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Permaculture: क्या है पर्माकल्चर खेती, विदेश में किसानों को मालामाल बनाने वाली ये तरकीब, देसी किसानों की बढ़ाएगी आमदनी

Permaculture Farming: इसे 'कृषि का स्वर्ग' कहें तो गलत नहीं होगा, क्योंकि पेड़, फसल, मवेशी, पक्षी, मछलियां, झाड़ी एक इकोसिस्टम बना देते हैं. कम खर्च में किसानों की आय बढ़ाने की ये तरकीब शानदान है.

Integrated Farming: खेती-किसानी में आए दिन नए बदलाव हो रहे हैं. कुछ कृषि वैज्ञानिकों के आविष्कार का नतीजा है तो कुछ किसानों के इनोवेशन का. आज हमारा देश भी कृषि के क्षेत्र में काफी मजबूत बनकर उभर रहा है, यहां कृषि में चुनौतियां तो हैं, लेकिन उसका समाधान भी निकल आता है. इन दिनों किसानों के आगे सबसे बड़ी मुश्किल है खेती की बढ़ती लागत, जिसके चलते किसान सही मुनाफा नहीं ले पाते. ये प्रॉफिट ही किसानों को खेती से जोड़े रखने के लिए आवश्यक है. विदेशी किसानों के आगे ये समस्या नहीं है, क्योंकि वहां के किसान 'पर्माकल्चर' खेती पर काम कर रहे हैं.

एक ऐसा इको-सिस्टम, जिसमें फसल, झाडियां, पेड़-पौधे, पशु, पक्षी, मछली आपस में ही एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं. एक तरीके से देखा जाए तो भारत की एकीकृत कृषि प्रणाली से मिलता जुलता है, जिसमें खेती के साथ-साथ बागवानी, वानिकी, पशुपालन, मुर्गी पालन, मछली पालन, खाद निर्माण, पशु चारा उत्पादन, सिंचाई आदि का काम एक स्थाई जमीन पर होता है.

इसे परमानेंट एग्रीकल्चर यानी पर्माकल्चर भी कहते हैं. एक बार शुरुआती खर्च करना होता है, जिसके बाद ये इकोसिस्टम आपस में हर चीज की आपूर्ति करता रहता है और कम से कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन हासिल कर सकते हैं.

मोटी कमाई का डिजाइन है पर्माकल्चर
कोई भी किसान अपने खेत को पर्माकल्चर में तब्दील कर सकता है. छोटे किसानों के लिए तो यह तरकीब वरदान से कम नहीं है. छोटी जमीन से अधिक मुनाफा कमाने के लिए पर्माकल्चर से अच्छा ऑप्शन ही शायद कुछ हो. इस कृषि पद्धति में सबसे ज्यादा फोकस पानी के प्रबंधन और मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाने पर रहता है. मिट्टी की संरचना बेहतर रहेगी तो 1 एकड़ जमीन से भी लाखों का मुनाफा ले सकते हैं. 

  • पर्माकल्चर खेती कमाई का साधन तो है ही, इससे पर्यावरण संरक्षण और जैवविविधता को भी कई फायदे होते हैं.
  • सबसे अच्छी बात तो यह है कि पर्माकल्चर में अलग से आपको कुछ निवेश नहीं करना. खासतौर पर किसानों के पास गांव में हर तरह के संसाधन होते हैं. 
  • पर्माकल्चर की मदद से किसान को कम खर्च में अलग-अलग प्रकार का उत्पादन (उत्पादन में विविधता) और अधिक मात्रा में प्रोडक्शन हासिल करने में मदद मिलती है.
  • इसे पैसा बचाकर,पैसा कमाने वाला सिस्टम भी कहते हैं, क्योंकि पशुओं के अवशिष्ट से खाद-उर्वरक बनाए जाते हैं, जिससे रसायनिक उर्वरकों का खर्चा बचता है.
  • इसके बदल में पशुओं को खेत से ही तमाम फसलों के अवशेष खाने के लिए दिए जाते हैं, जिससे दूध का उत्पादन मिलता है.
  • पानी का सही प्रबंधन करके सिंचाई का खर्चा बचाया जा सकता है. फिर इसी पानी में मछलियां भी पाल सकते हैं.
  • इसके लिए खेत के एक हिस्से में तालाब बनाते हैं, जहां बारिश का पानी इकट्ठा होता है.

इस कृषि पद्धति का कोई नुकसान नहीं है. यदि किसान खेत को पर्माकल्चर के तहत डिजाइन करते हैं तो पर्यावरण के साथ-साथ किसान की हर आवश्यकता खेत की चारदीवारी से ही पूरी हो जाएगी.

भारत में वैदिक काल से हो रहा पर्माकल्चर
आज के आधुनिक दौर में तकनीक, मशीन और विज्ञान ने खेती के स्वरूप को बदल कर रख दिया है, लेकिन भारत ने भी परंपरागत विधियों से दुनियाभर में अपना लोहा मनवाया है. आज कृषि उत्पादन में भारत आगे है ही, यहां से ना जाने कितने ही देशों की खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है. बड़े पैमाने पर कृषि खाद्य उत्पादों का निर्यात हो रहा है. हम बेशक खेती में एडवांस रहने के लिए विदेशी कल्चर अपना रहे हों, लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जो विदेश में रहने वाले लोगों ने भारत से इंसपायर होके चालू की हैं. पर्माकल्चर उन्हीं में से एक है.

आपको सुनने में अटपटा लगे, लेकिन भारत के लिए पर्माकल्चर कोई नई विधि नहीं है. भारत में ऐसी कृषि पद्धति का प्रचलन तो वैदिक काल से है, क्योंकि भारत ने शुरुआत से ही जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण का कम करते हुए खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित की है, हालांकि बीच के कुछ दशकों में कृषि के क्षेत्र में काफी बदलाव हुए हैं, जिससे हम अपनी ही वैल्यू को भुलाते जा रहे हैं.

आपको बता दें कि पर्माकल्चर जैसी खेती भारत में युगों-युगों से चली आ रही है. इसमें किसान परंपरागत तरीके से खेती करते हैं. पर्यावरण संतुलन के लिए खेत के चारों ओर पेड़ लगाते हैं. पशु पालते हैं, जिनसे खेतों की जुताई होती है. इन पशुओं को खेतों से निकला चारा दिया जाता है, बदले में पशु दूध और गोबर देते हैं. दूध को किसान अपने व्यक्तिगत काम में लेते हैं या बेच देते हैं तो गोबर का इस्तेमाल खेती के लिए खाद बनाने में किया जाता है.

इस तरह आपसी आवश्यकताएं पूरी होती रहती हैं. बाहर से कुछ खर्चा नहीं होता, बल्कि आपस में बेलेंस बना रहता है. इन दिनों खेती के लिए बीज खरीदने का चलन बढ़ा है, जो बदलती जलवायु के अनुरूप है, लेकिन पुराने समय में फसल से बीजों को बचाकर अगले सीजन को लिए इकट्ठा किया जाता था, इसलिए पौराणिक काल से ही खेती कभी खर्च का काम थी ही नहीं, बल्कि एक संतुलन का काम था.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. किसान भाई, किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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