इस मामले में सबसे जुदा है यूपी की सियासत, यहां कभी पैर नहीं जमा पाए बाहरी दल
बीजेपी, कांग्रेस, सपा, बसपा या फिर राष्ट्रीय लोकदल ही ऐसे सियासी दल रहे हैं जो यूपी के सियासी आसमान में सितारे बनकर चमकते रहे हैं।

लखनऊ, एबीपी गंगा। उत्तर प्रदेश का सियासी मिजाज अलग है। यहां न जाने कितने दलों ने एंट्री मारी, अपनी सियासी पारी का आगाज किया लेकिन ये दल कभी सफल नहीं हो सके। बीजेपी, कांग्रेस, सपा, बसपा या फिर राष्ट्रीय लोकदल ही ऐसे सियासी दल रहे हैं जो यूपी के सियासी आसमान में सितारे बनकर चमकते रहे हैं।
ऐसा रहा जनता दल (यू) का हाल
सबसे पहले बात करते हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) की। 2019 के लोकसभा चुनाव में भले ही बिहार में भाजपा और जेडीयू के बीच गठजोड़ हुआ हो लेकिन यूपी में स्थिति अलग है। 2014 में यूपी से जेडीयू से एक उम्मीदवार ने किस्मत आजमाई थी। तब भदोही संसदीय सीट पर तेज बहादुर यादव मैदान में उतरे और चौथे स्थान पर रहे थे। 2009 में जेडीयू को उत्तर प्रदेश की बदायूं और सलेमपुर सीट मिली थी लेकिन जीत दूर ही रही। 2004 में आंवला सीट पर पार्टी के कुंवर सर्वराज सिंह चुनाव जीते थे। तब राजग ने जेडीयू को आंवला, मेरठ और सलेमपुर सीट दी थी।
लालू को नहीं मिली सफलता
एक दौर था जब बिहार में लालू प्रसाद यादव सबसे बड़े नेताओं में से एक थे। बिहार ही नहीं यूपी में भी लालू के चाहने वालों की कमी नहीं थी। राजनीतिक मंचों पर भी लालू खूब नजर आते थे, लेकिन इतना सब कुछ होने को बाद भी लालू यूपी में सफलता के सिर्फ सपने ही देखते रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में दस सीटों पर उन्होंने अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन नतीजा ये हुआ कि सभी की जमानत जब्त हो गई थी। इसके बाद भी लालू ने कई प्रयास किए लेकिन नतीजा सिफर ही रहा।
जमानत नहीं बचा पाए प्रत्याशी
यूपी के सियासी दंगल में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के अध्यक्ष रामदास आठवले भी यूपी में जोर आजमाइश करते रहे हैं। अठावले अक्सर यूपी का दौरा करते हैं और गठबंधन में सीटों की मांग करते रहे हैं। अठावले को भाजपा ने कभी साझीदार उम्मीदवार नहीं दिया। जो अकेले लड़े वह जमानत भी नहीं बचा पाए।
शरद पवार ने भी खूब की कोशिश
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे शरद पवार ने भी यूपी में खूब सियासी रंग दिखाए। यूपी को लेकर पवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन कभी सफल नहीं हो सके। 2004 में शरद पवार की पार्टी एनसीपी के चार उम्मीदवार मैदान में तो उतरे लेकिन सभी की जमानत जब्त हो गई।
कभी साकार नहीं हुआ शिवसेना का सपना
महाराष्ट्र की सियासत में आला मुकाम रखने वाली शिवसेना को भी यूपी की सियासत रास नहीं आई। राम मंदिर आंदोलन की वजह से पहचान तो खूब मिली लेकिन सियासी मुकाम कभी नहीं मिला। 2004 में शिवसेना के सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। पासवान भी नहीं रहे पीछे
रामविलास भी रहे असफल
लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान ने भी यूपी में पैर पसारने के हर संभव प्रयास किए हैं। रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान ने यूपी में यहां रैली करने से लेकर संगठन को विस्तार देने की खूब पहल की लेकिन यहां उनके पांव नहीं जमे। 2004 में लोक जनशक्ति पार्टी ने तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन जनता का साथ नहीं मिला। पिछले दो चुनावों में रामविलास पासवान की पार्टी ने उत्तर प्रदेश का रुख नहीं किया है।
ममता के लिए सपना ही रहा यूपी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2012 के विधानसभा चुनाव में यूपी की तरफ रुख किया था। टीएमसी को थोड़ी राहत तब मिली थी जब श्याम सुंदर शर्मा की बदौलत मथुरा जिले में उन्हें एक सीट मिल गई था। शर्मा इस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिए गए लेकिन, वह देर तक टिके नहीं। शर्मा पाला बदलकर बसपा में चले गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी यूपी की सियासत से दूर ही नजर आई।
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