कमाई अलग-अलग है तो भी नहीं होगी पैसों को लेकर बहस, कपल्स ऐसे करें खर्च और बचत की प्लानिंग
Salary Management: पति-पत्नी की सैलरी अलग होने पर खर्चों की जिम्मेदारी आपसी समझ और आय के अनुसार तय करनी चाहिए. सही वित्तीय योजना और खुली बातचीत से रिश्ते मजबूत रहते हैं.

Couple Money Management: आज के समय में पति-पत्नी दोनों के नौकरी करने का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन दोनों की सैलरी हमेशा एक जैसी हो, ऐसा जरूरी नहीं है. आमतौर पर यह देखा जाता है कि एक पार्टनर की सैलरी दूसरे से काफी ज्यादा होती है. ऐसे में अगर पैसों को लेकर पहले से सही प्लानिंग न की जाए, तो छोटी-छोटी बातें भी बहस की वजह बन जाती हैं. इसका सीधा असर उनके रिश्तें पर पड़ता है.
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि किसी भी कपल्स को पैसों का हिसाब किसी तय फॉर्मूले से नहीं, बल्कि आपसी समझ और जरूरतों के हिसाब से करना चाहिए. यह जरूरी नहीं है कि दोनों कप्लस एक जैसी रकम खर्च करें, बल्कि यह है कि अगर दोनों पार्टनर खुलकर बातचीत करें और अपनी कमाई के मुताबिक खर्चों की जिम्मेदारी तय करें, तो उनकी मैरिड लाइफ काफी बेहतर बनी रह सकती हैं.
कैसे करें खर्च का सही प्लान?
अगर आपकी सैलरी 2.5 लाख रूपये है और आपके पार्टनर की 1 लाख रूपये है, तो ऐसे में जरूरी नहीं है कि आप खर्च को 50-50 बांटे. मान लीजिए अगर आपने हर खर्च को 50-50 बांट लिया है तो इसका ज्यादा दबाव कम कमाने वाले आपके पार्टनर पर पड़ सकता है.
ऐसे में बेहतर तरीका यह है कि दोनों अपनी अपनी कमाई के हिसाब से घरेलू खर्चों में खर्च करें. हालांकि, कई कपल्स घर का किराया, EMI और दूसरी जरूरी खर्च अपनी इनकम के अनुपात में बांटते हैं, जिससे दोनों के पास अपनी खर्च के लिए एक पर्याप्त रकम बचता है.
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सैलरी बढ़ने पर क्या करें?
करियर हमेशा एक जैसा नहीं रहता. समय के साथ किसी की सैलरी बढ़ती है, कोई नौकरी बदलता है या कोई परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से कुछ समय के लिए अपने काम से ब्रेक ले लेता है. ऐसे में पुराने खर्चों के नियमों पर ही टिके रहने के बजाय समय-समय पर वित्तीय योजना की समीक्षा करनी चाहिए. साथ ही अगर किसी एक की सैलरी बढ़ती या घटती है, तो उसी हिसाब से खर्च और निवेश की नई योजना बनानी चाहिए ताकि दोनों पर बराबर जिम्मेदारी बनी रहे.
इन बातों का रखें ध्यान
- पैसों को लेकर खुलकर बातचीत करें और कोई भी फैसला मिलकर लें.
- खर्च और बचत की प्लानिंग बनाए रखें.
- किसी एक शख्स पर पूरा आर्थिक बोझ न डालें.
- पैसों का हिसाब बराबरी से नहीं, बल्कि जरूरत और हैसियत के मुताबिक तय करें.
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