सियासी गर्मी के बीच चाय की चुस्की, 70 के दशक से यहीं तय हो रही है चुनावी रणनीति
चाय के कई ठीहे तो ऐसे भी हैं जो अपनी राजनीतिक चर्चा के लिए मशहूर हैं। चाय की एक ऐसी दुकान देहरादून में भी है जो सत्तर के दशक से सियासी गतिविधियों की गवाह रही है।

देहरादून, एबीपी गंगा: 2014 के लोकसभा चुनाव में चाय चर्चा के केंद्र में थी। चाय पर चर्चा ने चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाई और बीजेपी को सत्ता के सीर्ष तक पहुंचा दिया। देश के कोने-कोने में चाय के बाहने सियासी चर्चा आम है। चाय के कई ठीहे तो ऐसे भी हैं जो अपनी राजनीतिक चर्चा के लिए मशहूर हैं। चाय की एक ऐसी दुकान देहरादून में भी है जो सत्तर के दशक से सियासी गतिविधियों की गवाह रही है। इसी दुकान पर प्रचार की रणनीति तय करने से लेकर हार-जीत के समीकरण तक तय हो जाते हैं। 'डिलाइट कैफे' के नाम से चलने वाली चाय की यह दुकान आज भी अपनी गौरवशाली परंपरा का निर्वाह बखूबी कर रही है।
चाय की चुस्कियों के बीच चुनाव की चर्चा
चुनाव पर चर्चा का आनंद तो चाय की चुस्कियों के बीच ही आता है। पता ही नहीं चलता, कब घंटों गुजर गए। आज से दो-ढाई दशक पहले तो चुनाव के दौरान चाय पर चर्चा इलेक्शन कैंपेनिग का अनिवार्य हिस्सा मानी जाती थी। यही वजह है कि आज भी लोगों के जेहन में दून के 'डिलाइट कैफे' की स्मृतियां ताजा हैं।
कई अहम पलों का गवाह
अस्सी के दशक में डिलाइट कैफे ने इस परंपरा को सहेजने का बखूबी काम किया। परेड मैदान में हुई पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व चंद्रशेखर की जनसभाएं हों या फिर कांग्रेस नेता ब्रह्मदत्त की, ये कैफे उन सभी का गवाह रहा है। सुखद यह कि आज भी यह कैफे अपनी परंपराओं का पूरी शिद्दत से निर्वाह कर रहा है।
विरोध के बीच कभी मनमुटाव नजर नहीं आया
अस्सी के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जनसभा को याद करते हुए कैफे संचालक सुनील कहते हैं कि तब वह बहुत छोटे थे। उनके पिता किशन पांडे कैफे का संचालन किया करते थे। इंदिरा गांधी की जनसभा में शिरकत करने वाले कई लोग दुकान पर चाय पीने आए थे। अच्छे से याद है कि चुनाव के दिनों में कैफे के बाहर लोगों का जमावड़ा लगा रहता था। हाथों में चाय की प्याली लिए लोग चुनावी गुणा-भाग किया करते थे। खास बात यह थी कि उनमें पक्ष के भी होते थे और विपक्ष के भी। सभी शालीनता से अपनी बात रखते थे। सबके अपने-अपने तर्क हुआ करते थे, मगर मनमुटाव कभी नजर नहीं आया।
आज भी होती है चर्चा
आज भी डिलाइट कैफे में चाय की चुस्की लेने के लिए हर दल के सदस्य आते हैं। यहां चर्चा का विषय सिर्फ राजनीति होता है। सभी पक्ष-विपक्ष में बेबाकी से अपनी राय रखते हैं और एक-दूसरे की बात को गंभीरता से भी सुनते हैं। इस दौरान न कोई विवाद होता है और न कोई अभद्रता का परिचय देता है।
उत्तराखंड आंदोलन से भी रहा खास नाता
डिलाइट कैफे का उत्तराखंड आंदोलन से भी खास नाता रहा है। उत्तराखंड आंदोलन के सर्वोपरि नेता भी यहां आकर रणनीति बनाया करते थे। यहीं बैठकर वे स्थानीय लोगों को एकजुट करने और उत्तराखंड आंदोलन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित कराते थे।
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL

























