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End-of-Life Vehicles Rules: ऑटो सेक्टर में हलचल! सरकार के इस फैसले से मुनाफे पर लग सकता है ब्रेक

End-of-Life Vehicle Rules 2025 से ऑटो कंपनियों पर बड़ा वित्तीय असर पड़ सकता है. आइए जानें EPR नियम क्या है और इससे कंपनियों को कितना नुकसान हो सकता है.

भारत सरकार ने जनवरी 2025 में End-of-Life Vehicle Rules लागू किए, जिनका सीधा असर ऑटोमोबाइल कंपनियों पर पड़ रहा है. इस नियम का मकसद पुराने वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है, लेकिन इससे कंपनियों की चिंता बढ़ गई है. अब कंपनियों को अपने पुराने बेचे गए वाहनों की जिम्मेदारी भी लेनी होगी. इसका मतलब है कि अगर भविष्य में कंपनी अपना काम बंद करती है, तो उसे पहले बेचे गए वाहनों से जुड़े पर्यावरणीय खर्च को भी संभालना पड़ेगा. यही वजह है कि यह नियम ऑटो इंडस्ट्री के लिए बड़ा बदलाव लेकर आया है.

EPR नियम क्या है और क्यों बढ़ी टेंशन?

दरअसल, इस नए नियम में Extended Producer Responsibility (EPR) को लागू किया गया है. इसका मतलब है कि वाहन बनाने वाली कंपनी को अपने प्रोडक्ट की पूरी लाइफ तक जिम्मेदारी लेनी होगी. नियम के अनुसार, कंपनियों को पिछले 20 साल में बेचे गए निजी वाहनों और 15 साल में बेचे गए कमर्शियल वाहनों के लिए भी संभावित खर्च का हिसाब रखना होगा. यह खर्च पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए किया जाएगा. ऑडिटर्स का मानना है कि इस नियम के कारण कंपनियों को अपनी अकाउंटिंग बुक में बड़ा प्रावधान जोड़ना पड़ेगा. इससे उनकी बैलेंस शीट पर सीधा असर पड़ेगा और मुनाफा कम हो सकता है.

ऑटो कंपनियों पर वित्तीय दबाव कैसे बढ़ेगा?

ऑटो कंपनियों का कहना है कि भले ही वे अपना बिजनेस बंद नहीं कर रही हैं, फिर भी उन्हें इस नियम के तहत बड़ा फंड अलग रखना पड़ेगा. इससे कई तरह की दिक्कतें सामने आ सकती हैं. सबसे पहले, कंपनियों का कैश फ्लो प्रभावित होगा. यानी उनके पास निवेश के लिए कम पैसा बचेगा. इसके अलावा, सालाना मुनाफा भी कम हो सकता है. इससे नई टेक्नोलॉजी जैसे इलेक्ट्रिक वाहन (EV) में निवेश पर असर पड़ सकता है. इस तरह यह नियम सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा नहीं है, बल्कि कंपनियों की ग्रोथ पर भी असर डाल सकता है.

SIAM और एक्सपर्ट्स की चिंता

ऑटो इंडस्ट्री की बड़ी संस्था SIAM ने भी इस नियम को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने सरकार से इसमें बदलाव की मांग की थी, लेकिन मार्च 2026 के नोटिफिकेशन में कोई बदलाव नहीं किया गया. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पर्यावरणीय लागत तय कर दी जाती है, तो कंपनियों को एक साथ बहुत बड़ा खर्च दिखाना पड़ेगा. अनुमान है कि करीब 25,000 करोड़ रुपये का असर पड़ सकता है. यह ऑटो सेक्टर के लिए बड़ा झटका हो सकता है.

किन कंपनियों पर कितना असर पड़ेगा?

इस नियम का असर अलग-अलग सेगमेंट पर अलग तरह से पड़ेगा. चार पहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ सकता है, जिन पर करीब 14,623 करोड़ रुपये का असर अनुमानित है. वहीं दो और तीन पहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों पर भी लगभग 9,650 करोड़ रुपये का असर हो सकता है. कुल मिलाकर ऑटो इंडस्ट्री को लगभग 25,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान झेलना पड़ सकता है. यह आंकड़ा दिखाता है कि यह नियम कितना बड़ा वित्तीय असर डाल सकता है.

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