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Maharashtra: ‘निर्विरोध’ जीत के नाम पर सत्ताधारी दलों पर उठे सवाल, नगरपालिका चुनावों में लोकतंत्र शर्मसार!

Maharashtra News: नगरपालिका चुनावों में बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत ने लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं. विपक्ष का आरोप है कि पैसे, दबाव और सत्ता के दुरुपयोग से उम्मीदवारों को मैदान से हटाया गया.

महाराष्ट्र में चल रहे नगरपालिका चुनावों को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है. अलग-अलग नगरपालिकाओं में करीब 70 नगरसेवक निर्विरोध चुने गए हैं और आरोप है कि ये सभी सत्ताधारी खेमे से जुड़े हैं. विपक्ष का कहना है कि यह सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र में आई एक खतरनाक विकृति है. चुनाव मैदान में मुकाबला होने के बजाय उम्मीदवारों को पैसे और दबाव के जरिए हटाया गया, ताकि जीत ‘निर्विरोध’ दिखाई दे.

कल्याण-डोंबिवली, ठाणे, जलगांव, पनवेल, भिवंडी और धुले जैसे शहरों में निर्विरोध जीत पर सवाल खड़े हुए हैं. आरोप है कि कई जगहों पर विरोधी उम्मीदवारों को नामांकन वापस लेने के लिए करोड़ों रुपये तक दिए गए. कहीं 5 से 8 करोड़, कहीं 3 करोड़, तो कहीं 20–30 लाख तक की रकम की चर्चा है. विपक्ष का दावा है कि यह सब खुलेआम हुआ और उम्मीदवारों के पीछे खड़ी पार्टियों की औपचारिक अनुमति तक नहीं ली गई.

बीजेपी पर दोहरे रवैया का आरोप

'सामना' के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी पर दोहरे रवैया के आरोप लगे है. 2018 में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस द्वारा बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत पर भाजपा ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया था.

तब आरोप लगे थे कि नामांकन से रोका गया, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हुआ और चुनाव आयोग ने आंख मूंद ली. आज वही तरीके महाराष्ट्र में अपनाए जाने का आरोप लग रहा है, फर्क बस इतना बताया जा रहा है कि तब भाजपा विपक्ष में थी और अब सत्ता में है.

उस वक्त भाजपा इस मुद्दे को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची थी. अदालत ने हजारों ग्राम पंचायत सीटों पर निर्विरोध चुनाव पर आश्चर्य जताया था. अब सवाल उठ रहा है कि अगर वही स्थिति महाराष्ट्र में बन रही है, तो क्या इसे भी लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक नहीं माना जाना चाहिए?

‘नोटा’ का विकल्प भी मौजूद

कानूनन हर चुनाव में ‘नोटा’ यानी None of The Above का विकल्प होता है. इसका मतलब है कि मतदाता किसी भी उम्मीदवार को स्वीकार न करे. आलोचकों का कहना है कि जब नोटा का विकल्प मौजूद है, तो चुनाव पूरी तरह निर्विरोध कैसे माना जा सकता है? अगर नोटा को बड़ी संख्या में वोट मिलते हैं, तो चुनाव दोबारा कराना पड़ सकता है. ऐसे में दावा किया जा रहा है कि इन निर्विरोध घोषित सीटों पर भी वास्तविक मतदान होना चाहिए.

मतदाताओं के अपमान आरोप

विपक्ष का आरोप है कि बिना वोट डाले जीत दर्ज करना मतदाताओं का सीधा अपमान है. उनका कहना है कि यह जनता के भरोसे के साथ धोखाधड़ी है. कुछ जगहों पर तकनीकी कारणों से निर्विरोध चुनाव संभव हो सकते हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर ऐसा होना सामान्य नहीं माना जा सकता.

चुनाव आयोग, पुलिस प्रशासन और पूरी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. आरोप है कि पैसे की बारिश में न सिर्फ उम्मीदवार, बल्कि कहीं-कहीं मतदाता भी बह गए. इसे लोकतंत्र का ‘माफियाकरण’ बताया जा रहा है, जहां वोट से नहीं, बल्कि धन और दबाव से जीत तय हो रही है.

महाराष्ट्र की छवि पर असर

इस तरह की घटनाएं महाराष्ट्र की राजनीतिक प्रतिष्ठा और नैतिकता पर गहरा असर डालती हैं. अगर चुनाव से पहले ही जीत खरीद ली जाए, तो चुनाव प्रक्रिया का मतलब ही क्या रह जाता है? सवाल यह भी है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाएगा, या व्यवस्था इस पर गंभीरता से आत्ममंथन करेगी. 

नम्रता अरविंद दुबे 10 वर्षों से अधिक समय से टीवी पत्रकारिता में विभिन्न मुद्दों को कवर कर रही हैं. वर्तमान में ABP न्यूज़ में बतौर संवाददाता कार्यरत हैं.

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