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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डी-कोड, जानें- किस बात को लेकर परेशान हैं दुनियाभर के वैज्ञानिक

गूगल और एल्फाबेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई ने अपने एक सम्बोधन कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर सावधानी बरतना बेहद ज़रूरी है.

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का अर्थ है मशीनों को इंसानो की तरह सोचने, इंसानो की तरह समझ कर ही काम करने और इंसानो की तरह फैसले लेने की क्षमता रखने वाली मशीन. सरल भाषा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-मनुष्यों के जरिए बनाई गई एक ऐसी है जो इंसानो की तरह काम करने की क्षमता रखती हो. इसे ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहते हैं. मौजूदा समय में सिरी और अलेक्सा जैसे वॉएस असिस्टेंट, टेस्ला जैसी कारों की सेल्फ ड्राइविंग तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एक रूप हैं.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डी-कोड, जानें- किस बात को लेकर परेशान हैं दुनियाभर के वैज्ञानिक

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस करता है आप की जासूसी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक को लेकर पूरे विश्व में चिंता जताई जा रही है. कई देशो में तो इस तकनिकी पर रोक लगाने के अलग-अलग उपाय भी खोजे जा रहे हैं. कई देश ऐसे भी हैं जो इस तकनीक को विकसित कर जासूसी भी कर रहे हैं. जासूसी की इस दौड़ में चीन सबसे आगे है, यही वजह है कि भारत समेत कई देशों ने चीन के कई मोबाइल एप्स को अपने देशों में बैन कर दिया है. भारत ने चीन के जितने भी मोबाइल एप्स को बैन किया है ये सभी एप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तरह ही काम करते थे. जो भी यूजर इन एप्स को अपने मोबाइल में डाउनलोड करता था ये एप्स उस यूजर की जासूसी करना शुरू कर देते थे इसलिए भारत ने चीन के ऐसे सैकड़ों एप्स पर रोक लगा दी है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर तकनिकी जगत के महारथियों के विचार

गूगल और एल्फाबेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई ने अपने एक सम्बोधन कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर सावधानी बरतना बेहद ज़रूरी है. सुंदर पिचाई ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ख़तरों को लेकर पूरी दुनिया को आगाह किया है. ये कोई पहली बार नहीं जब सुंदर पिचाई ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरे को लेकर चेतावनी दी है. उन्होंने साल 2018 में भी कंपनी के कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा था, "दुनिया पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जितना असर होगा, उतना शायद ही किसी और आविष्कार का होगा. ये कहते हुए उन्होंने आगे की कड़ी में ये कहा कि "इंसान आज जिन चीज़ों पर काम कर रहा है, उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है, उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में आग और बिजली जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लेकिन आग और बिजली इंसानों को मार भी सकती है. हमने आग और बिजली पर क़ाबू करना सीखा है पर इसके ख़तरों से भी हम जूझ रहे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करने वालों को ये समझना होगा कि ये भी ऐसी ही एक तकनीक है, जिस पर पूरी ज़िम्मेदारी से काम करना होगा.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डी-कोड, जानें- किस बात को लेकर परेशान हैं दुनियाभर के वैज्ञानिक

इलोन मस्क-टेस्ला और स्पेसएक्स के मालिक

साल 2017 में टेस्ला और स्पेसएक्स के मालिक इलोन मस्क ने ट्वीट कर कहा था, "अगर आप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चिंतित नहीं हैं तो आपको चिंतित होना चाहिए. ये उत्तर कोरिया से अधिक खतरनाक है."सोशल मीडिया पर इलोन मस्क ने जो तस्वीर ट्वीट की थी, उसमें लिखा था, "आखिर में जीत मशीनों की होगी" मस्क ने नेताओं से अपील की थी कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को काबू में लाने के लिए नियम और कानून बनाए जाएं.

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स्टीफन हॉकिंग- भौतिक वैज्ञानिक

दुनिया को ब्लैक होल और बिग बैंग सिद्धांत समझाने वाले जाने माने भौतिक वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने 2017 में कहा था कि "मैं मानता हूं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को मानवता की बेहतरी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इंसान को इस पर काबू करने का कोई न कोई रास्ता तलाशना पड़ेगा." उन्होंने ताकतवर मशीनों बनने की बात कहते हुए इनके अधिक ताकतवर बनने को लेकर आगाह किया था. उन्होंने कहा था कि, "अगर हम इसके खतरों के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाए तो इसके कारण मानव सभ्यता को सबसे बड़ा नुकसान पहुंच सकता है."

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ओरेन एत्ज़ोनी-ऐलन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

ऐलन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ओरेन एत्ज़ोनी ने 2017 में कहा था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भले ही काम का हो इस पर कुछ हद तक क़ाबू रखे जाने की बेहद ज़रूरत है.

इन देशों में होता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल

भारत

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इतेमाल अपराधियों की धर-पकड़ के लिए किया जाता है. कई बार भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अपराधी अपनी शक्ल बदलकर लोगों के साथ शामिल हो जाते हैं और आपराधिक घटनाओं का अंजाम देकर निकल जाते है. इस तरह की वारदात को रोकने के लिए भारतीय पुलिस त्रिनेत्र नाम के एक फेशियल रिकग्निशन एप का इस्तेमाल करती है जिससे किसी भी अपराधी की तस्वीर से मिलान करके पता लगाया जा सकता है कि उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है या नहीं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित त्रिनेत्र एप का इस्तेमाल सबसे पहले 22 दिसंबर 2019 को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में किया गया था. भारत सरकार और पुलिस बल के अला अधिकारीयों की मानें तो आधुनिक तकनिकी के इस दौर में त्रिनेत्र एक बहुत महतापूर्ण तकनीक है जिससे अपराधियों की पहचान बहुत आसान हो जाती है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डी-कोड, जानें- किस बात को लेकर परेशान हैं दुनियाभर के वैज्ञानिक

अभी इस तकनिकी का इस्तेमाल भारत कई राज्यों में किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी त्रिनेत्र का इस्तेमाल कर अपराधियों को पहचानना शुरू कर दिया है. उत्तर प्रदेश में अभी ये तकनिकी को पुलिस विभाग के बड़े अधिकारों को ही दी गई है.

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अमेरिका

अमेरिका में कानून व्यवस्था को लागू कराने वाली एसेंसियां कई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करती हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका की करीब 600 एजेंसियां इसका इस्तेमाल कर रही है. सुरक्षा एजेंसियों का कहना की "इंटरनेट पर लाखों वेबसाइट्स हैं, जिस पर नज़र रखने के लिए भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे ही जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी जैसे कई देशो में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर कानून बनाना जरूरी है

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब तलाशने के लिए जब हमने तकनीक और कानून के जानकारों से पूछा तो उन्होंने कुछ इस तरह से जवाब दिया- कहा कि त्रिनेत्र नाम का जो एप है वो फेशियल रिकग्निशन की तकनीक का आधार है. एक चेहरे को पहचानने के लिए लाखों चेहरों को या उनकी तस्वीरों को स्कैन करना वो फेसबुक पर हो या ट्वीटर पर हो या क्या किसी भी न्यूज वेबसाइट पर या फिर किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर. मतलब ये हुआ कि एक व्यक्ति की पहचान के लिए लाखों की निजता का हनन करना. तो फिर ऐसे में उन लाखों लोगों की निजता का क्या होगा जिनकी बिना इजाजत उनकी तस्वीरें या फिर उनके चेहरे की स्कैनिंग कंपनियां और सरकारें कर रही हैं. भारत में इसे लेकर फिलहाल कोई प्रत्यक्ष कानून नहीं है क्योंकि क़ानून और तकनीक के बीच में लगातार जद्दोज़हद चलती रहती है. जहां तकनीक छलांग लगाती हुई तेज़ गति से आगे बढ़ती है और क़ानून बनाने की अपनी गति होती है, वो अपनी मंद गति से चलता है. सवाल ये है कि अगर लोगों को इसके ख़तरों के बारे में नहीं पता या उसकी समझ नहीं और इन सभी ख़तरों के बारे में लोगों को बताया जाना अगर क़ानूनी बाध्यता नहीं है तो इसका फायदा कंपनियां उठा सकती हैं. जो कुछ हो रहा है इन सब पर नज़र रखते हुए कानून बनाने की बेहद ज़रूरत है. क्योंकि किसी देश के मोबाइल एप डाउनलोड करने के लिए वीज़ा या पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं होती है. अगर इस पर कोई मजबूत कानून नहीं बना तो कोई देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नाम पर जासूसी करते हुए आपके आसपास टहल रहा होगा और आपकी पल-पल की जासूसी कर रहा होगा. आप उसे पकड़ नहीं पाएंगे इसलिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर कानून बनना बहुत ज़रूरी है.

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क्या मशीन करेगी इंसानों पर राज

आपने हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक कई ऐसी फिल्मे देखीं होगी जिसमें ऐसा दिखाया गया होता है की वैज्ञानिकों के द्वारा बनाया गया रोबोट खुद ही खलनायक बन जाता है और इंसानो पर ही अटैक करना शुरू कर देता है. ये सभी फिल्में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एक नमूना हैं. आप सोचिये की जैसा फिल्मो में होता है कि रोबोट पागल हो जाता है और तबाही मचाना शुरू कर देता है. ऐसा अगर वासतव में होने लगे तो कितना भयावह होगा. इसेसे जुड़ी एक सच्चाई ये है की 2017 में फेसबुक ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तौर पर एक रोबोट तैयार किया और उसका परीक्षण भी किया. उसे जैसा कमांड देते थे वो वैसे ही काम करता था लेकिन कुछ देर बाद वो अपने आप कमांड देने लगा. लैब में लगे कई कम्प्यूटर्स को बंद कर दिया और अपनी एक अलग भाषा बना ली. उसे कंट्रोल करने के लिए कई वैज्ञानिक लगे लेकिन उसे कंट्रोल नहीं कर पर रहे थे. रोबोट ने अपनी अलग भाषा बना ली और वो उसे ही वो बोलने लगा था. अंत में वैज्ञानिकों को उस रोबोट को नष्ट करना पड़ा क्योंकि वो उनके कंट्रोल बाहर हो गया था. जिस वैज्ञानिक ने उस रोबोट को बनाया था उसने किल ऑन एक ऑप्शन भी रखा था. इसी स्विच के ज़रिये उस रोबोट के नष्ट किया जा सका. ये ही वजह है कि दुनिया भर के कई वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बार-बार चेतावनी दे रहे हैं.

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