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एवोकाडो उगाने के लिए कैसी मिट्टी सही, जानें बुवाई का समय

एवोकाडो की खेती अब भारतीय किसानों को बना रही है मालामाल. पर इसे लगाने के लिए खेत की मिट्टी में कौन सी खास खूबी होनी चाहिए और रोपाई का सबसे सही महीना कौन सा है? जान लीजिए इसकी खेती का पूरा तरीका.

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  • भारत में एवोकाडो की मांग बढ़ी है जिससे किसानों को मुनाफा कमाने का मौका मिल रहा है.
  • इसकी खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी और जून-जुलाई का समय रोपाई के लिए सही रहता है.
  • ग्राफ्टेड पौधे 3-4 साल में फल देते हैं जिससे मोटा मुनाफा हो सकता है.

सुपरफूड्स की बढ़ती डिमांड के बीच भारतीय बाजारों में एवोकाडो की मांग तेजी से बढ़ी है. मेट्रो शहरों के बड़े सुपरमार्केट्स, कैफे और फाइव स्टार होटलों में यह फल ऊंचे दामों पर बिकता है. यही वजह है कि पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया और ज्यादा मुनाफेदार तलाश रहे किसान अब एवोकाडो की बागवानी को बड़े स्तर पर कर रहे हैं. इस फल को भारत में मक्खन फल के नाम से भी जाना जाता है. 

शुरुआत में लोगों को लगता था कि यह सिर्फ विदेशी जमीन पर ही उग सकता है. लेकिन अब महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और उत्तर-पूर्व के कई हिस्सों में किसान इसकी बागवानी कर रहे हैं. एवोकाडो लंबा लाइफस्पैन इसकी खेती की ओर ज्यादा आकर्षित करता है. अगर एक बार सही तरीके से इसका बगीचा तैयार हो जाए तो यह कई दशकों तक अच्छा रिटर्न देता है. बस जरूरी है कि सही मिट्टी के और बुवाई के सही टाइमिंग को अच्छी तरह जान लिया जाए.

कैसी मिट्टी एवोकाडो के लिए सबसे बढ़िया?

एवोकाडो के पौधे की जड़ें काफी हल्की और सेंसटिव होती हैं. इसलिए इसके लिए सही मिट्टी का चुनाव काफी जरूरी होता है. इसी से इसकी बागवानी कैसी होगी यह बात तय होती है. मिट्टी के लिए सबसे जरूरी शर्त है उसमें पानी निकलने का प्राॅपर इंतजाम होना चाहिए. अगर खेत में पानी जमा रहता है. तो जड़ों में फंगस लग जाती है और पौधा सूखने लगता है. इसके लिए रेतीली दोमट या फिर अच्छी हवादार लाल लेटराइट मिट्टी सबसे बेस्ट मानी जाती है. 

मिट्टी की गहराई कम से कम 3 से 4 फीट होनी चाहिए जिससे मुख्य जड़ें गहराई तक अपनी पकड़ बना सकें. मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच यानी हल्का अम्लीय होना सबसे आइडियल है. ज्यादा अल्काइन या भारी चिकनी काली मिट्टी में इसे लगाने से बचना चाहिए. खेत तैयार करते समय पर्याप्त मात्रा में पुरानी सड़ी गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट और थोड़ी रेत जरूर मिक्स करें. जिससे मिट्टी भुरभुरी रहे और जड़ों को भरपूर ऑक्सीजन मिले.


एवोकाडो उगाने के लिए कैसी मिट्टी सही, जानें बुवाई का समय

पौध रोपाई का सबसे सही समय

एवोकाडो की रोपाई के लिए मौसम कैसा है यह बहुत मायने रखता है. भारत की जलवायु के हिसाब से इसके पौधे लगाने का सबसे सही समय मानसून का शुरुआती दौर यानी जून से जुलाई का महीना होता है. इस दौरान वातावरण में नेचुरल नमी होती है और हल्की बारिश के चलते नए पौधों की जड़ें मिट्टी में बहुत तेजी से सेट हो जाती हैं. जिन इलाकों में सिंचाई की पक्की और आधुनिक व्यवस्था जैसे ड्रिप इरिगेशन मौजूद है.

वहां किसान बसंत ऋतु के दौरान फरवरी-मार्च में भी इसकी प्लांटिंग कर सकते हैं. रोपाई के लिए हमेशा ग्राफ्टेड पौधों का ही इस्तेमाल करें क्योंकि बीज से उगाए गए पेड़ों में फल आने में 8 से 10 साल लग जाते हैं. जबकि ग्राफ्टेड पौधे 3 से 4 साल में ही फल देना शुरू कर देते हैं. अत्यधिक तेज धूप और गर्म लू के थपेड़ों से बचाने के लिए शुरुआती एक-दो साल छोटे पौधों पर शेड नेट का इस्तेमाल करना बहुत सही रहता है.


एवोकाडो उगाने के लिए कैसी मिट्टी सही, जानें बुवाई का समय

यह भी पढ़ें: अपने खेत में करें परिसीमन फल की खेती, होगी तगड़ी कमाई

ऐसे मिलती है बंपर पैदावार

कमर्शियल लेवल पर एवोकाडो लगाते वक्त पौधों के बीच का स्पेसिंग गणित बहुत मायने रखता है. क्योंकि इसका पेड़ काफी चौड़ा और घना फैलता है. खेत में कतार से कतार और पौधे से पौधे के बीच आमतौर पर 6x6 मीटर या 7x7 मीटर की दूरी रखनी चाहिए. रोपाई से करीब 15 दिन पहले 1x1x1 मीटर साइज के गड्ढे खोदकर धूप में छोड़ दें. फिर उनमें ऊपरी मिट्टी, गोबर की खाद और नीम खली भरकर पौध लगाएं. 

एवोकाडो की एक खासियत यह है कि इसमें परागण थोड़ा मुश्किल होता है. इसके फूल दो तरह के होते हैं टाइप A जैसे हास वैरायटी और टाइप B जैसे फुएर्टे वैरायटी. बेहतर और भारी फ्रूट सेटिंग के लिए खेत में दोनों किस्मों के पौधे 80:20 के अनुपात में मिक्स करके लगाने चाहिए. सही न्यूट्रिशन और ड्रिप से नपी-तुली सिंचाई देने पर 5वें साल से हर पेड़ से औसतन 200 से 400 फल आराम से मिल जाते हैं. जो मंडियों में 150 से 300 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकते हैं.

यह भी पढ़ें: दानेदार यूरिया या नैनो यूरिया, आपके खेत के लिए क्या बेहतर?

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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