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राष्ट्रपति भवन में किस-किस चीज की खेती होती है, कौन करता है यहां किसानी?

Rashtrapati Bhawan Farming: राष्ट्रपति भवन के अमृत उद्यान और आरोग्य वनम् में आम, अमरूद जैसी बागवानी फसलों के साथ-साथ सैकड़ों कीमती जड़ी-बूटियों की आर्गेनिक खेती होती है. जानें कौन करता है यहां खेती.

Rashtrapati Bhawan Farming: देश के राष्ट्रपति का निवास जिसे राष्ट्रपति भवन कहा जाता है. नई दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित 330 एकड़ का भवन सिर्फ सत्ता का केंद्र ही नहीं है. बल्कि इस आलीशान एस्टेट का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल हरियाली, पेड़-पौधों और औषधीय बागों के लिए सुरक्षित रखा गया है. राष्ट्रपति भवन का इस ग्रीन जोन में बकायदा फल, सब्जियां और कीमती जड़ी-बूटियों को उगाया जाता है. 

यहां आने वाले मेहमान जिन्हें देख के हैरान रह जाते है. राष्ट्रपति भवन के इस बड़े हिस्से में वनस्पति और तरह-तरह की चीजें उगाईं जाती है. यह पूरी जगह इतनी शानदार तरीके से मैनेज की जाती है कि यह किसी मॉडर्न फार्महाउस से कम नहीं लगती.  जान लीजिए यहां किन-किन चीजों की होती है खेती और कौन करता है इन फसलों की देखभाल.

किन-किन चीजों की होती है यहां खेती?

राष्ट्रपति भवन के भीतर बने अलग-अलग उद्यानों, जैसे अमृत उद्यान और आरोग्य वनम् में कई तरह की फसलों और पौधों की खेती की जाती है. यहां बड़े पैमाने पर आम, अमरूद, जामुन, संतरा और नींबू जैसे फल देने वाले बाग मौजूद हैं. इसके अलावा, रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए ताजी सब्जियां भी यहीं उगाई जाती हैं. 

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यहां आरोग्य वनम्में  एलोवेरा, घृतकुमारी, चित्रक और वर्षा जैसी सैकड़ों कीमती जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों की आर्गेनिक खेती होती है. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के समय से ही प्रकृति के संरक्षण की इस परंपरा को बहुत बढ़ावा मिला जो कि आज तक जारी है.

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कौन संभालता है यहां किसानी का जिम्मा?

अब सवाल उठता है कि देश के सबसे सुरक्षित भवन में यह किसानी करता कौन है. राष्ट्रपति भवन में खेती और बागवानी का काम कोई एक आम इंसान नहीं. बल्कि बकायदा ट्रेनर्स, एग्रीकल्चर एक्सपर्ट्स और सरकारी मालियों की एक पूरी प्रोफेशनल टीम संभालती है.

राष्ट्रपति भवन के उद्यान विभाग की देखरेख में आधुनिक और प्राकृतिक तरीकों से पौधों को सींचा जाता है. समय-समय पर देश के प्रगतिशील किसानों को भी यहां अपने सुझाव देने और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को शेयर करने के लिए आमंत्रित किया जाता है. यह टीम मिलकर यह तय करती है कि किस तरह राष्ट्रपति भवन हरा-भरा रहे.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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