पराली जलाने की जरूरत नहीं, मिट्टी से भी कमा सकते हैं पैसे
जाने कैसे बन रही है पराली किसानों के लिए कमाई का एक नया जरिया, साथ ही पराली जलाने के बजाय उसे मिट्टी में मिलाकर कार्बन रोकने का तरीका भी पर्यावरण के लिए बेहद लाभकारी

हर साल फसल कटने के बाद खेतों में बची पराली किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है. इसे जल्दी हटाने के लिए कई जगह पराली जलाई जाती है, जिससे हवा में धुआं फैलता है और प्रदूषण बढ़ता है. अब पराली को जलाने के बजाय खेत की मिट्टी में मिलाकर रखने का तरीका अपनाया जा रहा है. इससे मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद मिलती है और वातावरण में कार्बन की मात्रा को कम रखने में भी मदद मिलती है. खास बात यह है कि इस काम से किसानों को कमाई का मौका भी मिल रहा है.
पराली जलाने के बजाय खेत में ही करें इस्तेमाल
फसल काटने के बाद खेत में बची पराली को जलाने की जगह मिट्टी में मिलाया जा सकता है. इसके लिए किसान मशीनों की मदद से पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में मिला सकते हैं. धीरे-धीरे यह पराली मिट्टी का हिस्सा बनती है और उसमें जैविक पदार्थ बढ़ाती है. इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने और उसकी गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलती है. पराली को खेत में ही इस्तेमाल करने से उसे जलाने की जरूरत कम होती है. इसका सीधा फायदा हवा की गुणवत्ता पर भी पड़ता है, क्योंकि खेतों में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं आसपास के इलाकों में प्रदूषण बढ़ाता है.
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मिट्टी में कार्बन रखने का क्या मतलब है ?
मिट्टी में पौधों के अवशेष मिलाने से उनमें मौजूद कार्बन का कुछ हिस्सा मिट्टी में लंबे समय तक बना रहता है. इसी प्रक्रिया को कार्बन सिक्वेस्ट्रेशन कहा जाता है. आसान भाषा में इसमें हवा में मौजूद कार्बन को मिट्टी और पौधों के जरिए लंबे समय तक रोककर रखने की कोशिश की जाती है. स्वस्थ मिट्टी में कार्बन का होना खेती के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. इससे मिट्टी की संरचना और पानी रोकने की क्षमता बेहतर करने में मदद मिलती है. इसलिए पराली को सिर्फ कचरा मानने के बजाय खेती में दोबारा इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है.
किसानों को कैसे मिल सकता है पैसा?
कार्बन को मिट्टी में रोकने वाले काम को अब कार्बन क्रेडिट से भी जोड़ा जा रहा है. कुछ कंपनियां ऐसे प्रोजेक्ट चलाती हैं जिनमें किसानों को खेत में पराली न जलाने और मिट्टी में कार्बन बढ़ाने जैसी गतिविधियों के लिए जोड़ा जाता है. इन गतिविधियों से कार्बन क्रेडिट तैयार किए जाते हैं. कंपनियां इन क्रेडिट को खरीदती हैं और इसके बदले किसानों को भुगतान किया जाता है.
हालांकि, हर किसान को सीधे विदेशी कंपनी से पैसा नहीं मिलता. इसके लिए किसी मान्यता प्राप्त योजना या कंपनी के साथ जुड़ना, खेत से जुड़े आंकड़े देना और यह साबित करना जरूरी होता है कि तय तरीके से खेती की गई है. भुगतान की रकम भी योजना और कार्बन क्रेडिट की कीमत के हिसाब से अलग-अलग होती है. इसलिए किसान किसी भी योजना में शामिल होने से पहले उसकी पूरी जानकारी और नियम जरूर जांचें.
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