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यूपी: डकैती के केस में मिली थी उम्रकैद की सजा, 24 साल बाद हाईकोर्ट ने किया बरी

UP News: मैनपुरी जनपद के ज्योति कतारा गांव निवासी आजाद खान को साल 2000 में पुलिस ने डकैती के आरोप में गिरफ्तार किया था. जिसके 24 साल बिताने के बाद हाई कोर्ट ने उसे दोषमुक्त कर धोषित किया है.

भारतीय समाज में एक कहावत प्रचलित है कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता, और यह कहावत आजाद खान की जिंदगी पर पूरी तरह सटीक बैठती है. डकैती के एक मामले में लगे आरोप ने आजाद खान से उसकी पूरी जवानी छीन ली. 24 साल जेल में बिताने के बाद, 14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के पश्चात हाई कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में उसे दोषमुक्त कर दिया, लेकिन तब तक उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा कैद में गुजर चुका है.

धारा 395 व 397 के तहत सुनाई थी उम्र कैद की सजा

उतर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के थाना अलाऊ क्षेत्र अंतर्गत ज्योति कतारा गांव निवासी आजाद खान को साल 2000 में पुलिस ने डकैती के आरोप में गिरफ्तार किया था. अपर सत्र न्यायाधीश, मैनपुरी की अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 395 व 397 के तहत उम्र कैद की सजा सुनाई थी. आजाद के भाई मस्तान ने मजदूरी कर अपने भाई की पैरवी जारी रखी और मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा. जिसके बाद सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष के पास आजाद खान के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है और केवल इकबालिया बयान के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती.

हाई कोर्ट ने 14 साल बाद आजाद खान को किया दोषमुक्त

हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर ने 19 दिसंबर 2025 को आदेश पारित करते हुए आजाद खान को 14 साल बाद साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया था. हालांकि उसकी रिहाई में एक और कानूनी अड़चन सामने आई, जिसमें न्यायालय ने धारा 437-ए के तहत सत्र न्यायालय में कार्रवाई पूरी करने और 20-20 हजार रुपये के दो जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था. जमानतदार पेश न हो पाने के कारण मैनपुरी सत्र न्यायालय से रिलीज ऑर्डर जारी नहीं हो सका, जिसके चलते दोषमुक्त होने के बावजूद भी आजाद जेल की सलाखों के पीछे ही रहा.

बरेली केंद्रीय कारागार के सीनियर जेलर नीरज कुमार के अनुसार, आजाद खान पर एक अन्य मामला धारा 307 का भी लंबित था, जिसमें उसे 10 साल की सजा और 7,000 रुपये का जुर्माना हुआ था. आजाद खान ने सजा की अवधि पूरी कर ली थी, लेकिन जुर्माना अदा न होने के कारण उसे एक साल की अतिरिक्त सजा गुजारनी पड़ रही थी.

मीडिया में मामला आने के बाद प्रशासन हुआ तेज

मीडिया में मामला सामने आने के बाद शासन और जेल प्रशासन हरकत में आया. जहां जेल अधीक्षक अविनाश गौतम ने मैनपुरी न्यायालय में प्रार्थना पत्र भेजा और ई-मेल के माध्यम से रिहाई की प्रक्रिया तेज कराई थी. जिसके बाद सत्र न्यायालय और सरकारी वकील के प्रयास से रिहाई आदेश बरेली केंद्रीय कारागार तक पहुंचा था और अंतिम बाधा 7,000 रुपये के जुर्माने कि की थी, जिसे आजाद का परिवार अदा करने में असमर्थ था. ऐसे में सामाजिक संस्था ‘छोटी सी आशा’ की पारुल मलिक ने आगे आकर जुर्माने की राशि जमा कराई और आजाद खान की रिहाई को सुनिश्चित करा.

रात में ही बरेली सेंट्रल जेल से आजाद खान को उसके भाई मस्तान के सौंपा गया. अदालत से बेगुनाही की मुहर लगने के बावजूद, आजाद खान को सालों तक कैद में रहना पड़ा. उसकी कहानी भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सालों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है?

भीम मनोहर 20 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में काम कर रहे हूं. यूपी के बरेली की गतिविधियों पर नजर रखते हैं. राजनीतिक, क्राइम और सामाजित मुद्दों पर लिखते रहे हैं. 

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