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5 महीने में 3 बार दी सरकार को चेतावनी, अब थाने पर किया हमला; खालिस्तान समर्थक अमृतपाल के पीछे कौन है?

5 महीने पहले ही अमृतपाल ने वारिस पंजाब दे की कमान संभाली थी. अमृतपाल उसके बाद से ही सुर्खियों में हैं. सरकार को चेतावनी देने की वजह से सिख युवाओं के बीच खूब लोकप्रिय भी है.

तारीख 29 सितंबर 2022. जगह- पंजाब का मोगा शहर. दुबई से लौटे अमृतपाल सिंह को 'वारिस पंजाब दे' का प्रमुख बनाया जाता है. वारिस पंजाब दे की कमान मिलते ही हजारों की भीड़ के सामने अमृतपाल अलग खालिस्तान की मांग को लेकर हुंकार भरते हैं. 

अमृतपाल रैली में कहते हैं- मेरे खून का एक-एक कतरा सिख समुदाय की स्वतंत्रता के लिए समर्पित है. जरनैल सिंह भिंडरावाले मेरे प्रेरणास्रोत हैं और उनके सपने के लिए कुर्बानी भी हम देंगे. हम अभी गुलाम हैं और जब तक खालिस्तान नहीं ले लेते हैं, तब तक हमें आजादी नहीं मिलेगी.

भिंडरावाले की तरह हम तो नहीं कर पाएंगे, लेकिन खालिस्तान की मांग को खत्म नहीं होंगे. अमृतपाल सिंह के इस भाषण के दौरान राज करेगा खालसा का नारा खूब गूंजा था. 

इस रैली के ठीक 5 महीने बाद 23 फरवरी को पंजाब के अमृतसर के अजनाला में अमृतपाल के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने थाना पर धावा बोल दिया. अमृतपाल अपने करीबी के गिरफ्तार होने से नाराज था और पुलिस को पहले ही चेतावनी दे चुका था. 

अमृतपाल समर्थकों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई. समर्थक थाने के भीतर हथियार लेकर घुस गए. अंत में पुलिस ने अमृतपाल समूह के सामने सरेंडर कर दिया. पुलिस ने गिरफ्तार उनके करीबियों को भी छोड़ दिया.

5 महीने में सरकार को 3 बार चेतावनी
29 सितंबर 2022- दिल्ली की हुकूमत पंजाब में सिखों को पिछाड़ने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और हिमाचल के लोगों को आगे कर रही है. सरकार अपने इस इरादे में सफल नहीं हो पाएगी. पंजाब आजाद होकर रहेगा.

30 अक्टूबर 2022- अमृतसर में गुरुद्वारा में मत्था टेकने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए अमृतपाल ने कहा कि मैं हर उस इंसान के साथ हूं, जो खालिस्तान का समर्थन करता है. मैं सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी से कहना चाहूंगा कि वे केंद्र सरकार के कानूनों के हिसाब से न चलें, उसे अपना संविधान खुद तैयार करना चाहिए. 

23 फरवरी 2022- खालिस्तान की मांग को दबाने का काम इंदिरा गांधी भी कर चुकी हैं. खालिस्तान की आवाज दबाने वाली इंदिरा का हस्र पूरी दुनिया ने देखा. हमें कोई भी नहीं रोक सकता, फिर चाहे वह पीएम मोदी हो, अमित शाह या भगवंत मान

अमृतपाल सिंह की तुलना भिंडरावाले से क्यों हो रही?
अमृतसर जिले के जल्लूपुर खेड़ा गांव के रहने अमृतपाल की तुलना पंजाब में मशहूर खालिस्तानी समर्थक जरनैल सिंह भिंडरावाले से होती है. 18 साल की उम्र में अमृतपाल काम करने के लिए दुबई चला गया. 2022 में वह भारत वापस लौटा, जिसके बाद उसने वारिस पंजाब दे को ज्वॉइन कर लिया.

रिपोर्ट के मुताबिक अमृतपाल 12वीं तक की पढ़ाई की है. भिंडरावाले और खालिस्तान आंदोलन के बारे में यूट्यूब और इंटरनेट से उसने जानकारी हासिल की है. इसी जानकारी के आधार पर अमृतपाल पंजाब में युवाओं को खालिस्तान के लिए प्रेरित करता है.

अमृतपाल भिंडरावाले को अपना गुरु मानता है और उसी की तरह माथे पर भारी-भरकम पगड़ी पहनता है. अमृतपाल के हर सभा में भिंडरावाले की तरह ही राज करेगा खालसा का नारा गूंजता है. वो बातचीत करने से लेकर भाषण देने तक की शैली को नकल करता है.

एक इंटरव्यू में अमृतपाल ने बताया कि देश में सिखों का नरसंहार हुआ है, लेकिन कोई इस पर बात नहीं करना चाहता है. मैं अगर बोलता हूं तो लोग इसे साजिश बताते हैं. मैं अपनी बात मजबूती से लोगों के बीच रखूंगा. 

इंजीनियरिंग की पढ़ाई, करीबी दोस्त से शादी 
12वीं पास अमृतपाल ने कुछ साल तक इंजीनियरिंग की भी पढ़ाई की है. हालांकि, पढ़ाई में मन नहीं लगने के बाद उसने बीच सेमेस्टर से ही कोर्स छोड़कर दुबई कमाने चला गया. एक इंटरव्यू में उसने बताया कि मैंने दुबई में बड़ी-बड़ी इमारतें नहीं देखी. वहां काम किया और पंथ के बारे में जानकारी ली.

इसी साल 10 फरवरी को अमृतपाल की शादी उनके करीबी दोस्त किरणदीप कौर से हुई है. जगह बदलने की वजह से अमृतपाल की शादी पंजाब में सुर्खियों में आया था. किरणदीप अमृतपाल के पुराने और करीबी दोस्त हैं. एक इंटरव्यू में अमृतपाल ने बताया कि मैं पर्सनल लाइफ को मीडिया में नहीं ले जाना चाहता हूं.

पंजाब में खालिस्तान का बवाल क्या है?
1929 में मास्टर तारा सिंह ने पंजाब को अलग कर खालिस्तान देश बनाने की मांग की थी. इसको लेकर कई आंदोलन भी हुए. आजादी के बाद पंजाब 2 प्रांत में बंट गया. एक हिस्सा गया पाकिस्तान में और दूसरा हिस्सा आया भारत में.

सिख आंदोलनकारी दोनों पंजाब को एकजुट कर इसे खालिस्तान बनाने की मांग करने लगे. खालिस्तान आंदोलन 1970 के दशक में जोर पकड़ लिया. 1966 में इंदिरा गांधी ने अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए सिखों के लिए एक अलग राज्य पंजाब बना दिया. यह हरियाणा और चंडीगढ़ से अलग होकर बना. चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा का राजधानी बनाया गया.

1966 में अकाली दल ने पंजाब को और अधिक अधिकार देने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू किया. धीरे-धीरे यह प्रदर्शन हिंसा का रूप ले लिया. पंजाब में इसके बाद आया धार्मिक नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले.

भारत में खालिस्तान को लेकर 1980 के दशक में हिंसा तेज हुई. जरनैल सिंह भिंडरावाले ने खुले तौर पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. हालांकि, बाद में ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत सेना ने उसकी हत्या कर दी. भिंडरावाले की हत्या के बाद खूब बवाल मचा, लेकिन सरकार की सख्ती के बाद आंदोलन शांत हो गया.

एक्शन ले चुकी है केंद्र सरकार
अमृतपाल सिंह पर केंद्र सरकार अब तक 2 बड़ा एक्शन ले चुकी है. पहला, अक्टूबर में अमृतपाल सिंह का ट्विटर अकाउंट डिलीट कर दिया गया. इस अकाउंट पर 11 हजार फॉलोअर्स थे. दिसंबर में सरकार ने अमृतपाल के इंस्टाग्राम अकाउंट को भी ब्लॉक कर दिया.

सरकारी खुफिया एजेंसी ने पिछले महीने पंजाब सरकार को अलर्ट भी जारी किया था. एजेंसी का कहना था कि अमृतपाल की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाए. वरना पंजाब में बड़ी घटना हो सकती है.

खुले में घूम रहा है अमृतपाल, किसका वरदहस्त?
गृह मंत्री को धमकी देने, थाने में धावा बोलने और अपहरण के कई मामलों के आरोपी अमृतपाल खुले में घूम रहा है. लगातार भड़काऊ बयान भी देता है. इसके बावजूद उस पर कोई कार्रवाई अब तक नहीं हुई है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन सी शक्ति अमृतपाल के पीछे खड़ी है?

वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा ओपिनियन में बताते हैं पंजाब में शांत पड़े खालिस्तान आंदोलन को भड़काने के पीछे पाकिस्तान का हाथ है. पिछले कुछ महीनों में वहां आरपीजी और ड्रोन का अटैक हुआ है, जो पाकिस्तान का ही था. खुफिया रिपोर्ट में भी इसका जिक्र किया गया है.

पिछले साल संगरूर में हुए लोकसभा उपचुनाव में जब सिमरनजीत सिंह मान चुनाव जीते, उस वक्त से भी माना जा रहा था कि खालिस्तान आंदोलन फिर तेज होगा. मान पूर्व पुलिस अधिकारी रहे हैं और उन पर एसएसपी रहने के दौरान खालिस्तान उग्रवादियों के लिए हथियार सप्लाई में सहयोग करने का आरोप लगा था. 

पंजाब में जब ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हुआ तो मान ने आईपीएस पद से इस्तीफा दे दिया. सितंबर में अमृतपाल समर्थकों के साथ जब भिंडरावाले के गांव गए थे, तो उस वक्त मान भी उनके साथ थे. 

पुलिस उन पर कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रही है? इस सवाल के जवाब में शर्मा कहते हैं- सिख आंदोलन के उग्र इतिहास को देखते हुए पुलिस अभी मामले में सीधा दखल देने से बच रही है. 1983 में भी पंजाब की सरकार ऐसा नहीं कर पा रही थी, जिसके बाद इंदिरा गांधी ने पंजाब की सरकार को भंग कर दिया था. 

केंद्र की दखल के बाद पंजाब के अमृतसर में सेना बुलाई गई थी. सेना ने 6 जून 1983 को भिंडरावाले को मार गिराया था. 

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