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घर के बगीचे में उगा सकते हैं नाशपाती, जान लें तरीका

मीठा और रसीला फल नाशपाती अब आपके घर के बगीचे में बिना किसी परेशानी के उगाया जा सकता है. वह कौन सी खास किस्में हैं जो मैदानी मौसम में भी देंगी बंपर फल. जान लीजिए पूरी खबर.

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  • नियमित छंटाई करें, खाद डालें और फलों को सुरक्षित रखें.

बहुत से लोगों के घर में बगीचे का एक हिस्सा होता हैं. कई लोग इन बगीचों में कई तरह के पेड़ लगाते हैं. कुछ लोग इन बगीचों में फलदार पड़े भी लगाते हैं. ताकि उन्हें खाने के लिए ताजे फल मिल सकें. नाशपाती फल खाने में बहुत बढ़िया लगता है इसके कई हेल्थ बेनिफिट्स भी हैं. अक्सर लोगों को लगता है कि नाशपाती जैसे फलदार पेड़ सिर्फ हिमाचल या कश्मीर के ठंडे पहाड़ी बगीचों में ही फलते हैं. 

लेकिन अब नाशपाती ऐसी वॉर्म-क्लाइमेट और लो-चिलिंग वैराइटीज तैयार कर ली गई हैं.जो मैदानी इलाकों की सामान्य जलवायु और आपके घर के बगीचे में भी आसानी से लगाई जा सकती हैं. घर पर केमिकल-फ्री, ताजे और रसीले फल तोड़ने का जो सुख मिलता है. उसकी तुलना बाजार के महंगे फलों से नहीं की जा सकती. चलिए आपको बताते हैं घर पर नाशपाती लगाने का आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीका.

सही किस्म का चुनाव और जमीन की तैयारी

घर के बगीचे में नाशपाती लगाने के लिए सबसे पहले जरूरी उसकी सही किस्म चुनना. मैदानी और गर्म इलाकों के लिए बग्गूगोशा,पठानखोल या पंजाब ब्यूटी जैसी लो-चिलिंग वैराइटीज सबसे सही मानी जाती हैं. लगाने के लिए नर्सरी से हमेशा ग्राफ्टेड पौधा ही खरीदें. क्योंकि बीज से उगाया गया पेड़ फल देने में 7 से 10 साल लगा देता है.  जबकि ग्राफ्टेड पौधा 2 से 3 साल में फलने लगता है. 

अगर आप जमीन में लगा रहे हैं. तो 2x2 फीट का गड्ढा खोदें. वहीं अगर छत पर बड़े ग्रो बैग या कंटेनर में लगाना चाहते हैं. तो कम से कम 20 से 24 इंच गहरा पॉट चुनें. मिट्टी तैयार करने के लिए 50 फीसदी सामान्य दोमट मिट्टी, 30 फीसदी सड़ी गोबर की खाद, 10 फीसदी कोकोपीट और 10 फीसदी रेत मिलाकर पोरस पॉटिंग मिक्स बनाएं. जिससे पानी आसानी से निकल जाए.


घर के बगीचे में उगा सकते हैं नाशपाती, जान लें तरीका

पौधा लगाने का सही समय 

नाशपाती का पौधा लगाने का सबसे बेहतरीन समय सर्दियों का मौसम यानी दिसंबर से फरवरी के बीच होता है. जब पौधा डोरमेंसी में होता है. इसके अलावा जुलाई-अगस्त के मानसून के दिनों में भी इसे आसानी से शिफ्ट किया जा सकता है. नाशपाती को अच्छी ग्रोथ और फलों में मिठास भरने के लिए रोजाना कम से कम 6 से 7 घंटे की सीधी और तेज धूप चाहिए होती है. 

इसलिए इसे घर की ऐसी जगह लगाएं जहां पूरी रोशनी आती हो. पानी देने के मामले में थोड़ा बैलेंस बरतना जरूरी है. जमीन की ऊपरी 2 इंच मिट्टी सूखने पर ही भरपूर पानी दें. क्योंकि गमले में ज्यादा पानी भरने से जड़ें सड़ सकती हैं. गर्मियों के दिनों में नियमित रूप से नमी बनाए रखें. जबकि सर्दियों में पानी की क्वांटिटी घटा दें. गमले के ड्रेनेज होल को हमेशा खुला रखें जिससे पानी नीचे न रुके.

यह भी पढ़ें: एवोकाडो उगाने के लिए कैसी मिट्टी सही, जानें बुवाई का समय

इन बातों का रखें ध्यान

पेड़ को घना बनाने और भारी मात्रा में फल लेने के लिए छंटाई सबसे जरूरी काम है. हर साल जनवरी के महीने में सूखी, कमजोर या आपस में उलझने वाली टहनियों को प्रूनर से काट दें. जिससे नई शाखाओं पर ज्यादा कलियां और फूल आ सकें. पोषण की बात करें तो साल में दो बार एक बार फरवरी और दूसरी बार मानसून के बाद यानी सितंबर में पौधे के तने से थोड़ी दूर गुड़ाई करके 2 से 3 किलो केंचुआ खाद और दो मुट्ठी नीम खली जरूर डालें. 

जब पेड़ पर फूल खिल रहे हों, उस वक्त ज्यादा पानी न दें वरना फूल गिर सकते हैं. फल जब छोटे बेर के साइज के हों तो ज्यादा घने फलों में से कुछ को तोड़कर हटा दें जिससे बाकी फल बड़े और रसीले बन सकें. चिड़ियों और कीड़ों से बचाने के लिए फलों पर फ्रूट बैग्स लगा सकते हैं.

यह भी पढ़ें: दानेदार यूरिया या नैनो यूरिया, आपके खेत के लिए क्या बेहतर?

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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