सियासी खेल देख रहा है कानपुर, बड़ा सवाल- कब तक आंसू बहाता रहेगा एशिया का मेनचेस्टर
राम मन्दिर आन्दोलन और गठबंधन की राजनीति के दौर में कानपुर के कई मंत्री विधायक सांसद अपने दायरे से बाहर नहीं निकल सके।

कानपुर: दिल्ली से लेकर यूपी तक की सियासत में कानपुर ने हमेशा अहम योगदान दिया है। कानपुर कई बड़े नेताओं की कर्मस्थली रहा है। एक बात और गौर करने वाली है कि 80 के दशक से कानपुर शहर को केन्द्र और राज्य स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाला कोई बड़ा नेता नहीं मिला है। राम मन्दिर आन्दोलन और गठबंधन की राजनीति के दौर में कानपुर के कई मंत्री विधायक सांसद अपने दायरे से बाहर नहीं निकल सके और शहर के आम जनमानस पर छाप छोड़ने में नाकाम ही रहे।
पूर्व सांसद श्री प्रकाश जयसवाल जरूर इसका अपवाद रहे और कानपुर का बड़ा नाम बने, लेकिन राज्य स्तर पर कानपुर की आवाज उठाने वाला कोई भी प्रभावी राजनेता शहर के सियासी परिदृश्य में नहीं दिखा। सत्ता विरोधी लहर में चलने वाले कानपुर ने भी बदलते वक्त में अपनी धारा बदल ली है।
वादों का क्या ?
कानपुर के सबसे बड़े नेता श्री प्रकाश जायसवाल जो पंद्रह साल सांसद रहे और केंद्रीय कोयला मंत्री के साथ ही गृह राज्य मंत्री भी रहे, लेकिन उन्होंने शहर के लिए कुछ खास नहीं किया। कई बार उन्हों लोगों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी एक रैली के दौरान लाल इमली और एल्गिन मिल को चलाने और शहर में उद्योग फिर से स्थापित कराने का वादा भी किया था, लेकिन वादे सिर्फ वादे ही साबित हुए।
लापता होने के लगे पोस्टर
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कानपुर की जनता से तमाम वादे किए थे लेकिन विकास कार्य कहीं नजर नहीं आए। कानपुर ने बीजेपी को भी मौका दिया और पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को सांसद बनाया लेकिन हालात ये रहे कि कार्यकर्ता भी अपने सांसद के प्रति नाराजगी जताते रहे और कई बार तो जोशी जी के लापता होने के पोस्टर भी शहर में नजर आए।
क्या फिर बदलेंगे हालात
देश चुनावी मोड में है और ऐसे में एक बार फिर सियासी दलों ने कानपुर के लिए वादों का पिटारा खोल दिया है। कानपुर में सियासी दलों को बेहतर काम करना होगा। आज भी अगर कानपुर को लेकर सियासी दलों के रुख में बदलाव आया तो एशिया का मेनचेस्टर एक बार फिर नई बुलंदियों को छू सकेगा।
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