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भारत में कितना है गेहूं का स्टॉक, जानें कितने साल तक ना उगाया जाए तो चल जाएगा काम?

Wheat Stock News: भारत के सरकारी गोदामों में इस समय गेहूं का बंपर स्टॉक मौजूद है. जो बफर स्टॉक के तय नियमों से काफी ज्यादा है. जान लें कितने साल तक बिना उगाए गेंहू की खपत की जा सकती है.

Wheat Stock News: भारत में गेहूं सिर्फ एक फसल नहीं है बल्कि करोड़ों लोगों की थाली का सबसे जरूरी हिस्सा है. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि अगर किसी वजह से देश में गेहूं की पैदावार रुक जाए या किसान कुछ समय के लिए गेहूं न उगाएं. तो क्या देश में भुखमरी की नौबत आ जाएगी. फिलहाल तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत इस मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर और सुरक्षित स्थिति में है. 

सरकार के पास अनाज का ऐसा बंपर स्टॉक मौजूद है जो किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए काफी है. देश के अन्न भंडार यानी फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के गोदाम गेहूं से खचाखच भरे हुए हैं. चलिए आपको बताते हैं कि देश के पास इस समय कुल कितना गेहूं जमा है और यह कितने वक्त तक देश का पेट भर सकता है.

जून 2026 तक का ताजा सरकारी रिकॉर्ड

देश में हाल ही में खत्म हुए रबी सीजन 2026-27 में सरकार ने किसानों से रिकॉर्ड तोड़ गेहूं की खरीद की है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 की शुरुआत तक केंद्रीय पूल में गेहूं का कुल स्टॉक लगभग 513 लाख मीट्रिक टन यानी 51.32 मिलियन टन तक पहुंच चुका है. यह स्टॉक पिछले कुछ सालों में सबसे शानदार माना जा रहा है.

क्योंकि इस साल सरकार ने अपने तय टारगेट को पार करते हुए 350 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा गेहूं सीधे किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर खरीदा है. आपको बता दें कि सरकार को 1 जुलाई के नियम के हिसाब से सिर्फ 275.80 लाख मीट्रिक टन बफर स्टॉक की जरूरत होती है. लेकिन हमारे पास इस समय जरूरत से लगभग दोगुना गेहूं सुरक्षित रखा हुआ है.

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बिना खेती कितने साल चल जाएगा काम

अब बात करते हैं उस सबसे बड़े सवाल की कि अगर देश में गेहूं न उगाया जाए तो यह स्टॉक कितने साल चलेगा. सरकारी राशन योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और जन वितरण प्रणाली (PDS) के तहत देश की करीब 81 करोड़ जनता को हर साल लगभग 180 से 200 लाख मीट्रिक टन गेहूं मुफ्त या बेहद कम दामों पर बांटा जाता है. 

इस हिसाब से देखें तो गोदामों में बंद 513 लाख मीट्रिक टन का यह सरकारी स्टॉक बिना नई खेती के भी पूरे देश के गरीब तबके की राशन जरूरतों को लगातार ढाई से तीन साल तक आराम से पूरा कर सकता है.

अगर इसमें देश की कुल सालाना घरेलू खपत यानी लगभग 1000 लाख मीट्रिक टन को जोड़ें और खुले बाजार को भी शामिल करें. तो बिना एक दाना उगाए भी पूरा देश कम से कम 6 महीने तक बिना किसी किल्लत के मजे से गेहूं खा सकता है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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