कैसे काम करता है Where is my train ऐप, ट्रेन से कैसे होता है कनेक्ट?
Where is my train : बिना इंटरनेट और नेटवर्क के भी यह ऐप आपकी ट्रेन की एकदम सटीक लोकेशन और रफ्तार कैसे बता देता है? इसके पीछे काम करने वाली तकनीक कौनसी है? जान लीजिए इस खबर में.

Where Is My Train: ट्रेन में सफर करने वाले लगभग हर इंसान के फोन में Where is my train ऐप जरूर होता है. जब भी ट्रेन लेट होती है और सुनसान इलाके में कहीं रुक जाती है तो लोग तुरंत यही ऐप खोलकर देखते हैं कि आखिर गाड़ी पहुंची कहां है. हैरानी की बात तो यह है कि जब ट्रेन किसी घने जंगल से गुजर रही होती है और फोन में इंटरनेट बिल्कुल भी काम नहीं कर रहा होता तब भी यह ऐप एकदम सटीक लोकेशन और ट्रेन की रफ्तार बता देता है.
कई बार तो यह भी दिख जाता है कि ट्रेन किस प्लेटफॉर्म पर आने वाली है. यह देखकर अक्सर दिमाग में सवाल आता है कि आखिर यह ऐप सीधे ट्रेन के इंजन से कैसे कनेक्ट हो जाता है. क्या रेलवे ने हर ट्रेन में कोई खास ट्रांसमीटर लगा रखा है जो हमारे फोन को सिग्नल भेजता है. चलिए आपको बताते हैं कि बिना इंटरनेट के भी यह ऐप इतनी सटीक जानकारी कैसे दे देता है.
बिना इंटरनेट के कैसे ट्रैक होती है लोकेशन?
इस ऐप की सबसे बड़ी खासियत इसका Cell Tower मोड है. जो बिना इंटरनेट और बिना जीपीएस के भी काम करता है. दरअसल जब आप ट्रेन के अंदर बैठकर सफर कर रहे होते हैं तो आपका मोबाइल फोन नेटवर्क पकड़ने के लिए लगातार आस-पास के मोबाइल टावरों से जुड़ा रहता है. जैसे-जैसे ट्रेन आगे बढ़ती है आपका फोन पुराने टावर को छोड़कर आगे वाले नए टावर से कनेक्ट होता जाता है.
हर मोबाइल टावर का अपना एक खास कोड और फिक्स लोकेशन होती है. वेयर इज माई ट्रेन ऐप के पास रेलवे ट्रैक के किनारे लगे इन लाखों मोबाइल टावरों का पूरा डेटाबेस पहले से मौजूद रहता है. जब आप ट्रेन के अंदर बैठकर ऐप में Cell Tower ऑप्शन चुनते हैं. तो ऐप आपके फोन से यह पता लगा लेता है कि अभी आपका सिम कार्ड किस इलाके के टावर से जुड़ा है. इसी टावर की आईडी को रेलवे के रूट मैप से मिलाकर ऐप बिना इंटरनेट के भी आपको बता देता है कि ट्रेन किस स्टेशन से कितनी दूर है.

क्राउडसोर्सिंग और जीपीएस से ट्रेन से जुड़ता है आपका फोन
अब सवाल आता है कि जब आप घर बैठे किसी ट्रेन की लोकेशन चेक करते हैं तब यह ऐप ट्रेन से कैसे कनेक्ट होता है. इसके पीछे Crowdsourcing की तकनीक काम करती है. ऐप ट्रेन में बैठे हजारों यात्रियों के स्मार्टफोन से कनेक्ट होता है. किसी भी चलती ट्रेन में सैकड़ों लोग ऐसे होते हैं जो सफर के दौरान इस ऐप में Inside the train वाला जीपीएस मोड ऑन करके रखते हैं.
जब यह यात्री अपना जीपीएस ऑन करते हैं, तो उनके फोन की लाइव लोकेशन और चलने की स्पीड ऐप के मुख्य सर्वर पर जाती रहती है. ऐप का सिस्टम इन सैकड़ों यात्रियों के फोन से मिल रहे डेटा को आपस में मिलाता है और उसका एक सटीक औसत निकाल लेता है. इसी वजह से घर बैठे दूसरे लोगों को भी पता चल जाता है कि वह ट्रेन इस वक्त किस स्टेशन को पार कर रही है और कितनी रफ्तार से दौड़ रही है.

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रेलवे सर्वर का क्या होता है रोल?
सेल टावर और जीपीएस के अलावा इस ऐप को रेलवे के आधिकारिक सिस्टम यानी NTES से भी मदद मिलती है. हर रेलवे स्टेशन पर जब कोई ट्रेन पहुंचती है और वहां से निकलती है. तो स्टेशन मास्टर उसका समय रेलवे के मुख्य सर्वर में अपडेट करता है. जब आपके फोन में इंटरनेट चालू होता है, तो यह ऐप रेलवे के उसी सरकारी सर्वर से डेटा खींचकर आपको ट्रेन के लेट होने और प्लेटफॉर्म नंबर की जानकारी दे देता है.
इसके अलावा जब आप इस ऐप को पहली बार डाउनलोड करते हैं तो देश भर की हजारों ट्रेनों का पूरा टाइमटेबल, स्टेशनों के नाम और उनके बीच की दूरी आपके फोन की मेमोरी में ऑफलाइन सेव हो जाती है. यही वजह है कि अगर आपको सिर्फ किसी ट्रेन का रूट, समय और किराया देखना हो तो उसके लिए इंटरनेट की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती. साल 2018 में गूगल ने इस शानदार भारतीय ऐप को खरीद लिया था, जिसके बाद इसकी लोकेशन ट्रैकिंग तकनीक और भी ज्यादा तेज और भरोसेमंद हो गई है.
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