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मक्के की कटाई के बाद खाली खेत में बोएं ये सब्जी, डेढ़ महीने के अंदर शुरू हो जाएगी कमाई

Ladyfinger Farming Tips: मक्के की कटाई के बाद खाली पड़े खेत में भिंडी की अगेती खेती करके किसान भाई बहुत कम समय में बड़ी कमाई कर सकते हैं. जान लीजिए इसका पूरा तरीका.

Ladyfinger Farming Tips: मक्के की कटाई के बाद किसान इस सोच में पड़ जाते हैं कि अब खाली पड़े खेत में ऐसा क्या लगाया जाए जिससे कम वक्त में अच्छी कमाई हो सके. अगर आप भी इसी कशमकश में हैं तो भिंडी की अगेती खेती आपके लिए सबसे मुनाफेदार विकल्प है. मक्का कटते ही खेत पूरी तरह खाली हो जाता है और इस समय को मिट्टी भिंडी की बुआई के लिए एकदम सही माना जाता है.

इस फसल को तैयार होने में बहुत लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता. महज 40 से 45 दिनों के भीतर इसमें तुड़ाई शुरू हो जाती है. मार्केट में इस सीजन में हरी और ताजी भिंडी की डिमांड इतनी हाई रहती है कि आपको इसके बहुत ही शानदार दाम मिल जाते हैं.

भिंडी की बुआई का सही तरीका

मक्के की फसल हटाने के बाद सबसे पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी जुताई कर लें जिससे कि मिट्टी भुरभुरी हो जाए. इसके बाद खेत में कतारें यानी लाइनें बनाकर भिंडी के बीजों की बुआई करें. पौधे से पौधे की दूरी लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर और लाइनों के बीच की दूरी 40 से 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.

यह किस्म है बेस्ट

बेहतर और बंपर पैदावार के लिए पूसा ए-4, अर्का अनामिका या परभनी क्रांति जैसी हाइब्रिड किस्मों के बीजों का ही लेकर आएं. भिंडी की खेती में बुआई के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई की जरूरत होती है. इसके बाद मौसम और मिट्टी की नमी के हिसाब से हफ्ते या दस दिन के अंतराल पर पानी देते रहें.

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लागत आती है बेहद कम

भिंडी की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें दूसरी सब्जियों के मुकाबले लागत बेहद कम आती है और इसकी ज्यादा देखभाल भी नहीं करनी पड़ती है. बुआई के ठीक डेढ़ महीने बाद जब पौधों में फल आने लगते हैं. तो इसकी हर दूसरे या तीसरे दिन तुड़ाई की जा सकती है.

मिलते हैं बढ़िया दाम

शुरुआत में जब यह मार्केट में पहुंचती है. तो इसके थोक भाव बहुत सही मिलते हैं जिससे आपकी जेब तेजी से भरने लगती है. एक बार फसल चालू होने के बाद यह लगातार दो से तीन महीने तक बंपर प्रोडक्शन देती रहती है. कम समय में खेतों का सही इस्तेमाल करके अपनी रेगुलर इनकम बढ़ाने का यह सबसे आसान तरीका है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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