'यह सवाल हमारी क्षमता पर है...' UGC पर पल्लवी पटेल के बयान से बढ़ी सियासी सरगर्मी
UP Politics: अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल ने कहा है कि जाति के आधार पर छात्रों के साथ भेदभाव संविधान की भावना के खिलाफ है और समाज की प्रगति में बाधा है.

समाजवादी पार्टी की विधायक और अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल ने यूजीसी के नियमों को लेकर बड़ी मांग की है. उन्होंने कहा है कि जाति के आधार पर छात्रों के साथ भेदभाव संविधान की भावना के खिलाफ है और समाज की प्रगति में बाधा है.
एक जनसभा में पल्लवी ने कहा कि यह सिर्फ मेरे और आपके बच्चे की बात नहीं है. आज आपका बच्चा शायद सिर्फ 5 साल का है, शायद 6 साल का है, लेकिन इस बड़े समाज के हर बच्चे की जिम्मेदारी हमारी और आपकी है. क्योंकि अगर एक बच्चे की पढ़ाई रुक जाती है या एक लाख बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है, अगर एक बच्चा आत्महत्या कर लेता है या एक लाख बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं, तो पूरा समाज आहत होता है.
सपा की विधायक ने कहा कि हमने बहुत संघर्ष किया है, हमने बहुत तकलीफें झेली हैं, हमने अपने बच्चों को खेतों से निकालकर उस विश्वविद्यालय या कॉलेज तक भेजा है. और अगर किसी कारण से उनकी पढ़ाई रुक जाती है, तो उनके बेहतर भविष्य के साथ हमेशा खिलवाड़ होता है. इसके साथ-साथ हमारे और आपके सपने भी टूट जाते हैं.
'एक गांव से एक या दो बच्चे ही निकल पाते...'
उन्होंने कहा कि जब बात आती है कि हमारे बच्चे पढ़ने के लिए वहां गए हैं, तो आप दूर मत जाइए, अपने गांव की हालत देखिए. अपने गांव की हालत देखिए. आपके गांव में बहुजन, पिछड़े, दलित, आदिवासी और संपन्न समाज के कितने बच्चों के परिवार रहते होंगे. भले ही वे विदेशों में पढ़ रहे हों, लेकिन गिनकर बताइए कि कितने बच्चे दूसरे राज्यों या दूसरे शहरों में उच्च शिक्षा के लिए जा पाते हैं.
अपना दल (क) नेता ने कहा कि एक गांव से एक या दो बच्चे ही निकल पाते हैं. और जब वे एक या दो बच्चे, जो निकलकर जाते हैं, अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, प्रतियोगी परीक्षाएं पास करने के बाद, जब अच्छे पदों पर बैठते हैं, तो पूरा गांव गर्व महसूस करता है. क्या ऐसा नहीं होता? फिर आप दूर-दराज के अपने रिश्तेदारों से कहते हैं कि यह लड़का हमारा भतीजा है, यह आईएएस अधिकारी बन गया है, इसे बैंक में नौकरी मिल गई है, यह इंस्पेक्टर बन गया है, यह डॉक्टर बन गया है. क्या ऐसा नहीं होता?
उन्होंने कहा कि तो समझिए कि एक गांव में पचास-पचास लड़के होते हैं, लेकिन उनमें से एक ही निकलकर उन संस्थानों तक पहुंच पाता है. और जो वहां तक पहुंचता है, अगर वहां उसकी जाति के आधार पर उसका शोषण होता है और वह आत्महत्या कर लेता है, तो पूरा समाज, पूरा गांव निराश हो जाता है. यह इक्विटी बिल सिर्फ इस उद्देश्य से लाया गया था कि हमारे वे लड़के जो बहुत मेहनत करके, बहुत संघर्ष करके, बहुत सारी परेशानियों से गुजरकर बड़े स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंचते हैं, उनकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए. उनके साथ कोई शोषण न हो, ताकि वे अच्छी तरह पढ़ सकें और अच्छी नौकरियों में बैठ सकें.
'फिर भी तुम आईएएस अधिकारी बन गए...'
उन्होंने कहा कि लेकिन जो वहां पहुंचते हैं, उनसे पूछा जाता है कि तुम्हारी क्षमता नहीं थी, फिर भी तुम आईएएस अधिकारी बन गए, तुम पिछड़े हो, तुम दलित हो, तुम आदिवासी हो. तो अगर यह सवाल हमारी क्षमता पर है, तो मैं आपसे कहता हूं कि सबसे पहले सवाल उनकी क्षमता पर होना चाहिए. जो खुद को उच्च वर्ग कहते हैं, उन्होंने इस आजाद भारत में सबसे पहले अपनी क्षमता दिखाकर इस देश की सारी नौकरियों पर कब्जा करना शुरू किया. उन्होंने इस देश को अपनी क्षमता के हिसाब से चलाया.
विधायक ने कहा कि और आजाद भारत के पचहत्तर सालों में जो देश कभी सोने की चिड़िया कहलाता था, आज वह सबसे ज्यादा कर्ज वाले देशों में शामिल हो गया है. इसलिए क्षमता का सवाल उन लोगों पर होना चाहिए, हम और आप पर नहीं, जो खेतों को छोड़कर भी दिल्ली और लखनऊ की कुर्सियों तक नहीं पहुंच पाए.
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Source: IOCL



























