बस्ती में दारोगा जी ने दिखाया रोब, कार से पिता पुत्र को ठोका, फिर कहा- मरे क्यों नहीं अभी तक...
Basti News: उत्तर प्रदेश के बस्ती में एक बार फिर एक दरोगा जी वर्दी को शर्मसार किया है जहां एक पिता पुत्र को अपनी कार से टक्कर मारकर अपत्तिजनक शब्दों को इस्तेमाल किया है जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई है.

Basti News: बस्ती जनपद में पुलिस के 'रक्षक' स्वरूप पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान लग गया है. आलम ये है कि पुलिस वालों की वर्दी का घमंड अब सिर चढ़कर बोलने लगा है, और इस बार तो हद ही हो गई, जब एक दारोगा साहब ने पहले तेज रफ्तार अपनी कार से सड़क किनारे खड़े पिता और पुत्र को ठोका फिर घायल पीड़ितों से कहा, "साले मरे क्यों नहीं अभी तक, हम तो चाहते थे कि मर जाओ!" वाह रे कानून के रखवाले, जिनके जिम्मे आम जन की रक्षा करने का भार है वो खुद सरेआम कानून का मजाक बना रहे और कानून को तोड़ रहे है.
ये बात अलग है कि सभी पुलिस वाले खराब नहीं होते. कुछ ऐसे भी 'नेक' पुलिस वाले होते हैं, जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास रहता है. लेकिन कुछ ऐसे भी 'महानुभाव' हैं, जिन्हें जिम्मेदारी का एहसास ही नहीं होता, और इसी सूची में एक नया नाम जुड़ा है, दारोगा रितेश कुमार सिंह का. लोग कहते हैं, पता नहीं इन्हें कब अपनी जिम्मेदारी का 'एहसास' होगा और कब इनके सिर से ये वर्दी का घमंड टूटेगा? लगता है, ये 'घमंड' ही था जिसके चलते इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है.
दरोगा जी कारनामा
बस्ती में दरोगा जी ने अपनी कार से दो लोगों को उड़ा दिया. जी हां, 'उड़ा' दिया! जिससे वे घायल हो गए. इन्होंने 'इलाज' कराने के बजाए, अपनी 'वर्दी' का पूरा फायदा उठाया. पीड़ितों को ही धमकाते हुए बोले, "साले मरे क्यों नहीं, हम तो चाहते थे कि मर जाओ!" सोचिए, सामने वाला दर्द से कराह रहा होगा, और दारोगा जी 'मौत' की कामना कर रहे हैं! ये है हमारी पुलिस का 'मानवीय चेहरा'. दरोगा जी यहीं नहीं रुके उन्होंने अपनी वर्दी की धौंस दिखाते हुए प्रत्यक्षदर्शियों को धमकी देते हुए कहा, "अगर थाने गए तो तुम लोगों का भी वही हाल होगा, जो बाप-बेटे का हुआ." अब इन्हें कौन समझाने जाए कि ये न तो कोई 'खुदा' हैं, और न कोई 'गुंडा'. ये तो बस एक ऐसे 'दरोगा' हैं, जिनकी 'वर्तमान परिवेश' में वर्दी उतरते देर नहीं लगती. लगता है.
मामले के पीड़ित, घायल लाटबक्स सिंह का कहना है, "अगर चौकी इंचार्ज हम लोगों की मदद करते तो हम लोग उनके खिलाफ मुकदमा न दर्ज करवाते." यानी, अगर पुलिस अपना 'फर्ज' निभाती, तो जनता को अदालत का दरवाजा खटखटाना ही नहीं पड़ता. लेकिन दारोगा जी ने मदद करने के बजाय, वर्दी का 'रौब' दिखाया, और शायद यही उनके लिए महंगा पड़ गया. कहा भी जाता है, "जो मजा किसी की मदद में मिलता है, वह मजा दौलत में नहीं मिलता." लेकिन हमारे कुछ पुलिसकर्मियों को ये बात समझ ही नहीं आती. अगर किसी पुलिस वाले को अपनी वर्दी पर इतना ही घमंड है, तो उसे उन लोगों पर उतारना चाहिए, जो समाज और सरकार दोनों के दुश्मन होते हैं – अपराधी, भ्रष्टाचारी. बेगुनाह, घायल और परेशान लोगों पर नहीं!
दरोगा जी पर हुई एफआईआर
इस मामले में दरोगा जी पर अब एफआईआर दर्ज हो चुकी है, लेकिन देखना यह होगा कि इस 'खाकी के घमंड' पर कब तक लगाम लगती है. या फिर, ये मामला भी चंद दिनों की 'मीडिया कवरेज' के बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा? जनता तो यही चाहती है कि दारोगा जी को सबक मिले, ताकि भविष्य में कोई और 'खाकीधारी' इस तरह से अपने पद का दुरुपयोग करने की हिम्मत न कर सके. लेकिन, क्या ऐसा होगा? ये सवाल आज भी हवा में तैर रहा है. इस दुर्घटना में पिता और पुत्र दोनों को गंभीर चोट आई है, जिसमें पिता का कंधा टूट गया है और पुत्र को भी काफी चोट आई है. वही आरोपी दरोगा रितेश सिंह वर्तमान में जिले के असनहरा चौकी प्रभारी के पद पर कार्यरत है.
वही इस मामले को लेकर हमने महकमे के डीआईजी संजीव कुमार त्यागी से बात की तो उन्होंने पूरे प्रकरण की जानकारी ली और कहा जल्द ही कार्यवाही की जाएगी, वही दरोगा रितेश सिंह से जब हमने उनका पक्ष लिया तो उन्होंने बताया कि दुर्घटना हुई थी मगर घायलों द्वारा अभद्रता का आरोप निराधार है, कहा मुकदमा दर्ज हुआ है आला अधिकारी जो निर्देश देंगे उसका पालन होगा. कहा वे खुद घायलों को एंबुलेंस से अस्पताल भिजवाए थे मगर अब घायल न जाने क्यों आरोप लगा रहे है.
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Source: IOCL





















