Basti News: शादी के बाद बहू को नहीं नसीब हुआ शौचालय और आवास, छोड़ दिया ससुराल
Basti News In Hindi: बेहद गरीब और मुफलिसी में जीवन जी रहे रामफेर के परिवार की स्थिति इतनी दयनीय है कि उनकी बहू पिछले एक साल से अपने दो बच्चों के साथ मायके में शरण लिए हुए है.

उत्तर प्रदेश सरकार जहां अन्त्योदय यानी अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान का दम भर रही है, वहीं बस्ती के कुदरहा ब्लॉक की ग्राम पंचायत चकिया का भरवलिया उर्फ टिकुईया गांव सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता की कहानी बयां कर रहा है. यहां विकास की रोशनी गांव की सरहद पर ही दम तोड़ देती है. गांव के निवासी रामफेर का परिवार आज भी उस दौर में जीने को मजबूर है, जिसे समाज पीछे छोड़ चुका है.
अधिकारी आखिर एसी दफ्तरों से बाहर निकलेंगे तब न उनका सामना इस तरह की सच्चाई से होगा, एक परिवार पाषाण काल वाली व्यवस्था में जीने को मजबूर है, परिवार की बहु घर छोड़कर जा चुकी है क्यों कि उसके ससुराल में न तो टायलेट है और न पक्का मकान बना है.
एक साल से बहु नहीं आई घर
बेहद गरीब और मुफलिसी में जीवन जी रहे रामफेर के परिवार की स्थिति इतनी दयनीय है कि उनकी बहू पिछले एक साल से अपने दो बच्चों के साथ मायके में शरण लिए हुए है. रामफेर किसी तरह मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा है. रामफेर की बहू का साफ कहना है कि जिस घर में न सर छुपाने को पक्की छत हो, न बिजली हो और न ही इज्जत की सुरक्षा के लिए शौचालय, वहां बच्चों के साथ रहना नामुमकिन है.
शादी के 10 साल बीत जाने के बाद भी इस परिवार की चौखट तक कोई सरकारी योजना नहीं पहुंची. रामफेर का बेटा अब शादी शुदा होने के बाद भी बिन परिवार के गुजर बसर कर रहा.
कच्चा घर हादसे का डर
रामफेर की पत्नी मालती देवी ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि मिट्टी की जर्जर दीवारें और ऊपर फूस का छप्पर कभी भी बड़े हादसे को दावत दे सकता है. बारिश के मौसम में छप्पर से पानी टपकता है, जिससे बचने के लिए पन्नी का सहारा लिया जाता है. आंधी आने पर पूरा परिवार डर के साये में रहता है कि कहीं छत ही न उड़ जाए. रात के अंधेरे को दूर करने के लिए आज भी यह परिवार ढिबरी जलाने को विवश है.
अन्त्योदय कार्ड के बावजूद नहीं मिली राहत
आश्चर्य की बात यह है कि रामफेर के पास अति गरीबी रेखा से नीचे का अंत्योदय राशन कार्ड है. नियमों के मुताबिक ऐसे परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर सरकारी आवास मिलना चाहिए, लेकिन यहाँ हकीकत उलट है. रामफेर का आरोप है कि गांव में मनरेगा योजना सिर्फ कागजों तक सीमित है. उन्हें पिछले कई सालों से कोई काम नहीं मिला है, जिसके कारण सात सदस्यों का यह परिवार दाने-दाने को मोहताज होकर दिहाड़ी मजदूरी के लिए दर-दर भटकता है.
ब्लाक अधिकारियों पर उठ रहे सवाल
गांव के जागरूक नागरिकों का कहना है कि पात्र होते हुए भी इस परिवार को योजनाओं से वंचित रखना स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत की बड़ी लापरवाही है. क्या ब्लॉक के अधिकारियों को इस परिवार की बदहाली नजर नहीं आती, ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि इस मामले की जांच कराई जाए और पीड़ित परिवार को तत्काल प्रधानमंत्री आवास, बिजली कनेक्शन और शौचालय की सुविधा प्रदान की जाए.
अधिकारियों ने दिया कार्रवाई का भरोसा
परियोजना निदेशक राजेश जायसवाल से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि प्रकरण की जानकारी नहीं है, आप डिटेल दीजिए पता करने के बाद परिवार को हर संभव मदद कराई जाएगी, मगर उन्हें पहले इस परिवार की सच्चाई के बारे में जानकारी हासिल करना है, वे ब्लॉक के अधिकारियों को मौके पर भेजेंगे और परिवार के बारे में जानकारी मंगवाएंगे फिर यथोचित कार्यवाही की जाएगी.
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Source: IOCL

























