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बीवी की मर्जी के बिना शराब पी तो क्या हो जाएगी जेल, जानें क्या कहता है कानून?

Rules For Drinking Alcohol: नए साल पर शादीशुदा पुरुषों ने अगर बिना पत्नी की परमिशन के शराब भी तो उन्हें जेल हो सकती है. जान लीजिए क्या कहता है इसे लेकर कानून.

Rules For Drinking Alcohol: नए साल की आमद के साथ ही देश और दुनिया में जश्न का माहौल है. पार्टियों और सेलिब्रेशन में शराब का सेवन आम बात मानी जाती है. लेकिन इस बार नए साल पर शादीशुदा पुरुषों से जुड़ी एक चेतावनी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. दावा किया जा रहा है कि अगर किसी शादीशुदा पुरुष ने अपनी पत्नी की मर्जी के बिना शराब पी तो उसे जेल जाना पड़ सकता है.

इस तरह के मैसेज कई लोगों को कन्फ्यूज कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या सच में सिर्फ शराब पीने पर वो भी बिना पत्नी की परमिशन कानून जेल की सजा देता है. आइए समझते हैं कि इस दावे में कितनी सच्चाई है और इस मामले में कानून असल में क्या कहता है.

बिना परमिशन शराब पी तो जेल?

अगर आपके पास भी इस तरह की खबर आई है कि पति ने शराब पीने से पहले बीवी की परमिशन नहीं ली. तो उसे जेल हो सकती है. तो आपको बता दें कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है. दरअसल यह मामला घरेलू हिंसा से जोड़कर बताया जा रहा है. जो कि BNS में धारा 85/85B से जुड़ी है. इसके तहत अगर शराब या नशीले पदार्थ का सेवन करके पति घर में हिंसा करता है. 

पत्नी की मानसिक शांति या सम्मान को खतरा पैदा करता है. तो पत्नी FIR दर्ज करवा सकती है. सजा 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकती है. मसलन अगर पत्नी ने पहले साफ मना किया कि शराब पीकर घर मत आना और पति फिर भी ऐसा करता है. जिससे झगड़ा या डर पैदा होता है. तो यह क्रूरता माना जाएगा. लेकिन केवल शराब पीना अपराध नहीं है. 

पत्नी को सुरक्षा के लिए मिले अधिकार

सरकार के आंकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा के 40% से ज्यादा मामलों में शराब वजह होती है. इसलिए नया कानून महिलाओं को ज्यादा सुरक्षा देता है. पत्नी सुरक्षा मांग सकती है अलग रहने का आदेश ले सकती है या पति को गुड बिहेवियर बॉन्ड पर रखवा सकती है. कानूनी विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर पति शांतिपूर्वक शराब पीता है और कोई हिंसा नहीं करता. 

तो यह धारा लागू नहीं होती. यह कानून सिर्फ घरेलू हिंसा से निपटने के लिए है. ना कि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए. नए साल पर वायरल मैसेज के कारण कई लोग इसे मजाक में परमिशन लेना जरूरी कह रहे हैं. जबकि असल मकसद महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है और इससे ज्यादा कुछ नहीं.

यह भी पढ़ें:बाबा ने 50 साल पहले किराए पर दी थी दुकान, अब किराएदार से कैसे कराएं खाली?

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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