पंजाब की राजनीति में जातीय समीकरणों की नई जंग, हर वर्ग को साधने की कोशिश में जुटे कांग्रेस, BJP, AAP
Punjab Assembly Election 2027: पंजाब में 2026–27 चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियों ने जाति आधारित राजनीति को तेज कर दिया है. पार्टियों की नजर जाट सिख, OBC, अनुसूचित जातियां (SC) पर है.

- पंजाब में सभी दल जातिगत समीकरण साधने में जुटे.
- भाजपा 'हिंदू पार्टी' छवि बदल जाट सिखों को साध रही.
- अकाली दल और कांग्रेस पारंपरिक जनाधार मजबूत करने में लगे.
- आप कल्याण बोर्डों द्वारा समुदायों से सीधा संपर्क कर रही.
पंजाब में 2026–27 चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियों ने जाति आधारित राजनीति को तेज कर दिया है. आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD), बीजेपी और कांग्रेस चारों ही अलग-अलग समुदायों को साधने में जुट गए हैं.
ये चारों पार्टियां अपने पारंपरिक जनाधार को बचाने के साथ-साथ एक जातीय समीकरण बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं. इन पार्टियों की नजर जाट सिख, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जातियां (SC) के अलावा व्यापारी, महिला और युवा वर्ग पर है.
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बीजेपी 'हिंदू पार्टी' वाली छवि को बदलने में जुटी
पंजाब की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी लगभग 57 प्रतिशत है, जबकि हिंदू लगभग 38 प्रतिशत हैं. दशकों तक पंजाब में बीजेपी को मुख्य रूप से शहरी हिंदू वोटरों का ही समर्थन मिलता रहा है. हाल ही में बीजेपी ने सिख जाट नेता केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का राज्याध्यक्ष बनाया है. बीजेपी का यह कदम पंजाब में उसकी 'हिंदू पार्टी' वाली छवि को बदलने और सिख वोटरों, खासकर प्रभावशाली जाट सिख समुदाय के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के तौर पर देख जा रहा है. इसके अलावा बीजेपी ओबीसी, सैनी तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बीच लगातार कोई न कोई कार्यक्रम या संवाद के जरिए पैठ बनाने का प्रयास कर रही है.
ऐसा लगता है जैसे बीजेपी की नजर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण पंजाब के मालवा, दोआबा और माझा पर है. केवल सिंह ढिल्लों मालवा इलाके से आते हैं, जहां पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें हैं. माझा इलाके में 25 सीटें, जबकि दोआबा में 23 सीटें हैं. मालवा इलाके में केवल सिंह ढिल्लों, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे जाट सिख नेताओं के जरिए बीजेपी जाट वोटरों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने में लगी है. इसके अलावा दलित वोटबैंक को साधने के लिए बीजेपी के पास पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री सोम प्रकाश और पूर्व मुख्य संसदीय सचिव अविनाश चंदर जैसे नेता हैं.
अकाली दल सत्ता की क्या है रणनीति
पंजाब की राजनीति पारंपरिक रूप से जाट सिख प्रभुत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है. अकाली दल का मुख्य समर्थन आधार प्रदेश में जाट सिख, पंथ सिख रहा है. वहीं, कांग्रेस का समर्थन आधार जाट सिख, दलित और कुछ हिंदूओं का समर्थन रहा है. साल 2022 में AAP के सत्ता में आने के बाद से इन पार्टियों के समर्थन आधार में सेंध लगी है. अकाली दल एक बार फिर से अपना पारंपरिक वोट वापस पाने में लगी है. हालांकि, SAD अपने वोट आधार से हटकर पहले 70 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में एससी-बीसी, महिला और युथ विंग को सक्रिय कर चुकी है. इसके अलावा SAD ने 67 विघानसभा क्षेत्रों में व्यापार विंग के 67 विभिन्न विधानसभा हलकों के हलका प्रधानों की नियुक्ति की है. इस तरह ये पार्टी शहरी और गैर-पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के प्रयासों में हैं.
कांग्रेस हर स्तर पर पार्टी के समर्थन को मजबूत करने में जुटी
वहीं, कांग्रेस पार्टी दलित और जाट सिखों के समर्थन को वापस पाने में लगी है. पार्टी की मजबूती के लिए कांग्रेस जिला स्तर पर नियुक्तियों में विभिन्न सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दे रही है. इसके जरिए पार्टी उन वर्गों में अपनी पकड़ को मजबूत करेगी जहां उसका जनाधार कमजोर था. इसके अलावा कांग्रेस अपने एससी विभाग, ओबीसी विभाग, किसान कांग्रेस, महिला कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और व्यापार प्रकोष्ठ को सक्रिय कर रही है ताकि हर स्तर पर अपने समर्थन को मजबूत कर सके.
AAP ने बनाए कल्याण बोर्ड
AAP का फोकस सत्ता में बने रहने और सत्त विरोधी लहर को तोड़ना है. साल 2022 में AAP की जीत में दलित वर्ग, ग्रामीण मालवा क्षेत्र और जाट सिख किसानों की भूमिका रही थी. AAP विभिन्न समुदायों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए जिला और विधानसभा स्तर पर कल्याण बोर्ड का गठन कर रही है. प्रदेश सरकार पहले ही 21 राज्य स्तरीय कल्याण बोर्ड बना चुकी है. इसके जरिए विभिन्न समुदायों से सीधे बातचीत की जाएगी और उनसे सरकार के कामों को लेकर फीडबैक लिया जाएगा. इसके जरिए पार्टी सत्त विरोध लहर की काट तैयार करेगी.
कुल मिलाकर हर पार्टी अपने-अपने स्तर पर तैयारियां कर रही है और विभिन्न समुदायों को साधने में लगी है. हालांकि, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही साफ हो सकेगा की कौन सी पार्टी अपनी रणनीतियों और तैयारियों में सफल होगी.























