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अल-नीनो का असर बढ़ा तो क्या बोएं किसान? कम बारिश के बीच इन फसलों पर लगा सकते हैं दांव

El Nino Farming Tips: अल-नीनो के कारण कम बारिश की आशंका के बीच किसान भाई मोटे अनाज जैसे बाजरा, ज्वार और कम पानी वाली मूंग, उड़द व तिल जैसी फसलों पर दांव लगा सकते हैं.

El Nino Farming Tips:  इस साल खेती-किसानी के सामने अल-नीनो एक बहुत बड़ा विलेन बनकर खड़ा हो रहा है. जिसकी वजह से मानसून के कमजोर रहने और कम बारिश की आशंका लगातार बनी हुई है. ऐसे सूखे जैसे हालात में अगर किसान भाई वही पुरानी पारंपरिक और ज्यादा पानी सोखने वाली फसलें बोएंगे तो भारी नुकसान तय है.

लेकिन समझदारी इसी में है कि किसान वक्त और मौसम की नब्ज को पहचानकर अपनी रणनीति बदल लें.अगर आप भी इस उलझन में हैं कि इस सीजन में खेतों में क्या बोया जाए. तो चलिए आपको बताते हैं उन फसलों के बारे में जो अल-नीनो के इस दौर में आपकी किस्मत चमका सकती हैं.

मोटे अनाज हैं मुनाफे का सौदा

जब बारिश बहुत कम हो तो आंख बंद करके मोटे अनाजों यानी मिलेट्स की खेती की तरफ रुख करना सबसे सुरक्षित और फायदे का सौदा है. बाजरा, ज्वार और रागी जैसी फसलें कम पानी के माहौल के लिए ही बनी हैं. इन्हें बढ़ने के लिए बहुत ही नाममात्र की सिंचाई की जरूरत होती है और ये तेज धूप के साथ गर्मी को आसानी से बर्दाश्त कर लेती हैं.

सबसे अच्छी बात यह है कि आज के समय में मार्केट में मिलेट्स को सुपरफूड माना जा रहा है. जिससे शहरों में इनकी डिमांड और कीमतें आसमान छू रही हैं. बाजरा महज 70 से 85 दिनों में पककर तैयार हो जाता है. जिससे आपकी लागत बेहद कम आती है और जोखिम ना के बराबर रहता है. जो कम बारिश में आपको पक्की कमाई की गारंटी देता है.

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दलहन और तिलहन फसलों पर लगाएं दांव

कम बारिश के इस संकट काल में दलहन (दालें) और तिलहन फसलें भी किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं. मूंग, उड़द और अरहर जैसी दलहनी फसलों की जड़ें हवा से नाइट्रोजन सोखकर जमीन को खुद ही उपजाऊ बना लेती हैं और इन्हें पूरी फसल चक्र में सिर्फ दो या तीन बार हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ती है. 

दूसरी तरफ तिलहनी फसलों में आप तिल, मूंगफली या सोयाबीन जैसी फसलों पर भरोसा जता सकते हैं. जो कम नमी में भी बेहतरीन प्रोडक्शन देने की क्षमता रखती हैं. इन दोनों ही कैटेगरी की फसलों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि मार्केट में इनकी कीमतें हमेशा बहुत मजबूत रहती हैं. 

यह भी पढ़ें: हल्दी, अदरक या धनिया... कम बारिश में कौन सा मसाला देगा ज्यादा मुनाफा?

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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