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चमोली टनल हादसा: विकास के बीच सुरक्षा पर बड़ा सवाल

Chamoli News: चमोली की निर्माणाधीन टनल में हुआ हादसा हिमालयी विकास परियोजनाओं में सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

Uttarakhand News: चमोली के पीपलकोटी में विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन टनल में हुआ हादसा हिमालयी क्षेत्रों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है. यह घटना सिर्फ एक टनल में मलबा और पानी आने तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्माण के दौरान मजदूरों की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और जोखिमों की निगरानी को लेकर कई बड़े सवाल सामने लाती है.

चमोली की यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी परियोजना में इससे पहले भी गंभीर हादसा हो चुका है. ऐसे में सवाल यह है कि पिछले हादसे से क्या सबक लिया गया और क्या उन सुरक्षा उपायों को जमीन पर उतारा गया, जिनकी जरूरत एक संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में लगातार बनी रहती है.

मायापुर-पीपलकोटी क्षेत्र में निर्माणाधीन टनल के भीतर अचानक पानी और भारी मलबा पहुंचने की घटना ने कुछ ही समय में पूरे इलाके को आपात स्थिति में बदल दिया. टनल के भीतर काम कर रहे मजदूरों के सामने अचानक रास्ता बंद होने और पानी-मलबे के बीच फंसने का खतरा पैदा हुआ. बाहर मौजूद बचाव दल के लिए भी चुनौती इसलिए बड़ी थी क्योंकि जिस जगह घटना हुई, वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें उसी सुरंग के भीतर जाना था, जहां हालात लगातार बदल रहे थे.

हिमालय में सुरंग निर्माण के दौरान चट्टानों की संरचना, भूमिगत पानी और पहाड़ के भीतर मौजूद प्राकृतिक दबाव को लेकर जोखिम हमेशा बना रहता है. लेकिन किसी परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था का वास्तविक परीक्षण भी ऐसे ही समय में होता है. सामान्य परिस्थितियों में मशीनों और तकनीक के सहारे निर्माण करना एक बात है, लेकिन अचानक पानी या मलबा आने की स्थिति में मजदूरों को कितनी जल्दी चेतावनी मिलती है, उन्हें सुरक्षित क्षेत्र तक पहुंचने का रास्ता कितना उपलब्ध है और बचाव दल कितनी तेजी से अंदर पहुंच सकता है—यही किसी परियोजना की वास्तविक आपदा तैयारी को परिभाषित करता है.

विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना कोई छोटा निर्माण कार्य नहीं है. परियोजना की टेल रेस टनल करीब 3.07 किलोमीटर लंबी है, जबकि परियोजना में लगभग 13.4 किलोमीटर लंबी हेड रेस टनल भी शामिल है. इस पूरे निर्माण क्षेत्र में सुरंगों के भीतर लंबे हिस्से तक मजदूरों और मशीनों की आवाजाही होती है. ऐसे में किसी एक स्थान पर रास्ता बाधित होने का असर केवल कुछ मीटर के दायरे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके कारण अंदर मौजूद श्रमिकों तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो सकता है.

हादसे से जुड़ी जानकारी के मुताबिक जिस हिस्से में मजदूर फंसे, वह टनल के भीतर करीब 1.8 किलोमीटर अंदर था. इस दूरी को सिर्फ एक आंकड़े की तरह देखना सही नहीं होगा. आपात स्थिति में डेढ़-दो किलोमीटर की सुरंग के भीतर पहुंचना, रास्ते से मलबा हटाना, पानी को नियंत्रित करना और साथ ही बचावकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बेहद जटिल प्रक्रिया बन जाती है. यही कारण है कि सुरंग परियोजनाओं में आपातकालीन निकासी और वैकल्पिक बचाव मार्गों की भूमिका सामान्य निर्माण स्थलों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है.

ऑक्सीजन की कमी ने बताया कि टनल के भीतर खतरा कितना बड़ा था

हादसे के बाद बचाव अभियान में केवल मलबा और पानी ही सबसे बड़ी समस्या नहीं थे. टनल के भीतर ऑक्सीजन का स्तर कम होना भी बचावकर्मियों के लिए गंभीर चुनौती बना. ऐसी स्थिति में अंदर जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए जोखिम कई गुना बढ़ जाता है. बचाव दल को एक तरफ फंसे मजदूरों तक पहुंचना था, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना था कि बचाव अभियान में शामिल कर्मचारी खुद किसी नए खतरे में न फंस जाएं.

ऑक्सीजन की कमी के कारण अभियान को रोकना पड़ा, यह तथ्य अपने आप में इस सवाल को सामने लाता है कि लंबी और गहरी सुरंगों में वेंटिलेशन, ऑक्सीजन मॉनिटरिंग और आपातकालीन संचार की व्यवस्था कितनी मजबूत होनी चाहिए. निर्माणाधीन सुरंग में हालात सामान्य सुरंग से अलग होते हैं, क्योंकि वहां स्थायी सुरक्षा ढांचा पूरी तरह तैयार नहीं होता. ऐसे में अस्थायी लेकिन प्रभावी वेंटिलेशन और आपातकालीन सुरक्षा प्रणाली का महत्व और बढ़ जाता है.

कई एजेंसियों की मौजूदगी के बावजूद असली परीक्षा सिस्टम की है

ऐसी घटनाओं में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, फायर सर्विस, डीआरएफ, सेना और आईटीबीपी जैसी एजेंसियों का मौके पर पहुंचना जरूरी है, लेकिन केवल एजेंसियों की संख्या से किसी रेस्क्यू सिस्टम की मजबूती साबित नहीं होती. असली सवाल यह है कि घटना के पहले कुछ मिनटों में परियोजना के अंदर मौजूद सुरक्षा व्यवस्था ने कैसे प्रतिक्रिया दी और बाहर की एजेंसियों को घटनास्थल तक पहुंचने के लिए कितना समय और कितनी अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ी.

एक बड़े टनल प्रोजेक्ट में बाहरी आपदा प्रतिक्रिया दलों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन पहली सुरक्षा लाइन परियोजना के भीतर ही मौजूद होनी चाहिए. मजदूरों को तत्काल चेतावनी देना, उनकी लोकेशन का पता लगाना, सुरक्षित हिस्से तक पहुंचाना, ऑक्सीजन और वेंटिलेशन बनाए रखना तथा बाहर मौजूद नियंत्रण कक्ष को लगातार जानकारी देना—ये व्यवस्थाएं किसी बाहरी एजेंसी के पहुंचने का इंतजार नहीं कर सकतीं. चमोली की घटना इसलिए इन आंतरिक प्रणालियों की प्रभावशीलता की समीक्षा का भी अवसर देती है.

चमोली और उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र भूस्खलन, भारी बारिश, अचानक पानी आने और जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों के लिए जाना जाता है. इसलिए किसी भी सुरंग परियोजना में प्राकृतिक जोखिम को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है. लेकिन प्राकृतिक जोखिम का मौजूद होना सुरक्षा की जिम्मेदारी को खत्म नहीं करता. उलटे, जितना अधिक संवेदनशील क्षेत्र होगा, उतनी ही मजबूत जोखिम पहचान और निगरानी की जरूरत होगी.

यही वजह है कि इस हादसे के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पहाड़ में मलबा क्यों आया. बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि जिस क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं की संभावना पहले से मौजूद है, वहां मजदूरों की सुरक्षा के लिए कितनी तैयारी की गई थी. क्या भूमिगत पानी के दबाव की लगातार निगरानी हो रही थी? क्या टनल के भीतर अचानक पानी आने की स्थिति में तत्काल चेतावनी देने वाली प्रणाली प्रभावी थी? क्या मजदूरों को आपात स्थिति में बाहर निकलने के लिए पर्याप्त सुरक्षित विकल्प उपलब्ध थे? इन सवालों के जवाब हादसे की प्रकृति को समझने में ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे.

मॉक ड्रिल के बावजूद उठता है व्यवस्था की प्रभावशीलता का सवाल

इस परियोजना में जुलाई 2025 में बाढ़ जैसी आपात स्थिति को लेकर मल्टी-एजेंसी मॉक ड्रिल भी की गई थी. इस अभ्यास में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सीआईएसएफ, स्थानीय पुलिस, परियोजना से जुड़े कर्मचारी और एचसीसी की टीमें शामिल हुई थीं. अर्ली फ्लड वार्निंग सिस्टम की क्षमता और आपात स्थिति में विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल को भी परखा गया था.

यहीं पर मौजूदा हादसा एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है. मॉक ड्रिल का उद्देश्य ही यही होता है कि वास्तविक आपदा आने से पहले व्यवस्था की कमजोरियां सामने आ जाएं और उन्हें दूर किया जा सके. इसलिए अब यह देखना जरूरी होगा कि वास्तविक घटना के समय वही सुरक्षा और चेतावनी व्यवस्था कितनी प्रभावी रही. अगर किसी सिस्टम की मौजूदगी कागज पर थी लेकिन वास्तविक आपदा के समय उसका असर सीमित रहा, तो केवल मॉक ड्रिल का आयोजन पर्याप्त नहीं माना जा सकता. जांच को इस अंतर तक पहुंचना होगा कि तैयारी और वास्तविक प्रतिक्रिया के बीच कहीं कोई कमी तो नहीं थी.

इस घटना को परियोजना के बाकी सुरक्षा रिकॉर्ड से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा. दिसंबर 2025 में इसी विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना की सुरंग में दो लोको ट्रेनों की टक्कर हुई थी. उस घटना में मजदूरों और कर्मचारियों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी और बाद में सुरक्षा व्यवस्था तथा घटना के कारणों को लेकर जांच की बात कही गई थी.

एक ही परियोजना में कुछ महीनों के अंतराल पर दो गंभीर घटनाएं सामने आने से स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या परियोजना में सुरक्षा संस्कृति को लेकर व्यापक समीक्षा की जरूरत है. हर हादसे की वजह अलग हो सकती है और यह कहना उचित नहीं होगा कि दोनों घटनाओं का कारण एक ही है. लेकिन लगातार सामने आने वाली गंभीर घटनाएं यह जरूर बताती हैं कि सुरक्षा व्यवस्था को केवल हादसे के बाद नहीं, बल्कि नियमित रूप से स्वतंत्र नजर से जांचते रहना जरूरी है.

इस घटना की जांच अगर केवल इस सवाल पर खत्म हो जाती है कि मलबा और पानी टनल के भीतर किस रास्ते से आया, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. जांच को यह भी देखना होगा कि हादसे से पहले मौसम और भूगर्भीय परिस्थितियों की जानकारी क्या थी, टनल के भीतर काम जारी रखने का निर्णय किन सुरक्षा मानकों के आधार पर लिया गया और पानी या मलबे के संभावित प्रवेश को लेकर क्या निगरानी की जा रही थी.

इसके साथ मजदूरों की वास्तविक समय में मौजूदगी और उनकी लोकेशन का रिकॉर्ड, आपातकालीन संचार व्यवस्था, वैकल्पिक निकासी मार्ग, ऑक्सीजन और वेंटिलेशन की निगरानी, टनल के भीतर चेतावनी प्रणाली, आपातकालीन बिजली और प्रकाश व्यवस्था तथा बचाव दल के लिए निर्धारित प्रवेश मार्ग भी जांच के दायरे में आने चाहिए. इससे यह पता चल सकेगा कि हादसा पूरी तरह अचानक और अनियंत्रित था या उससे पहले कुछ ऐसे संकेत मौजूद थे जिन्हें समय रहते पहचानकर जोखिम को कम किया जा सकता था.

हिमालय में विकास जरूरी है, लेकिन सुरक्षा की कीमत पर नहीं

विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना 444 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना है और इसमें चार 111 मेगावाट की इकाइयां प्रस्तावित हैं. ऐसी परियोजनाएं उत्तराखंड की ऊर्जा जरूरतों, राज्य के आर्थिक हितों और देश की बिजली व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. इसलिए किसी भी विश्लेषण का निष्कर्ष यह नहीं होना चाहिए कि हिमालय में विकास कार्य बंद कर दिए जाएं.

असल बहस विकास की गति और सुरक्षा की गुणवत्ता के बीच संतुलन की है. हिमालय में सुरंग बनाना मैदानी इलाके में सुरंग बनाने जैसा काम नहीं है. यहां भूगर्भीय परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं, भूमिगत पानी अचानक रास्ता बदल सकता है और पहाड़ की संरचना का व्यवहार इंजीनियरिंग अनुमान से अलग हो सकता है. ऐसे में परियोजना की समयसीमा और लागत के साथ सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता देना जरूरी है. मजदूरों की सुरक्षा को निर्माण की रफ्तार से पीछे नहीं रखा जा सकता.

विष्णुगाड़-पीपलकोटी की घटना अब सिर्फ इस एक परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है. उत्तराखंड में सड़क, रेलवे, जलविद्युत और दूसरी बड़ी परियोजनाओं के लिए लगातार सुरंगों और भूमिगत निर्माण का इस्तेमाल बढ़ रहा है. ऐसे में चमोली की घटना से निकले सवाल आने वाले समय की दूसरी परियोजनाओं पर भी लागू होंगे.

सबसे जरूरी बात यह है कि किसी हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान सफल होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि वही परिस्थिति दोबारा पैदा न हो. इसके लिए परियोजनाओं की नियमित स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, वास्तविक समय की निगरानी, मजदूरों की लोकेशन ट्रैकिंग, बेहतर वेंटिलेशन और ऑक्सीजन मॉनिटरिंग, प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम तथा नियमित आपदा अभ्यास को सिर्फ औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्य सुरक्षा व्यवस्था बनाना होगा.

चमोली की यह घटना इसलिए एक चेतावनी की तरह देखी जानी चाहिए. पहाड़ में विकास की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन विकास की सफलता का पैमाना केवल बिजली उत्पादन, सड़क की लंबाई या सुरंग पूरी होने की तारीख नहीं हो सकता. असली सवाल यह भी है कि उस विकास को पूरा करने वाले मजदूर कितने सुरक्षित हैं और आपदा आने पर सिस्टम उन्हें बचाने के लिए कितना तैयार है.

अतुल चौहान को पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 35 वर्षों का अनुभव है. एबीपी न्यूज़ के साथ 17 सालों से जुड़े हैं और उत्तराखंड की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इससे पहले एएनआई समेत अन्य बड़े संस्थानों से जुड़े रहे हैं.   वे कुमाऊं रीजन, उत्तराखंड के ब्यूरो चीफ रहे और क्षेत्रीय पत्रकारिता को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतुल चौहान ने तीन दशक से अधिक के पत्रकारिता जीवन में राजनीति, प्रशासन, आपदा, विकास, सामाजिक सरोकार, चुनाव, अपराध और जनहित के अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की है. मेल आईडी- atul.media@gmail.com

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