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बिहार की राजनीति में कितना अहम है दही चूरा, इससे कैसे तय होती है सियासत?

Dahi Chura Bhoj On Makar Sankranti: बिहार में दही-चूड़ा भोज सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशों का मंच बन चुका है. कई बार इसी भोज ने गठबंधन बदले और सत्ता की दिशा तय की.

Dahi Chura Bhoj On Makar Sankranti: बिहार में मकर संक्रांति का मतलब सिर्फ पर्व नहीं होता, बल्कि यह राजनीति का सबसे खास मौसम भी माना जाता है. जैसे ही दही और चूड़े की खुशबू फैलती है, वैसे ही सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो जाती है. कौन किसके घर पहुंचा, किसे न्योता मिला और किसने दूरी बनाई- इन सवालों में छिपे होते हैं बड़े राजनीतिक संकेत. कई बार यही दही-चूड़ा भोज आने वाले महीनों की सरकार की तस्वीर भी साफ कर देता है. 

बिहार की सियासत और दही-चूड़ा का गहरा रिश्ता

बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा एक साधारण भोजन नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक प्रतीक बन चुका है. मकर संक्रांति के मौके पर होने वाला यह भोज नेताओं के रिश्तों, समीकरणों और आने वाले फैसलों की झलक देता है. वर्षों से देखा गया है कि इस परंपरा के आसपास सत्ता परिवर्तन, गठबंधन टूटने-जुड़ने और राजनीतिक घर वापसी जैसे बड़े घटनाक्रम सामने आते रहे हैं.

लालू यादव ने रखी थी नींव

दही-चूड़ा भोज की राजनीतिक शुरुआत 1994-95 में तब हुई, जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे. उन्होंने मकर संक्रांति पर अपने आवास पर चूड़ा-दही का आयोजन किया. पहले दिन बड़े नेताओं को बुलाया गया और दूसरे दिन आम लोगों और समर्थकों को न्योता दिया जाता था. लालू यादव खुद अपने हाथों से भोजन परोसते थे, जिससे जनता और सत्ता के बीच नजदीकी का संदेश जाता था. यही परंपरा धीरे-धीरे बिहार की राजनीति का स्थायी हिस्सा बन गई.

परंपरा बनी राजनीतिक मंच

समय के साथ यह भोज सिर्फ सामाजिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग दलों के नेताओं ने इसे अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने और रिश्ते सुधारने का जरिया बनाया. कौन नेता किस भोज में शामिल हुआ और किसने दूरी बनाई, इसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाने लगा. मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें इन आयोजनों पर टिकने लगीं.

तेज प्रताप यादव का नया प्रयोग

इस बार लालू यादव खुद भोज नहीं दे रहे हैं, लेकिन उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है. तेज प्रताप का आयोजन इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के नेताओं को न्योता दिया है. राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और यहां तक कि अपने भाई तेजस्वी यादव को भी बुलाने के लिए वह खुद राबड़ी आवास पहुंचे थे. इस भोज को भविष्य की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है.

रामविलास पासवान और चिराग पासवान की भूमिका

लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान भी हर साल मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा भोज देते थे. बाद में उनके बेटे चिराग पासवान ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया. खास बात यह रही कि 2015 में दिल्ली में हुए भोज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे. उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक थे और राजनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा था.

2015: जब बदली सत्ता की दिशा

2015 के विधानसभा चुनाव से पहले हुए भोज को आज भी याद किया जाता है. उस दौर में नीतीश कुमार एनडीए के साथ थे, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने गठबंधन छोड़ दिया और महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ा. चुनाव नतीजों में महागठबंधन की जीत हुई और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. राजनीतिक जानकारों ने इस बदलाव के संकेत पहले ही दही-चूड़ा भोजों में देख लिए थे.

2017: मिठास के बाद टूट गया गठबंधन

मकर संक्रांति 2017 में राबड़ी देवी के आवास पर हुए भोज में नीतीश कुमार भी शामिल हुए थे. लालू यादव ने उन्हें दही का टीका लगाया था और दोनों नेताओं ने एकता के संकेत दिए थे. उस वक्त कहा गया कि लालू-नीतीश का साथ मजबूत है, लेकिन कुछ ही महीनों में महागठबंधन टूट गया और नीतीश कुमार एनडीए के साथ सरकार बनाने चले गए.

दही-चूड़ा और राजनीतिक घर वापसी

मकर संक्रांति का भोज कई बार नेताओं की घर वापसी का मंच भी बना है. 2018 में जदयू नेता वशिष्ठ नारायण सिंह के घर भोज हुआ, जिसमें उस समय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी शामिल हुए. कुछ ही समय बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया था. इससे यह साफ हो गया कि भोज सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि रणनीति का हिस्सा है.

कोर्ट तक पहुंची दही-चूड़ा की कहानी

दही-चूड़ा की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2018 में लालू यादव ने जेल में रहते हुए जमानत की अर्जी में इसका जिक्र किया था. उन्होंने कहा कि हर साल उनके घर हजारों लोग मकर संक्रांति पर भोज के लिए आते हैं और अगर वह बाहर नहीं रहे तो अपमान होगा. हालांकि अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया, लेकिन यह किस्सा राजनीति में आज भी चर्चा में रहता है.

यह भी पढ़ें: लोहड़ी-संक्रांति से लेकर पोंगल तक... हर राज्य में अलग-अलग क्यों हैं फसलों से जुड़े त्योहार के नाम?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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