उत्तराखंड में साइबर ठगों के निशाने पर बुजुर्ग, डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 50 दिनों में 5.42 करोड़ की ठगी
Uttarakhand Digital Arrest: उत्तराखंड में साइबर ठगों के निशाने पर बुजुर्ग हैं, बीते 50 दिनों में साइबर ठगों ने तीन अलग-अलग मामलों में डिजिटल अरेस्ट कर 5.42 करोड़ रुपये की ठगी की.

उत्तराखंड में साइबर ठगों का जाल दिन-ब-दिन मजबूत होता जा रहा है और साइबर ठगों के निशाने पर बुजुर्ग हैं. बीते 50 दिनों में तीन अलग-अलग मामलों में साइबर अपराधियों ने तीन वरिष्ठ नागरिकों को "Digital Arrest" कर 5 करोड़ 42 लाख रुपये की ठगी की वारदात को अंजाम दिया.
दरअसल, ठगी का तरीका बेहद सुनियोजित है. पहले एक फोन आता है, दूसरी तरफ से कोई खुद को पुलिस अधिकारी, CBI या ED का अफसर बताता है. फिर शुरू होता है डराने का सिलसिला, मनी लॉन्ड्रिंग, फर्जी सिम कार्ड, बैंक खाते का दुरुपयोग... आरोपों की एक लंबी फेहरिस्त. बुजुर्ग इतना घबरा जाते हैं कि न बेटे को बताते हैं, न पड़ोसी को और न ही किसी रिश्तेदार को. ठग उन्हें दिनों तक घर में ही "डिजिटल कैद" में रखते हैं और एक-एक करके सारी जमा पूंजी खाते से निकलवा लेते हैं. ठगी का एहसास तब होता है जब खाते में एक भी पैसा नहीं बचता.
चेहरे तीन लेकिन दर्द एक ही
पहला मामला- ऋषिकेश का सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी दंपती भगवत नारायण और उनकी पत्नी — दोनों बुजुर्ग, दोनों निर्दोष. साइबर ठगों ने इस दंपती को पूरे 60 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा और उनसे 1 करोड़ 69 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए. 17 जनवरी 2026 को मुकदमा दर्ज हुआ.
दूसरा मामला — अजबपुर कलां के मंगल सिंह रावत जल निगम से रिटायर हुए मंगल सिंह रावत को 21 नवंबर 2025 को एक फोन आया. कॉलर ने दिल्ली पुलिस अधिकारी बनकर गिरफ्तारी का डर दिखाया और 64 लाख 65 हजार रुपये ठग लिए. 31 जनवरी को पुलिस ने केस दर्ज किया.
तीसरा मामला — बुजुर्ग महिला तनुश्री ठगों ने तनुश्री को बताया कि उनका मोबाइल नंबर मनी लॉन्ड्रिंग केस में है और उनके खाते से 68 लाख रुपये का लेन-देन हुआ है. डर के मारे वो कुछ बोल नहीं पाईं और 3 करोड़ रुपये गंवा बैठीं. 19 फरवरी को मुकदमा दर्ज हुआ.
आखिर बुजुर्ग ही क्यों?
यह सवाल जरूरी है. दरअसल अधिकतर बुजुर्ग अकेले घर पर होते हैं, बच्चे नौकरी के लिए बाहर रहते हैं. वे स्मार्टफोन तो इस्तेमाल करते हैं लेकिन सोशल मीडिया और साइबर ठगी के तरीकों से अनजान हैं. सबसे बड़ी बात — उनमें कानून का एक स्वाभाविक डर होता है, जिसे ये ठग बखूबी भुनाते हैं.
क्या करें, क्या न करें
अगर कोई फोन पर खुद को पुलिस, CBI या ED का अधिकारी बताए और पैसे ट्रांसफर करने को कहे — तो समझिए यह ठगी है. असली पुलिस कभी भी फोन पर "डिजिटल अरेस्ट" नहीं करती. तुरंत फोन काटें, परिवार को बताएं और साइबर हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें. अपने घर के बुजुर्गों को यह बात जरूर समझाएं — क्योंकि एक जागरूक परिवार ही इन ठगों का सबसे बड़ा जवाब है.
























