रामपुर: नवाब खानदान के नूर का सियासी रंग उतरा, पहली बार ‘हाथ’ छूटा
देश के पहले लोकसभा चुनाव (1952) को अगर छोड़ दिया जाए, तो आजादी के बाद से ही लंबे समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट पर नवाब खानदान का गहरा प्रभाव रहा है। 2019 में ऐसा पहली बार है, जब नवाबों के इर्द-गिर्द रही रामपुर की सियासत में नवाब ही चुनावी रण में गायब दिखेंगे।

रामपुर, एबीपी गंगा। रामपुर संसदीय सीट के इतिहास का जिक्र नवाब खानदान का नाम लिए बगैर अधूरा कहा जाएगा। देश के पहले लोकसभा चुनाव (1952) को अगर छोड़ दिया जाए, तो आजादी के बाद से ही लंबे समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट पर नवाब खानदान का गहरा प्रभाव रहा है। 2019 में ऐसा पहली बार है, जब नवाबों के इर्द-गिर्द रही रामपुर की सियासत में नवाब ही चुनावी रण में गायब दिखेंगे।
‘हाथ’ ने छोड़ा साथ
कांग्रेस ने रामपुर में नवाब खानदान को टिकट न देखर उनका पत्ता साफ कर दिया है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब कांग्रेस ने रामपुर से नवाब खानदान का टिकट काटकर किसी हिंदू को अपना उम्मीदवार बनाया है। दरअसल, आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव को छोड़कर बाकी सभी चुनावों में नवाब खानदान के सदस्य ही कांग्रेस के उम्मीदवार बनते रहे हैं। हालांकि, इस बार कांग्रेस ने नवाब खानदान का हाथ झिड़कते हुए पूर्व विधायक संजय कपूर को मैदान में उतारा है। ऐसे में सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ये नवाब खानदान की सियासत का अंत है?
कांग्रेस का नवाब खानदान का रिश्ता कितना गहरा?
कांग्रेस द्वारा नवाब खानदान के टिकट काट देना बहस का मुद्दा इसलिए बन गया, क्योंकि दोनों के बीच का ये गहरा रिश्ता नेहरू और इंदिरा के वक्त से है। रिश्ते की इस गहराई का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि दो बार सांसद रह चुकीं नूरबानो की शादी में खुद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आशीर्वाद देने पहुंचे थे। इतना ही नहीं, रामपुर में चुनावी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी भी रात्रि विश्राम करने के लिए नवाब के महल में ही जाया करती थीं।
नौ बार सांसद चुने गए नवाब खानदान के सदस्य
अबतक रामपुर नवाब खानदान से जुड़े नौ सदस्यों को संसद पहुंचा चुका है। बेगम नूरबानो भी इसी संसदीय सीट से दो बार सांसद रहीं, लेकिन इस बार कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया। जबकि एक जमाना था, जब नवाब खानदान दूसरो को टिकट दिलवाया करता था। नवाब खानदान के रुतबे का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि देश की आजादी के बाद नवाबी तो खत्म हो गई थी, लेकिन रामपुर में नवाब खानदान का ही सिक्का चलता था।
इसके पीछे की बड़ी वजह ये रही कि नवाबी खत्म होने के बाद नवाब खानदान ने सियासत में अपनी गहरी और मजबूत पकड़ बना ली थी। कांग्रेस भी नवाब खानदान की वजह से रामपुर में मजबूर दल बनी। यहीं कारण है कि रामपुर के लोग नूर महल को कांग्रेस का संचालन केंद्र मानने लगे। इसी नूर महल में प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर इंदिरा और मनमोहन सिंह भी जा चुके हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या नवाब खानदान के सियासी रसूख का अंत 2019 में टिकट न मिलना है।
- पहले लोकसभा चुनाव (1952) में रामपुर संसदीय सीट से महान क्रांतिकारी मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस प्रत्यारी रहे। चुनाव जीते और देश के पहले शिक्षा मंत्री बने।
- 16 चुनाव में से दस बार रामपुर सीट से कांग्रेस जीती है।
- 1952 के बाद हुए सभी चुनावों में कांग्रेस की टिकट पर नवाब खानदान के प्रत्याशी रामपुर संसदीय सीट से लड़ते रहे और नौ बार संसद पहुंचे।
- 1957 और 1962 में राजा सैयद मेंहदी सांसद बने।
- इसके बाद जुल्फिकार अली खां उर्फ मिक्की मियां भी पांच बार रामपुर से जीतकर लोकसभा पहुंचे। 1967, 1971, 1980,1984 और 1989 के चुनाव में जीतकर सांसद बने।
- मिक्की मियां की सड़क हादसे में मौत होने के बाद इस सीट से उनकी पत्नी बेगम नूरबानो की राजनीति में एंट्री हुई।
- नूरबानों ने 1996 में पहली बार चुनाव लड़ा और जबरदस्त जीत हासिल की।
- 1999 के चुनाव में एक बार फिर बेगम नूरबानो को भारी जनसमर्थन मिला और वो सांसद चुनी गईं।
- बेगम नूरबानो की राजनीति एंट्री के साथ ही उनके बेटे नवाब काजिल अली खां उर्फ नवेद मियां भी सियासी गलियारों में उतर आए।
- नवेद मियां लगातार पांच बार विधायक रहे। 1996 से 2017 तक लगातार विधायक रहे। कांग्रेस के टिकट पर 1996 में विधायक बने। 2002 के चुनाव में स्वार से कांग्रेस की टिकट पर लड़े और जीते।
- 2014 में कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन मोदी लहर में खुद को स्थापित न कर सके और हारे।
- 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी का विजय रथ रोकने में नवेद मियां असफल रहे और एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा।

‘कॉमा लगा, फुल स्टॉप नहीं’
सवाल उठे तो जवाब की तलाश शुरू हुई। नवाब खानदान के सियासी रसूख के खत्म होने का सवाल जब पूर्व सांसद नूरबानों से पूछा गया, तो उन्होंने कहा- अभी कॉमा जरूर लगा है, लेकिन फुल स्टॉप नहीं।
किसी भी दल ने नहीं लगाया गले
इसे विडंवना ही कहेंगे कि नूरबानो के बेटे नवेद मियां अपनी सुविधा के अनुसार दल बदलते रहे हैं, लेकिन इस बार किसी भी दल ने नवाब खानदान के किसी को सदस्य को गले नहीं लगाया है। नवाब खानदान इस कदर सियासत से बेदखल हो जाएगा, ऐसा शायद रामपुर ने कभी सपनों में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन यह भी सच है कि सियासत में कोई किसी का नहीं होता।
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