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सिरोही: खनन परियोजना के विरोध में 4 महीने से जनसंघर्ष जारी, 28 जनवरी से महाआंदोलन का ऐलान

Sirohi Mining Project: पिछले करीब चार महीनों से लगातार चल रहे विरोध के बाद क्षेत्रवासियों ने 28 जनवरी से अनिश्चितकालीन महाआंदोलन का ऐलान कर दिया है. ग्रामीणों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

सिरोही जिले की चार ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आने वाले करीब एक दर्जन गांवों में मेसर्स कमलेश मेटाकास्ट प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित खनन परियोजना के खिलाफ जनआंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. पिछले करीब चार महीनों से लगातार चल रहे विरोध के बाद क्षेत्र वासियों ने 28 जनवरी से अनिश्चितकालीन महाआंदोलन का ऐलान कर दिया है. आंदोलन को लेकर गांव-गांव बैठकों, जनसंपर्क और रणनीति निर्माण का दौर तेज हो गया है. 

क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि यह परियोजना न केवल पर्यावरण के लिए घातक है, बल्कि खेती, जल स्रोतों, चारागाह और ग्रामीण जीवन की पूरी संरचना को तबाह कर देगी. इसके बावजूद सरकार और प्रशासन की चुप्पी ने लोगों में गहरा रोष पैदा कर दिया है. 

चार महीने से जारी जनसंघर्ष

खनन परियोजना के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत भीमाना गांव से हुई, जहां हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर धरना दिया. इसके बाद पिंडवाड़ा उपखंड कार्यालय का घेराव किया गया, जिसमें ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ हजारों ग्रामीण पहुंचे. इस दौरान खनन परियोजना के खिलाफ नारेबाजी हुई और परियोजना को निरस्त करने की मांग की गई.

इसके बाद से ही क्षेत्र के विभिन्न गांवों में लगातार धरने, जनसभाएं और विरोध प्रदर्शन जारी हैं. आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल किसी एक गांव का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा सवाल है.

जनता को बिना जानकारी दिए आगे बढ़ाई गई परियोजना

क्षेत्र वासियों का आरोप है कि इस पूरी खनन परियोजना को जनता को अंधेरे में रखकर आगे बढ़ाया गया. ग्रामीणों को इस परियोजना की जानकारी तब लगी जब 19 सितंबर 2025 को भीमाना ग्राम पंचायत में पर्यावरण स्वीकृति के लिए जनसुनवाई आयोजित की गई.

इससे पहले न तो ग्राम सभाओं में कोई चर्चा हुई और न ही ग्रामीणों से सहमति ली गई. लोगों का कहना है कि प्रशासन और कंपनी की मिलीभगत से यह प्रक्रिया चुपचाप आगे बढ़ाई गई है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है.

800 हेक्टेयर से अधिक भूमि खनन के लिए प्रस्तावित

प्रस्तावित खनन क्षेत्र का कुल रकबा 800.99 हेक्टेयर बताया गया है, जिसमें से अधिकांश भूमि निजी खातेदारी की है. यह भूमि वर्षों से खेती, पशुपालन और आजीविका का मुख्य आधार रही है. ग्रामीणों का कहना है कि इस भूमि में अधिकांश हिस्से सिंचित और उपजाऊ हैं, लेकिन कंपनी के प्रस्ताव में इन्हें असिंचित दिखाया गया है.

भूमि का समग्र विवरण

  • निजी खातेदारी भूमि: 551.9535 हेक्टेयर
  • सरकारी भूमि: 227.95 हेक्टेयर
  • चरागाह भूमि: 21.09 हेक्टेयर

  • भारजा गांव
    सरकारी भूमि – 52.1658 हेक्टेयर
    निजी खातेदारी – 213.134 हेक्टेयर
    कुल – 265.2998 हेक्टेयर

  • डोली फली
    सरकारी भूमि – 1.5555 हेक्टेयर
    निजी खातेदारी – 27.6502 हेक्टेयर
    कुल – 29.2057 हेक्टेयर

  • खारा डोली
    चरागाह – 1.4903 हेक्टेयर
    सरकारी – 12.0128 हेक्टेयर
    निजी – 2.6093 हेक्टेयर

  • रोहिड़ा क्षेत्र
    सरकारी – 59.0101 हेक्टेयर
    निजी – 124.9038 हेक्टेयर
    कुल – 183.9139 हेक्टेयर

  • तरुंगी
    चरागाह – 14.3394 हेक्टेयर
    सरकारी – 69.261 हेक्टेयर
    निजी – 82.1257 हेक्टेयर

  • वाटेरा
    चरागाह – 5.2603 हेक्टेयर
    सरकारी – 32.3331 हेक्टेयर
    निजी – 93.6264 हेक्टेयर

जनसुनवाई में नहीं मिला समर्थन

19 सितंबर 2025 को आयोजित पर्यावरण जनसुनवाई के दौरान कंपनी के पक्ष में एक भी सहमति पत्र मौके पर प्रस्तुत नहीं हुआ. इसके विपरीत, करीब 100 से अधिक लिखित आपत्तियां ग्रामीणों द्वारा दर्ज कराई गई थीं. हालांकि जब सूचना के अधिकार के तहत दस्तावेज मंगवाए गए, तो कंपनी के पक्ष में कई सहमति और सुझाव पत्र सामने आए. 

ग्रामीणों का आरोप है कि इन पत्रों पर कथित रूप से फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं. इस संबंध में संबंधित हस्ताक्षरकर्ताओं की ओर से रोहिड़ा और स्वरूपगंज पुलिस थाने में लिखित शिकायत भी दी गई, लेकिन अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है.

क्षेत्र वासियों का कहना है कि पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं. फर्जी दस्तावेजों पर कार्रवाई नहीं होना और आंदोलनरत जनता को परेशान किया जाना लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के रूप में देखा जा रहा है. लोगों का आरोप है कि कंपनी को संरक्षण दिया जा रहा है, जबकि आम जनता की आवाज को दबाने का प्रयास हो रहा है.

28 जनवरी से पहले गांव-गांव निकलेगी वाहन रैली

महाआंदोलन से पहले जनसमर्थन जुटाने के लिए क्षेत्र में व्यापक वाहन रैली निकाली जाएगी. यह रैली सिरोही जिले के गांव-ढाणियों तक पहुंचेगी. रैली के माध्यम से लोगों को बताया जाएगा कि खनन परियोजना किस तरह से जल स्रोतों को नष्ट, खेती को प्रभावित और जंगलों को उजाड़ सकती है. आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है.

जनप्रतिनिधियों के वादे अधूरे

अजारी में हुए घेराव के दौरान भाजपा के विधायक और सांसद ने परियोजना की जांच का आश्वासन दिया था. लेकिन चार महीने बीतने के बावजूद अब तक कोई जांच शुरू नहीं हुई. ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने कंपनी के पक्ष में दस्तावेज तैयार किए. तत्कालीन पिंडवाड़ा एसडीएम, वन विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं.

आंदोलन से घबराई सरकार 

28 जनवरी के आंदोलन की घोषणा के बाद सरकार और प्रशासन की गतिविधियां तेज हो गई हैं. आरोप है कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है. वाटेरा गांव में 37 परिवारों को भू-राजस्व अधिनियम 1956 के तहत अतिक्रमण नोटिस जारी किए गए. जबकि ये मकान दशकों पुराने, पट्टासुदा और रजिस्ट्रीशुदा हैं. घरों में बिजली-पानी कनेक्शन और सीसी सड़कें भी बनी हुई हैं.

ग्रामीणों का सवाल है कि यदि यह अतिक्रमण था, तो 40 वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जनसुनवाई के दौरान कंपनी प्रतिनिधियों ने किसी भी सीमेंट प्लांट योजना से इनकार किया था. लेकिन दस्तावेजों में तत्कालीन एडीएम द्वारा सीमेंट प्लांट के लिए भूमि उपलब्ध कराने के निर्देश सामने आए हैं. आरोप है कि जनसुनवाई के बाद पीछे के दरवाजे से सहमति पत्र जोड़े गए, जिनका फॉर्मेट एक जैसा है और जिन पर उसी दिन की तारीख दर्ज है.

500 करोड़ मुंह बंद करने के आए

वाटेरा में में भाजपा संगठन के जिला मंत्री पद पर कार्यरत पवन राठौड़ द्वारा भरी सभा में 'मुंह बंद करवाने के लिए 500 करोड़ रुपये दिए जाने' का गंभीर आरोप लगाया गया. इतने बड़े आरोप के बावजूद अब तक पार्टी संगठन और प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. न ही कोई कार्रवाई हुई, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो सका कि पवन राठौड़ का बयान कितना तथ्यात्मक था.

जनता को अंधेरे में रखकर आगे बढ़ी योजना

क्षेत्र वासियों का आरोप है कि जब जनता इस परियोजना के पक्ष में नहीं है, तब सरकार इसे जबरन थोपने का प्रयास कर रही है. लोगों का कहना है कि इस पूरे मामले में राजनीतिक संरक्षण और प्रभावशाली लोगों की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है. सरकारी मशीनरी का उपयोग कर जनता को डराया और परेशान किया जा रहा है, जिससे आंदोलन को कमजोर किया जा सके.

किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने देंगे परियोजना

आंदोलनकारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि यह लड़ाई आखिरी दम तक लड़ी जाएगी. क्षेत्र की जनता पूरी तरह एकजुट है और किसी भी हाल में इस खनन परियोजना को स्वीकृति नहीं मिलने दी जाएगी. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जनभावनाओं की अनदेखी जारी रखी, तो यह आंदोलन और व्यापक तथा उग्र रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी.

पूर्व में दी थीं यह चेतावनी

18 दिसंबर को स्वरूपगंज में राष्ट्रीय पशुपालक संघ द्वारा परियोजना निरस्तीकरण की मांग को लेकर रैली एवं आंदोलन किया गया. राष्ट्रीय अध्यक्ष लालजी राईका ने चेतावनी दी कि यदि परियोजना निरस्त नहीं हुई तो 28 जनवरी को महाआंदोलन किया जाएगा.

आंदोलन के बाद राजनीतिक दबाव बढ़ा और कई जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को परियोजना निरस्त करने हेतु पत्र लिखे. क्षेत्र के सभी समाजों ने बैठकों के माध्यम से आंदोलन को समर्थन दिया. प्रेस कांफ्रेंस में लालजी राईका ने आंदोलन की रणनीति साझा की. आम जनता द्वारा गेहूं, चावल, गुड़ व धन का सहयोग शुरू हो चुका है. ग्रामीणों ने संकल्प लिया है कि परियोजना निरस्त करवा कर ही दम लेंगे.

Input By : Tushar Purohit
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