ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने पर शुभम की पत्नी ने दोहराई मांग, कहा- शहीद का दर्जा दें...
UP News: कानपुर के रहने वाले शुभम द्विवेदी की पिछले साल 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन इलाके में आतंकवादियों द्वारा पर्यटकों पर की गई गोलीबारी में मौत हो गई थी.

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में पिछले साल 22 अप्रैल को हुए आतंकवादी हमले में मारे गए कानपुर निवासी शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशान्या द्विवेदी ने उस घटना के जवाब में शुरू किए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' का एक साल पूरा होने पर गुरुवार (7 मई) को भारतीय सेना और सरकार की तारीफ की और इस हमले में मारे गए सभी लोगों को शहीद का दर्जा देने की मांग दोहराई.
शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशान्या ने ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने पर कहा, 'यह सफर बेहद मुश्किल रहा है. मुझे लगता है कि आतंकवाद से प्रभावित हर परिवार का दर्द और उनकी यादें आज फिर से ताजा हो गई होंगी.' पहलगाम आतंकवादी हमले में मारे गए सभी 26 लोगों के लिए राष्ट्रीय सम्मान की अपनी मांग दोहराते हुए ऐशान्या ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने शोक संतप्त परिवारों को यह एहसास दिलाया कि देश दुख की घड़ी में उनके साथ मजबूती से खड़ा है.
उन्होंने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, 'ऐसा बदला पहले कभी नहीं लिया गया था. आतंकवादी हमले पहले भी हुए हैं लेकिन यह पहली बार था जब सरकार और सेना ने इतनी मजबूती से जवाब दिया. हमारे जैसे परिवारों के लिए यह न्याय की तरह है.'
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कानपुर के रहने वाले शुभम द्विवेदी (31) उन 26 लोगों में शामिल थे जिनकी पिछले साल 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन इलाके में आतंकवादियों द्वारा पर्यटकों पर की गई गोलीबारी में मौत हो गई थी. ऐशान्या ने कहा कि सेना द्वारा चलाए गए अभियान का नाम ऑपरेशन सिंदूर रखा जाना उन महिलाओं के लिए काफी भावनात्मक महत्व रखता है जिनका पहलगाम हमले में सुहाग उजाड़ दिया गया था. उन्होंने पहलगाम आतंकवादी हमले में मारे गए सभी लोगों को 'शहीद' का दर्जा देने की अपनी मांग दोहराते हुए यह भी साफ किया कि वह सैन्य सम्मान के बजाय राष्ट्रीय पहचान की मांग कर रही हैं.
ऐशान्या ने कहा, 'जब मैं शहीद कहती हूं तो मेरा मतलब सेना के संदर्भ में नहीं होता. मेरा मतलब उन निर्दोष नागरिकों के लिए राष्ट्रीय सम्मान से है जिन्हें उनके धर्म के आधार पर पहचान कर निशाना बनाया गया.' उन्होंने कहा, 'कोई भी व्यक्ति अपना धर्म चुनकर पैदा नहीं होता, फिर भी पहलगाम में लोगों को उनका नाम पूछ कर निशाना बनाया गया. उस मुश्किल घड़ी में भी, लोगों ने गर्व से खुद को हिंदू बताया और गोलियों का सामना किया. उनका बलिदान राष्ट्रीय सम्मान का पात्र है.'
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