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BSP in Uttarakhand: उत्तराखंड में बीएसपी का गिरा जनाधार, बीजेपी-कांग्रेस अब नहीं मान रहे चुनौती

Uttarakhand Election 2022: उत्तराखंड में बीएसपी 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद लगातार कमजोर होती गई. वहीं, पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ने का दावा कर रही है.

BSP in Uttarakhand: उत्तराखंड में कभी किंग मेकर की भूमिका में रही बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) को उत्तराखंड (Uttarakhand) में इन दिनों अपनी सियासी जमीन तलाशने की जरूरत पड़ गई. वजह जो भी हो, लेकिन राज्य गठन से लेकर अब तक बसपा अपना जनाधार उत्तराखंड में खोती चली गई. अब चुनाव करीब है तो, बसपा (BSP) भी चुनावी तैयारियों को धार दे रही है. उत्तराखंड में इस वक्त बसपा की स्थिति ऐसी है कि, उनका संगठन तक नहीं खड़ा है और बसपा नेता सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं. उत्तराखंड में पहले चुनाव से लेकर अब तक राज्य में बसपा की क्या स्थिति रही है, पढ़ें, एबीपी गंगा की खास रिपोर्ट.

2002 और 2007 में बीएसपी का शानदार प्रदर्शन

राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में पहला चुनाव 2002 में हुआ. इस दौरान भाजपा, कांग्रेस और बसपा में त्रिकोणीय मुकाबला हुआ. कांग्रेस 36 सीटों के साथ सरकार में आई तो भारतीय जनता पार्टी ने 19 सीटों पर जीत दर्ज कराई, तो वहीं बहुजन समाज पार्टी 7 सीट जीत कर तीसरे नंबर पर रही. 2002 में बसपा का मत प्रतिशत 10.93% रहा,  2002 के विधानसभा चुनावों में बसपा मत प्रतिशत उत्तराखंड में तीसरे नंबर की पार्टी के तौर पर था. 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने और भी बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई. इस चुनावों में बसपा के 8 विधयाक जीते और मत प्रतिशत बढ़कर 11.76 प्रतिशत हुआ. हरिद्वार और उधम सिंह नगर की अधिकांश सीटों पर बसपा का दबदबा था. इस दौरान पहाड़ पर भी कई सीटें ऐसी थीं, जिन पर बसपा की हार का आंकड़ा 2000 से कम रहा. लेकिन वक्त के साथ-साथ बसपा का वोट बैंक भी गिरता गया और विधायकों की संख्या भी घटती गई. 

2012 में बनी थी किंग मेकर

2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा 3 विधायकों पर सिमट गई. हालांकि, मत प्रतिशत बढ़कर 12.99 फीसदी पर पहुंच गया. बसपा के 2012 के चुनाव भले तीन ही विधायक थे, लेकिन इस बार बसपा ने किंग मेकर की भूमिका निभाई और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार में शामिल हुई. भगवानपुर से विधायक सुरेंद्र राकेश बसपा कोटे के कैबिनेट मंत्री भी बने, लेकिन 2017 के चुनाव में बसपा का उत्तराखंड से सूपड़ा साफ हो गया. इस बार बसपा का एक भी विधायक जीतकर विधानसभा तक नहीं पहुंच पाया. 2022 के चुनाव में भी बसपा दमखम के साथ चुनाव लड़ने का दावा कर रही है.

2002 में बसपा विधयाक.
इकबालपुर--चौधरी यशवीर सिंह।
मंगलौर --काजी निजामुद्दीन।
लंढोरा - हरिदास।
बहादराबाद-- मोहम्मद शहजाद ।
लालढांग  तस्लीम अहमद।
पंतनगर गदरपुर --प्रेम चंद महाजन
सितारगंज नारायण पार्क

2007 में बसपा विधयाक--
इकबालपुर--चौधरी यशवीर सिंह।
मंगलौर --काजी निजामुद्दीन।
लंढोरा - हरिदास।
बहादराबाद-- मोहम्मद शहजाद ।
लालढांग  तस्लीम अहमद।
पंतनगर गदरपुर --प्रेम चंद महाजन
सितारगंज नारायण पार्क
भगवनपुर--सुरेंद्र राकेश 

2012 के विधानसभा चुनाव में --
भगवानपुर-सुरेंद्र राकेशपिछले झबरेड़ा -हरिदास 
मंगलोर -सरवत करीम अंसारी 

बीएसपी को चुनौती नहीं मान रहे हैं बीएसपी-कांग्रेस 

2008 के परिसीमन के बाद 2012 में तीसरे विधानसभा चुनाव में बसपा की राजनीतिक ताकत काफी घटी. हालांकि, इस चुनाव में हरिद्वार और उधमसिंह नगर जिलों में बसपा को मिले वोटों का प्रतिशत 21.83 रहा. 2012 के बाद गिरे बसपा के जनादेश से शायद अब भाजपा और कॉग्रेस के कोई डर नहीं है, तभी दोनों पार्टियां बसपा को 2022 के लिए कोई कड़ी चुनौती नहीं मान रहे हैं. भाजपा का कहना है कि, बसपा का अब अब उत्तराखंड मे कोई जनाधार नहीं है, तो वहीं कांग्रेस भी यही मानकर चल रही है कि, पिछले साढ़े चार साल से बसपा नेता सोये थे और अब चुनाव करीब है तो राज्य की याद आने लगी. 

उत्तराखंड में 2022 के चुनावों में मुख्य मुकाबला भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच होगा. लेकिन बसपा भी अपनी सियासी जमीन को फिर मजबूत करने का दावा कर रही है. हालांकि बसपा का ना तो संगठन है और ना ही कार्यकर्ता हैं, ऐसे में जो जनाधार बसपा ने 2012 के बाद उत्तराखंड में खोया है उसे वापस लाना एक बड़ी चुनौती होगा.

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