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सिरोही: सरकारी जमीन पर कैसे चलता रहा क्लब? रजिस्ट्रेशन और एक्साइज परमिशन पर उठे सवाल

Rajasthan News In Hindi: सिरोही के सरूप विला क्लब की भूमि, निर्माण, पंजीयन और आबकारी अनुमति को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं. बताया जा रहा है कि मामला गैर-बिलानाम सरकारी भूमि से जुड़ा है.

राजस्थान के सिरोही के सरूप विला क्लब को लेकर विवाद अब जमीन और क्लब संचालन की वैधानिकता तक पहुंच गया है. क्लब की ओर से 11 अगस्त 2026 को जारी सूचना के बाद अब क्लब की भूमि, निर्माण, पंजीयन और आबकारी अनुमति को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं. मामला खसरा नंबर 416 की गैर-बिलानाम सरकारी भूमि से जुड़ा बताया जाने का आरोप है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि भूमि पर वैध अधिकार और क्लब संचालन के लिए जरूरी कानूनी अनुमतियां मौजूद नहीं थीं, तो वर्षों तक क्लब की गतिविधियां किस आधार पर संचालित होती रहीं?

शराब पार्टी और जुए के मामले के बाद बढ़ा विवाद

सरूप विला क्लब में शराब पार्टी और जुए-सट्टे से जुड़े मामले के सामने आने के बाद क्लब की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल और गहरे हो गए हैं. अब मांग उठ रही है कि प्रशासन केवल हालिया घटनाओं तक सीमित न रहते हुए क्लब की स्थापना से लेकर अब तक के पूरे रिकॉर्ड की जांच करे. जांच के दायरे में भूमि का स्वामित्व, पट्टा आवंटन, भवन निर्माण की अनुमति, क्लब का पंजीयन, आबकारी विभाग की अनुमति और क्लब की आर्थिक गतिविधियां शामिल किए जाने की मांग की जा रही है.

बताया जा रहा है कि क्लब खसरा नंबर 416 की गैर-बिलानाम सरकारी भूमि से संबंधित है. ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि क्लब भवन के निर्माण के लिए किस स्तर पर अनुमति दी गई और भूमि के उपयोग का वैधानिक आधार क्या था. स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि यदि भूमि सरकारी थी, तो उस पर किसी निजी संस्था या क्लब की गतिविधियों के संचालन के लिए क्या कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई?

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क्लब के पंजीयन और आबकारी अनुमति पर भी उठे सवाल

मामला केवल भूमि तक सीमित नहीं है. क्लब के वैध पंजीयन और क्लब-बार संचालन के लिए आवश्यक आबकारी अनुमति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. यदि क्लब के पास वैध पंजीयन या आवश्यक आबकारी अनुमति नहीं थी, तो सदस्यता शुल्क, क्लब की आर्थिक गतिविधियां और अन्य संचालन किस कानूनी व्यवस्था के तहत किए जा रहे थे—इसकी भी जांच की मांग की गई है.

स्थानीय वरिष्ठ नागरिक संजय वर्मा का कहना है कि 11 अगस्त की क्लब सूचना के बाद भूमि के पट्टे, क्लब पंजीयन और आबकारी अनुमति से जुड़े सवाल गंभीर हो गए हैं. उनका कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जांच में यदि कोई अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए.

वहीं अधिवक्ता मुकेश रावल ने जिला कलेक्टर से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है. उनका कहना है कि किसी सरकारी भूमि पर निर्माण या संस्था का संचालन केवल इस आधार पर वैध नहीं माना जा सकता कि वह लंबे समय से संचालित होता रहा है. उनके अनुसार राजस्व रिकॉर्ड, भूमि स्वामित्व, निर्माण अनुमति, क्लब पंजीयन, आबकारी अनुमति और वित्तीय गतिविधियों की जांच जरूरी है.

कलेक्टर ने 24 अगस्त को चुनाव कराने की कही बात

मामले में जिला कलेक्टर रोहिताश्व सिंह तोमर ने 24 अगस्त को चुनाव कराकर क्लब के पंजीयन, पट्टा आवंटन प्रक्रिया और खेलकूद की गतिविधियों को बढ़ाकर क्लब को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने की बात कही है. अब प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं. सवाल यह है कि क्लब के मौजूदा संचालन और उसके पुराने रिकॉर्ड की भी व्यापक जांच होगी या नहीं.

प्रशासन के सामने चार बड़े सवाल-

  • पहला: खसरा नंबर 416 की भूमि पर क्लब भवन का निर्माण किस अनुमति से हुआ?
  • दूसरा: क्लब का वैध पंजीयन था या नहीं और यदि नहीं था तो इतने वर्षों तक क्लब का संचालन किस आधार पर हुआ?
  • तीसरा: क्लब-बार संचालन के लिए आबकारी विभाग की आवश्यक अनुमति मौजूद थी या नहीं?
  • चौथा: सदस्यता शुल्क और क्लब की अन्य आर्थिक गतिविधियों का लेखा-जोखा किस वैधानिक व्यवस्था के तहत संचालित किया गया?

फिलहाल सरूप क्लब का मामला कई स्तरों पर जांच की मांग कर रहा है. जरूरत है कि प्रशासन भूमि से लेकर निर्माण, पंजीयन, आबकारी अनुमति और वित्तीय लेन-देन तक पूरे मामले की तथ्यात्मक और निष्पक्ष जांच करे. जांच में जो भी जिम्मेदार पाया जाए, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए. क्योंकि मूल सवाल यही है कि अगर सरकारी भूमि पर वैध अधिकार, पंजीयन और आवश्यक अनुमतियां नहीं थीं, तो सरूप क्लब का संचालन आखिर इतने वर्षों तक किस आधार पर होता रहा?

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