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Crop Management: सोयाबीन की खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाने को मजबूर हुये किसान, कहीं आपकी फसल में भी ना हो जाये ये नुकसान

Yellow Mosaic Disease Treatment: मौसम बदलाव के कारण जब संकट नहीं थमता तो कीटनाशकों पर पैसा खर्च करने के बजाय किसान इसकी रोकथाम के लिये फसल को नष्ट करने पर मजबूर हो जाते हैं.

Yellow Mosaic Disease in Soybean Crop: खेती-किसानी को अनिश्चितताओं और जोखिमों का कारोबार भी कहते हैं, जिसमें कभी बेमौसम बारिश (Rain in Agriculture), तो कभी आंधी-तूफान, बाढ़ और सूखा के कारण फसलों के बर्बाद होने का खतरा बना ही रहता है. किसान अच्छी आमदनी की उम्मीद में फसलों की खेती तो करते हैं, लेकिन कब अचानक से फसल में कीट-रोगों का संकट आ पड़े, इस बात की कोई गारंटी नहीं होती. कुछ ऐसी ही विपदा मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh Farmer) के किसानों के ऊपर बिजली की तरह आ गिरी है. यहां सोयाबीन की फसल पर पीला मोजैक रोग (Yellow Mosaic Disease in Soybean Crop) का संकट इस कदर बढ़ गया है कि एक पीड़ित किसान ने खड़ी फसल के ऊपर ट्रैक्टर चलाकर उसे नष्ट कर दिया.  कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र (Yellow Mosaic Disease in Maharashtra)में से भी एक ऐसा ही किस्सा सामने आया था.

कैसे बढ़ी समस्या
मध्य प्रदेश को सोयाबीन के एक बड़े उत्पादक राज्य का दर्जा प्राप्त है. यहां सोयाबीन को काला सोना कहते हैं और खरीफ सीजन में ज्यादातर किसान सोयाबीन की फसल (Soybean Crop) लगाते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों के कारण सोयाबीन की फसल में पीला मोजैक रोग का संकट बढ़ता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि खरीफ सीजन का मानसून. दरअसल सोयाबीन की फसल के अंकुरण के बाद लगातार 30 दिनों तक बारिश होती रही, जिसके फसल में जुताई और कीटनाशकों का छिड़काव करना मुश्किल हो गया. इसी बीच मध्य प्रदेश के नागदा क्षेत्र की लगभग 1000 बीघा सोयाबीन फसल पर पीला मोजैक रोग ने अपना घर बना लिया.

किसानों पर भारी संकट के बादल
चाहे मध्य प्रदेश हो या महाराष्ट्र, इस बीमारी के कारण किसानों को कड़ी मेहनत का नतीजा नुकासन के रूप में झेलना पड़ जाता है, हालांकि इस समस्या की रोकथाम के कई उपाय किये जाते हैं, लेकिन मौसम बदलाव के कारण जब संकट नहीं थमता तो कीटनाशकों पर पैसा खर्च करने के बजाय किसान इस महामारी की रोकथाम के लिये फसल को नष्ट करने पर मजबूर हो जाते हैं.

क्या है पीला मोजैक रोग
पीला मोजेक रोग से ग्रस्त फसल में चितकबरे गहरे हरे-पीले रंग के धब्बे नजर आने लगते हैं. इसके कारण पौधों का रंग पीला पड़ जाता है और पौधे नरम पड़कर सिकुड़ने या मुझाने लगते हैं. धीरे-धीरे ये बीमारी पूरी फसल पर फैल जाती है और कभी-कभी आस-पास की फसलें भी इसकी चपेट में आ जाती है. इस समस्या के कारण पौधों पर कभी-भी फलियां नहीं लगती. यही कारण है कि किसानों को मजबूरी में पूरी फसल नष्ट करनी पड़ जाती है. 

पीला मोजैक रोग का समाधान
पीला मोजैक रोग की रोकथाम के लिये बुवाई के बाद फसल में अकुंरण से लेकर फसल की कटाई तक कड़ी निगरानी करनी चाहिये, क्योंकि सोयाबीन एक नकदी फसल है, जिसके बेहतर उत्पादन से किसानों को अच्छी कमाई होती है, लेकिन बीमारियों के कारण फसल और मिट्टी का काफी नुकासन होता है. इस बीमारी के लक्षण दिखते ही फसल के बीचों-बीच प्रति हेक्टेयर की दर से 3 से 4 पीला चिपचिपा ट्रैप (Yellow Sticky Trap) लगाएं. 

  • यदि संक्रमण कुछ ही पौधों पर है, तो रोगी पौधों को उखाड़कर दूर किसी गड्ढे में दबा देना चाहिये.
  • ऐसी समस्याओं की रोकथाम के लिये  किसानों को सोयाबीन की नई विकसित, उन्नत और रोगप्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करने की सलाह दी जाती है.
  • इस बीमारी के चलते किसान चाहें तो नीम और गौ मूत्र से बने जैविक कीटनाशक (Neem-Gaumutra Organic Pesticide) का छिड़काव भी कर सकते हैं.
  • कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर इमिडाक्लोप्रिड, थायमिथोक्सम या लेम्बडा सायहेलोथ्रिन कीटनाशक दवाओं की 125 मिली मात्रा को प्रति हेक्टेय खेत में छिड़काव (Pesticides for Yellow Mosaic Disease) करके भी समाधान कर सकते हैं.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. ABPLive.com किसी भी तरह की जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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