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कहानी आपातकाल की: इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसला... और देश में हो गया इमरजेंसी का एलान

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को बड़ा झटका दिया है। इस झटके के बाद इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी।

देश में आपातकाल की नींव इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से पड़ गई थी जिसमें अदालत ने राजनारायण के पक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ अपना फैसला सुनाया था। अदालत के फैसले से पहले 12 जून 1975 की सुबह इंदिरा गांधी अपने असिस्टेंट से पूछती हैं। आज तो रायबरेली चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आना है। इस पर वहां मौजूद इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी कहते हैं, "आप बेफिक्र रहिए।" संजय का तर्क था कि इंदिरा की सांसदी को चुनौती देने वाले संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण के वकील भूषण नहीं थे। जबकि इंदिरा के वकील एसी खरे ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि फैसला उनके ही पक्ष में आएगा। कांग्रेसी खेमा पूरी तरह से आश्वस्त था, लेकिन उस दिन जो हुआ वो इतिहास बन गया। जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इंदिरा के खिलाफ अपना फैसला सुना दिया।

जज ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली करने का दोषी पाया और रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। साथ ही इंदिरा के अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई। हाईकोर्ट से मिले इंदिरा को झटके के बाद कांग्रेसी खेमा स्तब्ध रह गया तो राज नारायण के समर्थक दोपहर में दिवाली मनाने लगे। संजय गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का पता चला तो वो तुरंत पीएम हाउस पहुंचे। इंदिरा उनके बेटे संजय गांधी समेत तमाम खास नेता इस झटके से उबरने की रणनीति बनाने लगे। तो उधर, इंदिरा की सियासी जमीन को खिसकाने के लिए जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेता आंदोलन की तैयारी में थे। विपक्षी नेता हर हाल में इंदिरा गांधी के इस्तीफे की चाह में थे। वहीं, संजय गांधी ने भी तय कर लिया था कि किसी भी सूरत में इस्तीफा नहीं दिया जाएगा। 15 जून को संजय गांधी ने बंसीलाल और आर.के धवन के साथ बैठक की। बैठक में तय हुआ कि जरूरत हुई तो देश में आपाताकल भी लगाया जा सकता है। साफ था कि इंदिरा प्रधानमंत्री के पद पर बने रहना चाहती थीं।

एक तरफ संजय गांधी मोर्चा संभाले हुए थे तो वहीं, दूसरी तरफ जयप्रकाश नारायण सत्ता से तकरार की तैयारी में थे। जेपी कांग्रेस के बागियों की अगुवाई करने दिल्ली आने वाले थे, लेकिन इससे पहले ही इंदिरा ने 20 जून को एक रैली की... रैली में लाखों लोग जुटे। इतनी बड़ी भीड़ के सामने इंदिरा पारिवारिक बातों पर भावुक भी हुई और उन्होंने विपक्षियों पर जमकर निशाना भी साधा। इंदिरा की इस रैली को दूरदर्शन पर 25 मिनट तक दिखाया गया.. कहा जाता है कि उस जमाने में दूरदर्शन ने इस पर करीब सात हजार रुपए खर्च किए। भाषण के अंत में इंदिरा ने लोगों से कहा था कि अब आप घर जाइए और बॉबी फिल्म का मजा लीजिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से आहत इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन यहां से भी इंदिरा के लिए अच्छी खबर नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 24 जून 1975 को याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे। हालांकि उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दे दी, लेकिन कहा कि वे अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष को और बल मिल गया। इसी बीच विपक्षी नेताओं ने तय कर लिया कि 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की रैली होगी। 25 जून की दोपहर रामलीला मैदान में जेपी आए... लाखों लोगों की भीड़ देखकर एक सफदरजंग में हलचल मच गई। रैली के मंच से जेपी ने इंदिरा को चुनौती दे डाली। जेपी ने रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ से कह दिया था कि चाहे कुछ भी हो, हम इंदिरा का तानाशाही नहीं सहेंगे।

उधर रैली खत्म होने के बाद इंदिरा रात आठ बजे राष्ट्रपति फखरुद्दीन से मिलने राष्ट्रपति भवन पहुंचीं। उसी रात करीब 11 बजे इंदिरा गांधी ने अपने गृहमंत्री को बुलाया.. और उसके एक घंटे बाद इमरजेंसी का प्रस्ताव राष्ट्रपति भवन आ पहुंचा। 26 जून की सुबह छह बजे आपात बैठक बुलाई गई.. किसी भी मंत्री ने इमरजेंसी के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। इससे पहले आधी रात को पुलिस जेपी को गिरफ्तार कर चुकी थी। गांधी परिवार की नीतियों का विरोध कर रहे चंद्रशेखर तुरंत संसद मार्ग थाने पहुंचे। जहां उन्हें पता चला कि केवल जेपी को ही नहीं, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया है। सुबह आठ बजे इंदिरा ने देशवासियों को रेडियो के जरिए आपातकाल की जानकारी दी। इंदिरा के ऐलान से पहले ही विरोधी नेताओं को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया था।

आपातकाल की काली रात 19 महीने लंबी थी और इस लंबे वक्त तक देश का लोकतंत्र कोमा में रहा। जनता के अधिकार, लिखने बोलने की आजादी सब आपातकाल की जंजीरों में जकड़ी हुई थी। आपातकाल के दौरान इंदिरा के बेटे संजय गांधी की हनक थी। जबरन नसबंदी जैसे तानाशाही फैसलों ने जनता को परेशान कर दिया था। जनवरी के महीने में आपातकाल हटाने के फैसले के साथ-साथ राजराजनीतिक बंदियों को रिहा करने के आदेश दिए गए और आम चुनाव की घोषणा की गई। इंदिरा को लगने लगा था कि वो प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएंगी, लेकिन जनता ने कुछ और ही सोच रखा था। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। इंदिरा गांधी.. संजय गांधी समेत तमाम नेता हारे और हार गई तानाशाही...

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