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10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि नहीं मालूम, उनका श्राद्ध कैसे करें?

Sarva Pitru Amavasya 2026: सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026 को है. पूर्वजों की मृत्यु तिथि, नाम या गोत्र न मालूम हो तो श्राद्ध कैसे करें? जानें संकल्प, तर्पण और जरूरी नियम.

Sarva Pitru Amavasya 2026: दादा-परदादा की मृत्यु तिथि याद नहीं है या इस पितृ पक्ष में किसी अपने का श्राद्ध छूट गया है? सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है. जानिए संकल्प कैसे लें और घर पर किन बातों का ध्यान रखें.

घर में पुरानी तस्वीरें हैं. दादा-दादी के किस्से भी याद हैं. लेकिन उनसे पहले की पीढ़ियों में किसका निधन किस तिथि पर हुआ था, यह बताने वाला अब कोई नहीं है. कई परिवारों में मृत्यु की अंग्रेजी तारीख लिखी मिलती है, हिंदू पंचांग की तिथि नहीं.

ऐसे में पितृ पक्ष आते ही सवाल उठता है, जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि नहीं मालूम, उनका श्राद्ध किस दिन करें?

इसका उत्तर है सर्वपितृ अमावस्या. वर्ष 2026 में यह 10 अक्टूबर, शनिवार को है. पितृ पक्ष के इस अंतिम दिन उन दिवंगत पूर्वजों के निमित्त भी श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि अज्ञात हो या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो.

मृत्यु की तारीख और श्राद्ध की तिथि में क्या अंतर है?

श्राद्ध का दिन तय करते समय अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख और हिंदू पंचांग की तिथि का अंतर समझना जरूरी है. उदाहरण के लिए, किसी का निधन 15 अक्टूबर को हुआ था तो हर वर्ष 15 अक्टूबर को ही उसका तिथि-श्राद्ध हो, यह जरूरी नहीं. इसके लिए निधन के समय की चंद्र तिथि देखी जाती है.

यदि मृत्यु की तारीख, वर्ष और स्थान उपलब्ध हैं, तो पंचांग के जानकार से संबंधित तिथि निकलवाई जा सकती है. समय भी मालूम हो तो तिथि बदलने की स्थिति में निर्णय अधिक स्पष्ट होता है. लेकिन पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध न हो तो अनुमान से कोई तिथि तय करने की जरूरत नहीं. पितृ पक्ष में ऐसे पूर्वजों को याद करने के लिए सर्वपितृ अमावस्या की परंपरा है.

नाम या गोत्र भी याद न हो तो संकल्प कैसे लें?

बहुत पुरानी पीढ़ियों के सभी नाम याद होना संभव नहीं. सर्वपितृ अमावस्या का भाव ही अपने ज्ञात और अज्ञात दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करना है. जिनके नाम और संबंध मालूम हैं, उनका उल्लेख करें. बाकी पूर्वजों के लिए सामूहिक रूप से प्रार्थना कर सकते हैं.

सरल हिंदी में अपनी भावना इस तरह व्यक्त की जा सकती है- मैं अपने पितृ और मातृ पक्ष के उन सभी दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करता/करती हूं, जिनके नाम मुझे ज्ञात हैं और जिनके नाम या मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हैं. उनके निमित्त यह जल और अन्न अर्पित करता/करती हूं.

यह भाव व्यक्त करने का उदाहरण है, विधिवत संस्कृत संकल्प का विकल्प नहीं. पुरोहित से श्राद्ध करा रहे हों तो उन्हें पहले बता दें कि किन पूर्वजों की तिथि, नाम या गोत्र की जानकारी उपलब्ध नहीं है. कोई विवरण अपनी ओर से गढ़कर न बताएं.

घर पर तर्पण कैसे करें?

प्रचलित पितृ-तर्पण विधि में स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर दक्षिण दिशा की ओर मुख किया जाता है. स्वच्छ जल, काले तिल और कुश का प्रयोग होता है. पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है. हालांकि मंत्र, जल अर्पण का क्रम और अन्य नियम परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं. पहली बार कर रहे हों तो किसी जानकार से विधि समझ लें.

यहां एक अंतर समझना जरूरी है. तर्पण में जल अर्पित किया जाता है, जबकि विधिवत श्राद्ध में संकल्प, पिंडदान, भोजन और अन्य कर्म परंपरा के अनुसार शामिल हो सकते हैं. इसलिए केवल तिल मिला जल अर्पित करने को हर स्थिति में पूरा श्राद्ध बताना सही नहीं होगा.

श्राद्ध का समय कैसे चुनें?

श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल का महत्व बताया जाता है. इनके समय शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त के अनुसार बदलते हैं. इसलिए दिल्ली का मुहूर्त पूरे देश के लिए लागू न मानें. 10 अक्टूबर को अपने शहर के पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार समय चुनें.

सुबह स्नान और आवश्यक तैयारी कर सकते हैं. भोजन, सामग्री और पुरोहित की व्यवस्था पहले कर लेने से निर्धारित समय पर कर्म पूरा करना आसान होगा.

भोजन और दान में क्या रखें?

परिवार की परंपरा के अनुसार सात्त्विक भोजन तैयार किया जाता है. कई घरों में खीर, पूड़ी, चावल और दाल बनती है. प्याज-लहसुन से परहेज किया जाता है. भोजन में गाय, कौए और कुत्ते के लिए अंश निकालने की परंपरा भी मिलती है.

विधिवत श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा की व्यवस्था अपने कुलाचार के अनुसार करें. पूर्वजों की स्मृति में जरूरतमंदों को भोजन या अन्न देना भी कर सकते हैं. लेकिन सामान्य दान और श्राद्ध के निर्धारित कर्मों को एक ही चीज न समझें.

इस पितृ पक्ष में श्राद्ध छूट गया है तो?

किसी पूर्वज की तिथि मालूम होने के बावजूद बीमारी, यात्रा या दूसरी मजबूरी से श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है. इसका अर्थ यह नहीं कि आगे से ज्ञात मृत्यु तिथि की उपेक्षा कर दी जाए.

जिन परिवारों के पास पुराने रिकॉर्ड नहीं हैं, उनके लिए 10 अक्टूबर अपने दिवंगत पूर्वजों को सामूहिक रूप से याद करने का अवसर है. उपलब्ध जानकारी के साथ संकल्प लें, परिवार की विधि का पालन करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए नाम, संबंध तथा मृत्यु तिथि का रिकॉर्ड संभालकर रखें.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

हृदेश कुमार सिंह । Hirdesh Kumar Singh 

Senior Vedic Astrologer । Head – Religion & Astrology, ABP Live । Lead – ABP Dharma LIVE

हृदेश कुमार सिंह वरिष्ठ वैदिक ज्योतिषाचार्य और मीडिया पेशेवर हैं. उन्हें ज्योतिष, धर्म और मीडिया के क्षेत्र में 17 साल से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे ABP Live में Religion & Astrology वर्टिकल का नेतृत्व करते हैं. साथ ही ABP Dharma LIVE की कंटेंट और डिजिटल रणनीति की जिम्मेदारी संभालते हैं.

उनके काम में ज्योतिषीय लेखन, संपादन, वेबसाइट और वीडियो के लिए विषय चयन तथा संपादकीय योजना शामिल है. वे Search, Google Discover और सोशल मीडिया पर पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर धर्म और ज्योतिष की कवरेज तय करते हैं.

पंचांग, राशिफल, ग्रह गोचर, व्रत-त्योहार और धार्मिक परंपराएं उनके लेखन के प्रमुख विषय हैं. वे करियर, विवाह, शिक्षा और व्यापार से जुड़े सवालों पर भी लिखते हैं. राजनीति और सामाजिक घटनाओं पर उनके ज्योतिषीय विश्लेषण वैदिक गणना, गोचर और मेदिनी ज्योतिष पर आधारित होते हैं. इनमें ग्रह स्थितियों को संभावित संकेतों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

उन्होंने Indian Institute of Mass Communication (IIMC), नई दिल्ली से पत्रकारिता और IIMT University, मेरठ से ज्योतिष शास्त्र एवं वास्तु शास्त्र की शिक्षा ग्रहण की है. वे AstroSage और Astrotalk जैसे प्लेटफॉर्म के साथ भी काम कर चुके हैं. उन्होंने Semrush Academy से 'Content Marketing Essentials for SEO and AI Search with Semrush' सर्टिफिकेशन प्राप्त किया है.

नई पीढ़ी के पाठकों के लिए उन्होंने 'Gen-Z Horoscope' जैसे प्रारूप पर काम किया है. इसमें पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और रोजमर्रा के फैसलों से जुड़े सवालों को राशिफल में जगह दी गई है. उनके लेख धार्मिक परंपराओं से जुड़े उन प्रश्नों पर भी केंद्रित होते हैं, जो बदलती जीवनशैली में सामने आते हैं.

वैदिक ज्योतिष, होरा शास्त्र, संहिता, मेदिनी ज्योतिष, अंक ज्योतिष, शकुन शास्त्र और वास्तु उनके अध्ययन एवं लेखन के विषय हैं. उनका मानना है, 'ज्योतिष केवल भविष्य बताने की विद्या नहीं, बल्कि समय को समझने की कला है.'

ज्योतिष और मीडिया के अलावा उन्हें सिनेमा, संगीत, साहित्य, राजनीति, पर्यावरण, ग्रामीण जीवन और यात्राओं में विशेष रुचि है.

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