उत्तराखंड: कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में एक दिवसीय कॉन्फ्रेंस, रामगंगा नदी के संरक्षण पर बड़ा फैसला
Uttarakhand News: राज्य में 30 जनवरी को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर द्वारा तरंगी रिसॉर्ट में एक दिवसीय 'रामगंगा कॉन्फ्रेंस' का आयोजन किया गया. जिसमें नदी के संरक्षण और संवर्धन पर रणनीति तैयार की गई.

उत्तराखंड के रामगंगा नदी को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की लाइफलाइन कहा जाता है. यह नदी न केवल वन्यजीवों की प्यास बुझाती है, बल्कि तराई क्षेत्र की जैव विविधता और मानव जीवन का भी आधार है. इसी अहमियत को ध्यान में रखते हुए 30 जनवरी 2026 को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर (नैनीताल) द्वारा मर्चूला क्षेत्र स्थित तरंगी रिसॉर्ट में एक दिवसीय 'रामगंगा कॉन्फ्रेंस' का आयोजन किया गया. इस कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य रामगंगा नदी के संरक्षण, संवर्धन और इसके जल में पनपने वाले जीवों की जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए ठोस रणनीति तैयार करना था.
विशेषज्ञों ने जल की गुणवत्ता और बढ़ते प्रदूषण पर की चर्चा
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने रामगंगा नदी की वर्तमान स्थिति, उसके जल की गुणवत्ता और बढ़ते प्रदूषण पर विस्तार से चर्चा की. खास तौर पर बरसात के मौसम में नदी में बहकर आने वाले कूड़े, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट को गंभीर चिंता का विषय बताया गया. वक्ताओं ने माना कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सीधा असर वन्यजीवों और मानव समुदाय दोनों पर पड़ेगा.
कॉन्फ्रेंस के दौरान रामगंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के सर्वे, निरंतर क्वालिटी मॉनिटरिंग और वैज्ञानिक डेटा के संग्रह पर जोर दिया गया. विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीकों के माध्यम से नदी की जैव विविधता का आकलन कर उसे आमजन तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई है. इसके साथ ही जन भागीदारी को संरक्षण की सबसे मजबूत कड़ी बताया गया. लोगों को जागरूक कर, ग्राम पंचायतों, नगर पालिकाओं और जिला प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर नदी को स्वच्छ रखने पर सहमति भी बनाई गई है.
बैठक में नदी के किनारे फील्ड टीम तैनात करने का लिया निर्णय
कॉन्फ्रेंस की अध्यक्षता कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने की. उन्होंने रामगंगा नदी को कॉर्बेट की जीवनरेखा बताते हुए इसके प्राकृतिक स्वरूप की पुनः स्थापना पर बल दिया. बैठक में एक व्यापक एसओपी (Standard Operating Procedure) तैयार करने, नदी के किनारे फील्ड टीम तैनात करने और एक डिजिटल डाटाबेस विकसित करने का निर्णय लिया गया, जिससे भविष्य में संरक्षण कार्यों की निरंतरता भी बनी रहे.
इस सम्मेलन में वन विभाग, आईयूसीएन, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, इकोलॉजिकल एक्सपर्ट्स, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी ने इसे और प्रभावशाली बनाया. रामगंगा कॉन्फ्रेंस ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि नदी का संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी भी है.
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