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सब्जी की खेती में अपनाएं ये तकनीक, सरकार उठाएगी आधा खर्च

मौसम की मार और भारी नुकसान से परेशान सब्जी किसानों के लिए सरकार ने एक जबरदस्त राहत भरी स्कीम पेश की है. कैसे उठाएं इस स्कीम का फायदा? जान लें पूरी खबर.

सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के सामने मौसम सबसे बड़ी चुनौती बनकर आता है. कभी ज्यादा बारिश, ओलावृष्टि और अचानक बदलता तापमान कुछ ही घंटों में तैयार फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. खुले खेत में कीटों का हमला भी ज्यादा होता है. जिससे किसानों का दवा पर भी खर्च बढ़ जाता है. उत्पादन में गिरावट आने पर बाजार में मिलने वाले अच्छे भाव का फायदा भी नहीं मिल पाता. ऐसे में संरक्षित खेती किसानों के लिए बेहतर ऑप्शन बन रही है.

पॉलीहाउस और नेट हाउस की मदद से किसान फसल के आसपास का वातावरण काफी हद तक कंट्रोल कर सकते हैं. इसमें सब्जियों को मौसम की सीधी मार से बचाने के साथ बेहतर क्वालिटी का उत्पादन लेना आसान हो सकता है. हालांकि इस तकनीक का शुरुआती खर्च ज्यादा आता है. इसलिए बहुत से किसान इसे अपनाते नहीं थे.लेकिन अब मध्य प्रदेश सरकार इस खर्च का बड़ा हिस्सा अनुदान के रूप में दे रही है. अगर आप सब्जियों की खेती करते हैं तो जान लें इस मदद का फायदा कैसे मिलेगा.

पॉलीहाउस और नेट हाउस में क्या है अंतर?

पॉलीहाउस एक ढका हुआ स्ट्रक्चर होता है. जिसमें खास प्लास्टिक शीट की मदद से फसल के लिए बेहतर माहौल तैयार किया जाता है. इसके अंदर तापमान, नमी और सिंचाई को मैनेज करना आसान रहता है. किसान इसमें शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर और दूसरी हाई वैल्यू सब्जियों की खेती कर सकते हैं. पौध तैयार करने वाली नर्सरी के लिए भी पॉलीहाउस का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे खराब मौसम के दौरान भी पौधों की ग्रोथ जारी रखी जा सकती है.

नेट हाउस में प्लास्टिक शीट की जगह खास जाली का इस्तेमाल होता है. यह फसल को तेज धूप, कीट और कुछ हद तक खराब मौसम से सुरक्षा देती है. इसका खर्च पॉलीहाउस के मुकाबले कम हो सकता है. इसमें पत्तेदार सब्जियां, फूल और कई दूसरी बागवानी फसलें उगाई जा सकती हैं. किसान को स्ट्रक्चर चुनने से पहले अपने इलाके के मौसम, फसल की जरूरत और बाजार की डिमांड को समझना चाहिए. बिना प्लानिंग के बड़ा स्ट्रक्चर बनाने पर लागत निकालने में ज्यादा समय लग सकता है.


सब्जी की खेती में अपनाएं ये तकनीक, सरकार उठाएगी आधा खर्च

किसानों को मिल सकता है 50 प्रतिशत अनुदान

मध्य प्रदेश में उद्यानिकी विभाग की तरफ से संरक्षित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. पॉलीहाउस और नेट हाउस तैयार कराने पर किसानों को तय यूनिट कॉस्ट का 50 प्रतिशत अनुदान मिल सकता है. पॉलीहाउस के लिए अधिकतम मदद करीब 17 लाख रुपये तक पहुंच सकती है. कुल रकम स्ट्रक्चर के प्रकार, साइज, कितनी लागत स्वीकृत हुई है और विभाग के नियम क्या हैं इस पर तय होगी. 

अनुदान का फायदा लेने से पहले विभाग से अपने प्रोजेक्ट की मंजूरी लेना जरूरी है. पहले स्ट्रक्चर बनवाकर बाद में सब्सिडी मांगने पर आवेदन रिजेक्ट हो सकता है. स्ट्रक्चर का कंस्ट्रक्शन भी विभाग की गाइडलाइन और तय टेक्निकल स्टैंडर्ड के तहत होना चाहिए. आवेदन मंजूर होने के बाद अधिकारी जमीन और तैयार स्ट्रक्चर का निरीक्षण कर सकते हैं. सभी शर्तें पूरी मिलने पर सब्सिडी की रकम तय प्रोसेस के तहत जारी की जाती है. किसान को अपने हिस्से का खर्च भी पहले से तैयार रखना होगा.

यह भी पढ़ें: किसान बेहद कम खर्च में तैयार करें वेस्ट डीकंपोजर घोल, जानें ले प्रोसेस

ऑनलाइन ऐसे करें आवेदन

योजना में आवेदन करने के लिए किसान मध्य प्रदेश फार्मर्स सब्सिडी ट्रैकिंग सिस्टम यानी MPFSTS पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं. पोर्टल पर उद्यानिकी विभाग से जुड़ी योजना चुनकर रजिस्ट्रेशन पूरा करना होगा. आवेदन के दौरान आधार नंबर, मोबाइल नंबर, बैंक खाते की जानकारी और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड मांगे जा सकते हैं.


सब्जी की खेती में अपनाएं ये तकनीक, सरकार उठाएगी आधा खर्च

किसान का बैंक खाता आधार से लिंक होना चाहिए. पोर्टल पर मांगे गए सभी डॉक्यूमेंट साफ और सही फॉर्मेट में अपलोड करें.आवेदन सबमिट करने के बाद उसका रजिस्ट्रेशन नंबर अपने पास रखें. इसकी मदद से पोर्टल पर आवेदन का स्टेटस देखा जा सकता है. अगर विभाग को ज्यादा आवेदन मिलते हैं तो फिर सिलेक्शन की प्रोसेस लाॅटरी सिस्टम के तहत हो सकती है. 

यह भी पढ़ें: 90 दिन में तैयार हो जाता है चिप्सोना आलू, किसान कैसे करें इसकी खेती?

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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