के साथ सांस्कृतिक एकीकरण की प्रेरणा से लिया गया निर्णय था. 

हिन्दी अंग्रेजों के आने से पहले से हिन्द की सम्पर्क बोली थी. 18वीं सदी में केवल इतना अंतर आया कि हिन्द की सम्पर्क बोली को राजकाज की लिखित भाषा के रूप में विकसित करने के प्रयास शुरू हुए. जिस तरह मध्यकाल में आम जनता की जबान इंग्लिश ने ब्रिटेन में आधुनिक ज्ञान की भाषा के रूप में लैटिन की जगह लेनी शुरू की उसी तरह हिन्द में हिन्दी ने संस्कृत की जगह लेनी शुरू की क्योंकि संस्कृत शिक्षण का राष्ट्रव्यापी तंत्र कोलोनियल रूल में छिन्न-भिन्न हो चुका था और ऐतिहासिक विकास के क्रम में संस्कृत एक प्रभु वर्गीय भाषा के रूप में संकुचित हो चुकी थी. जिस तरह ब्रिटेन में क्लास की भाषा लैटिन की जगह मॉस की भाषा इंग्लिश ने ली उसी तरह हिन्द में क्लास की भाषा संस्कृत की जगह अवाम की भाषा हिन्दी ने लेनी शुरू कर दी. इस तरह हिन्दी न केवल कोलोनियल दमन के खिलाफ प्रतिरोध की भाषा थी बल्कि उच्च-वर्ग के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध की भी भाषा थी. संस्कृत के क्लास-कैरेक्टर के खिलाफ भाषा (हिन्दी इत्यादि) की वकालत अंग्रेजों के  आने से पहले से जारी था जो हमें गुरु गोरखनाथ, अमीर खुसरो, नानक, कबीर और तुलसी इत्यादि में दिखायी देता है. हिन्दी अपने जन्म से काउंटर-कल्चर की भाषा रही है.

देश की तकरीबन आधी जनता समझती है हिंदी

हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रचारित करने का एक अन्य बड़ा कारण यह था कि देश की करीब 50 प्रतिशत आबादी इस भाषा को थोड़ा-बहुत बोलना जानती है, लिखना भले न जाने. हिन्दी के अलावा भारत की कोई ऐसी भाषा नहीं है जो देश के 9 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को बोलने आती हो. उदाहरण के लिए हम बांग्ला या तमिल को राष्ट्रीय-भाषा की तरह प्रस्तुत करते तो क्या होता? देश की 92 या 95 प्रतिशत आबादी को नई बोली और उसकी लिपि सिखानी होती. भारत की करीब आधी आबादी हिन्दी बोलना जानती है तो भाषा सिखाने के टास्क का वजन तकनीकी तौर पर आधा हो जाता है. इसके अलावा भारत की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली कई राज्य-भाषाओं (पंजाबी, बांग्ला, मराठी, गुजराती इत्यादि) की लिपि, व्याकरण और ध्वनि-व्यवस्था हिन्दी से काफी करीब है क्योंकि ये हिन्दी की सहोदर भाषाएँ हैं. भारतीय भाषा सर्वेक्षण के अनुसार अधिकतम 25 प्रतिशत आबादी ही ऐसी है जो इंडो-आर्यन भाषा समूह में नहीं आती है जिनके लिए हिन्दी सीखना सर्वथा नई लिपि और ध्वनि व्यवस्था सीखना होता है. यानी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में चुनने के पीछे ऐतिहासिक और सांख्यिकी दोनों कारण बेहद मजबूत थे. यही कारण है कि हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्ततु करने की अवधारणा गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और बंगाल से उभरी और उसे हिन्दी प्रदेशों के लोगों ने भी स्वीकार किया. हिन्दी भारत की राष्ट्रीय एकता की सूत्रधार मानी गयी इसलिए उसे तमिल या किसी अन्य भाषा से पनसारी की दुकान वाला अदल-बदल नहीं किया जा सकता.

क्या यूपी-बिहार के लोग सबसे कम द्विभाषी हैं?

ताजा विवाद के बीच एक इंग्लिश अखबार ने एक सर्वेक्षण के आधार पर रिपोर्ट छापी कि यूपी बिहार के लोग कम से कम द्विभाषी हैं. रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया कि त्रिभाषा फार्मूला का जमीन पर असर नहीं हुआ है. इस रिपोर्ट में सर्वेक्षण के आंकड़ों का जैसे इस्तेमाल किया गया है वह सर्वेक्षण की सीमा और पत्रकार की समझ दोनों को कठघरे में खड़ा करता है.

हिन्दी प्रदेशों के नागरिक किसी सर्वेक्षण में अपनी भाषा केवल हिन्दी लिखवाते हैं तो इसकी वजह उनका भाषा के प्रति अज्ञान नहीं है बल्कि उनका हिन्दी को लेकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना से ओतप्रोत होना है. जिस तरह गुजराती, मराठी, बांग्ला, तमिल इत्यादि अवाम बचपन से इन भाषाओं को बोलते हुए बड़ी होती है उसी तरह खड़ी बोली क्षेत्र के छोटे से इलाके को छोड़कर हिन्दी प्रदेश के ज्यादातर क्षेत्रों की अपनी एक स्थानीय भाषा है जिसे बोलचाल में बोली कहते हैं. इन भाषा क्षेत्रों के नागरिकों ने स्वतंत्रता संग्राम की भावना के अनुरूप हिन्दी को राजकाल और शिक्षा की भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया है इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वे अपनी पहली भाषा भूल चुके हैं. हिन्दी पट्टी के ज्यादातर बच्चे स्कूल जाने से पहले बनारसी, अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मैथिली, बुन्देली, मारवाड़ी इत्यादि सीख चुके होते हैं.

अवधी, गुजराती, भोजपुरी, मराठी इत्यादि का इतिहास लगभग समकालीन है. बस इन सभी साहित्य की भाषा से आगे बढ़कर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भाषा के  रूप में विकास की यात्रा भिन्न रही है. सदियों की कोलोनियल लूट से जर्जर हो चुके देश के सीमित संसाधनों में यह बेहद विवेकवान निर्णय था कि 70-80 परस्पर समान भाषाएँ अलग-अलग रहा पकड़ने के बजाय एक साझा राह हिन्दी की पकड़ें जो पहले से ही उनके बीच सम्पर्क बोली के रूप में स्वीकार्य है. हिन्दी प्रदेश की बोलियों की यह आपसी एकता ने हिन्दी को इतना ताकतवर बना दिया है कि अब वह दुनिया की सर्वाधिक प्रसार वाली भाषाओं में शुमार हो चुकी है.

क्या यूपी के लोग तीसरी भाषा नहीं पढ़ते?

ताजा विवाद में यह भ्रम फैलाने का भी प्रयास किया गया कि यूपी के लोग स्कूल में तीसरी भाषा नहीं पढ़ते हैं! हकीकत यह है कि यूपी के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे पहली भाषा घर पर सीख चुके होते हैं और स्कूल जाकर वे दूसरी, तीसरी और चौथी भाषा पढ़ते हैं. मेरे स्कूल में तीसरी भाषा के लिए संस्कृत, बांग्ला और उर्दू में से किसी एक को चुनना होता था. इनमें एक अप्रचलित क्लासिक लैंग्वेज है और उर्दू की लिपि अरबी मूल की है और उसके लिखने का तरीका भी हिन्दी से ठीक उलट है. प्राचीन क्लासिक लैंग्वेज सीखना हमेशा कठिन माना जाता है और सर्वथा अलग लिपि सीखना भी कठिन माना जाता है.

यूपी के स्कूली छात्र यदि तमिल या तेलुगु नहीं सीखते तो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वे तीसरी भाषा (दरअसल चौथी) भाषा सीखने के श्रम से बच नहीं जाते हैं. व्यावहारिक सत्य यह है कि तमिलनाडु के छात्र स्कूल में महज दो भाषा पढ़ते आ रहे हैं मगर यूपी के छात्र अपनी पहली भाषा में बोलने के साथ, दूसरी, तीसरी और चौथी भाषा स्कूल में पढ़ते हैं और अपनी प्रथम भाषा और द्वितीय भाषा बोलना जानते हैं. यही कारण है कि मैंने ऊपर त्रिभाषा नीति से असहमति जाहिर की है क्योंकि यह अपने मकसद में विफल रहने के साथ ही उन प्रदेशों के बच्चों के सिर पर बोझ बन चुकी है जिन्होंने त्रिभाषा नीति लागू की है. अतः यह भ्रम नहीं फैलाना चाहिए कि हिन्दी वाले केवल दूसरों को हिन्दी सिखाना चाहते हैं मगर खुद कोई दूसरी भाषा नहीं सीखते हैं! 

भाषा विवाद का मध्यम मार्ग

आधुनिक भारत के सन्दर्भ में देखें तो जिस कांग्रेस ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित किया और जिसने त्रिभाषा नीति की अवधारणा प्रस्तुत करके उसे लागू किया वह कांग्रेस अब राजनीतिक कारणों से हिन्दी पर अपने पुराने रुख  पर चुप साधती दिख रही है. हिन्दी को लेकर जो आरोप कभी कांग्रेस पर लगते थे, वही आज भाजपा पर लग रहे हैं. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य देखकर ऐसा नहीं लगता है कि तमिलनाडु की डीएमके सरकार का हिन्दी विरोध और त्रिभाषा विरोध खत्म होने वाला है.  ऐसे में व्यावहारिक समाधान यही है कि भारत के सभी प्रदेशों के छात्र एक राज्य भाषा और एक लिंक-लैंग्वेज (फिलहाल इंग्लिश) स्कूल में पढ़ें. एकता की भाषा के रूप में उभरी हिन्दी ने देश को आजादी दिलाने में केंद्रीय भूमिका निभायी मगर आजादी मिलने के बाद भी कोलोनियल दौर के इंग्लिश-विरोध के जारी रहने के कारण हिन्दी पट्टी को कई आर्थिक अवसरों से वंचित रह जाना पड़ा.

भले ही दक्षिण भारत के स्कूलों में हिन्दी न पढ़ायी जाए मगर वहां की फिल्में आज हिन्दी समेत कई भारतीय भाषाओं में एक साथ रिलीज हो रही हैं. आज हम क्रिकेट मैच की कमेंट्री विभिन्न भारतीयों भाषाओं में एक साथ सुन सकते हैं. मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने किसी भी भाषा के लेख या भाषण को रियलटाइम में अनूदित करके सुनने-पढ़ने की सुविधा प्रदान कर दी है. यानी स्कूल में न पढ़ाया जाए तो भी हिन्द में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का क्रम थमने वाला नहीं है. कौन जाने भविष्य में फिर से देश के अन्दर स्वतंत्रता संग्राम वाली सांस्कृतिक एकता की भावना अति-प्रबल हो जाए और स्वतः ही भारत के लोग अपने लिए भारतयीय मूल की किसी भाषा को आधिकारिक सम्पर्क भाषा के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाएं. तब तक के लिए हिन्दी पट्टी को भी त्रिभाषा के बोझ से मुक्त करना चाहिए और हिन्दी-विरोधी मानसिकता वालों को हिन्दी का इतिहास और उससे जुड़े तथ्यों को ध्यान में रखकर ही पॉलेमिक करना चाहिए.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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