Uttarakhand: न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की सूचना गोपनीय बताकर नहीं रोकी जा सकती- मुख्य सूचना आयुक्त
Uttarakhand News: मुख्य सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शिकायतों की संख्या, उन पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और निस्तारण की व्यवस्था सार्वजनिक हित के दायरे में आती है.

न्यायाधीशों और अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज शिकायतों से जुड़ी सूचनाओं को केवल “गोपनीय” बताकर रोका नहीं जा सकता. पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं और यह सिद्धांत न्यायपालिका पर भी समान रूप से लागू होते हैं. यह अहम फैसला मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की द्वितीय अपील पर सुनाया है.
मुख्य सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शिकायतों की संख्या, उन पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और निस्तारण की व्यवस्था सार्वजनिक हित के दायरे में आती है. इन्हें पूरी तरह गोपनीय बताकर सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि, आयोग ने यह भी निर्देश दिए हैं कि किसी भी न्यायाधीश या अधिकारी की व्यक्तिगत पहचान उजागर नहीं की जाएगी.
एक माह के भीतर आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने के निर्देश
आयोग ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति प्राप्त कर एक माह के भीतर आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. इस दौरान यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि सूचना देते समय निजता और न्यायिक गरिमा का संरक्षण बना रहे.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान), हल्द्वानी के पद पर तैनात आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत एक जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच उत्तराखंड की अधीनस्थ न्यायपालिका से संबंधित कई जानकारियां मांगी थीं.
इनमें अधीनस्थ न्यायपालिका पर लागू सेवा नियम, न्यायिक अधिकारियों और न्यायाधीशों के खिलाफ दर्ज शिकायतों की संख्या, उन शिकायतों पर हुई अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई, शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां शामिल थीं.
गोपनीयता का हवाला देकर सूचना देने से किया था इनकार
इस आरटीआई आवेदन पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय के लोक सूचना अधिकारी ने शिकायतों को संवेदनशील और गोपनीय प्रकृति का बताते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया था. पीआईओ का तर्क था कि इस तरह की सूचनाएं केवल उच्च न्यायालय सतर्कता नियम-2019 के अंतर्गत और वह भी मुख्य न्यायाधीश की अनुमति से ही साझा की जा सकती हैं. इस फैसले से असंतुष्ट होकर संजीव चतुर्वेदी ने सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की.
सुनवाई के बाद सूचना आयोग ने अपने निर्णय में कहा कि केवल गोपनीयता का हवाला देकर सूचना रोकी नहीं जा सकती. आयोग ने माना कि शिकायतों की संख्या, प्रक्रिया और उनके निस्तारण की व्यवस्था से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हित में है और इससे न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है. साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियाद हैं और यह सिद्धांत न्यायपालिका से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी लागू होते हैं.
इस फैसले को न्यायिक जवाबदेही और सूचना के अधिकार के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे न्यायपालिका से जुड़ी प्रशासनिक पारदर्शिता को मजबूती मिलने की उम्मीद है.
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