क्या पेपर लीक रोकने में मदद कर सकती है टेक्नोलॉजी? जानें सबकुछ
Can Technology Stops Paper Leak: कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद सरकार ने पेपर लीक को लेकर कड़ाई बरतनी शुरू कर दी है. इस बीच सवाल उठ रहा है कि क्या टेक्नोलॉजी पेपर लीक को रोक सकती है?

- विशेषज्ञों का मानना, तकनीक अकेले समस्या पूरी खत्म नहीं करेगी।
Can Technology Stops Paper Leak: पिछले 12 साल में देश में स्टेट और नेशनल लेवल के करीब 150 पेपर लीक हो चुके हैं. इसके चलते करोड़ों कैंडिडेट्स पर असर पड़ा है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद सरकार ने पेपर लीक को रोकने के लिए कई कदम उठाने का ऐलान किया है. नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स बनाई है. इसके अलावा सरकार एक नया कानून भी लेकर आ रही है. इस बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या टेक्नोलॉजी की मदद से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है? आइए जानते हैं कि पेपर लीक को रोकने के लिए क्या-क्या टेक्नोलॉजी यूज हो सकती है और क्या इससे समस्या का पूरी तरह समाधान हो सकता है.
कैसे काम आ सकती है टेक्नोलॉजी?
साइबर एक्सपर्ट्स का मानना है कि टेक्नोलॉजी की मदद से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. सिक्योरिटी आर्किटेक्चर, बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन, सिक्योर क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और ब्लॉकचेन-बेस्ड रिकॉर्ड मैनेजमेंट जैसी टेक्नोलॉजी की मदद से फ्रॉड और अनऑथोराइज्ड एक्सेस को रोका जा सकता है. हालांकि, फिर भी एक चुनौती बनी रहेगी. टेक्नोलॉजी अनऑथोराइज एक्सेस रोक सकती है, लेकिन यह प्रोसेस में शामिल व्यक्तियों को जानबूझकर अपने पास मौजूद इंफोर्मेशन का मिसयूज करने से नहीं बचा सकती.
ये टेक्नोलॉजी हो सकती हैं यूज
एनक्रिप्टेड डिजिटल क्वेश्चन पेपर- क्वेश्चन पेपर को प्रिंट कर सेंटर तक पहुंचाने के बीच इसके लीक होने का खतरा रहता है. इससे बचने के लिए एनक्रिप्टेड क्वेश्न पेपर का सहारा लिया जा सकता है. एग्जाम शुरू होने तक ये पेपर पूरी तरह एनक्रिप्टेड रहेंगे. इन्ही डिक्रिप्ट करने के लिए मल्टीपल ऑथोराइजेशन चेक को जरूरी बनाया जा सकता है. इससे पेपर लीक की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
पेपर जनरेशन में टेक की मदद- पेपर सेट करने में भी टेक्नोलॉजी की मदद ली जा सकती है. एआई सिस्टम एक क्वेश्चन बैंक में से रैंडम क्वेश्चन उठाएगा और हर स्टूडेंट्स को अलग-अलग सीक्वेंस में क्वेश्चन मिलेंगे. इससे ऑर्गेनाइज्ड चीटिंग को रोका जा सकता है.
बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन- कई एग्जाम्स के लिए कैंडिडेट्स का बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन जरूरी है और बाकी एग्जाम्स के लिए भी यह तरीका अपनाया जा सकता है. रजिस्ट्रेशन से लेकर एग्जाम सेंटर में एंट्री और काउंसलिंग के लिए बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन जरूरी की जा सकती है. इससे धोखाधड़ी से भी बचा जा सकता है और पूरी एडमिशन प्रोसेस का एक आईडेंटिटी ट्रेल भी क्रिएट हो जाएगा.
एआई मॉनिटरिंग- अब इतने एडवांस एआई सिस्टम मौजूद हैं, जो रियल टाइम में न सिर्फ मॉनिटरिंग कर सकते हैं बल्कि कुछ गड़बड़ होने पर उसे डिटेक्ट भी कर सकते हैं. कॉर्डिनेटेड मूवमेंट और एग्जाम सेंटर में किसी भी असामान्य एक्टिविटी पर नजर रखने के लिए एआई सिस्टम काम में लिए जा सकते हैं. इससे सिस्टम में अनऑथोराइज एक्सेस को भी मॉनिटर और डिटेक्ट किया जा सकता है.
डिजिटल ऑडिट ट्रेल- इस तरीके से क्वेश्चन पेपर तक की हर एक्सेस को लॉग किया जा सकता है. यानी डिजिटल तरीके से यह रिकॉर्ड बनाया जा सकता है कि किस-किस व्यक्ति ने पेपर को एक्सेस किया है, पेपर को कब और कहां से एक्सेस किया गया है. इससे अगर कभी पेपर लीक जैसी घटना सामने भी आती है तो गुनहगार व्यक्ति तक पहुंचना आसान हो जाएगा.
क्या पूरी तरह थम जाएगी पेपर लीक की समस्या?
भले ही आज एडवांस टेक्नोलॉजी मौजूद है, लेकिन पेपरों के मौजूदा सिस्टम में यह दावा नहीं किया जा सकता कि टेक्नोलॉजी पूरी तरह इस समस्या को जड़ से खत्म कर देगी. जानकारों को मानना है कि पेपर सेट करने से लेकर उसे अप्रूव करने और आंसर शीट चेक करने तक किसी न किसी तरह इसमें इंसान की भूमिका रहेगी. टेक्नोलॉजी इस भूमिका को पूरी तरह नहीं बदल सकती. पेपर लीक पर बनी टास्क फोर्स में शामिल आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी कामाकोटी का कहना है कि भले ही हम कितनी भी टेक्नोलॉजी यूज कर लें, लेकिन जो व्यक्ति पेपर सेट और अप्रूव करता है, उसका भरोसेमंद होना बहुत जरूरी है.
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