महाराष्ट्र में दक्षिण तक आकर बीच में क्यों रुक गया मानसून? बारिश में आई 40 फीसदी, जानें कारण
Monsoon 2026: मानसून की गति में ब्रेक के कारण देशभर में बारिश में 41 प्रतिशत की कमी आई है, जो सामन्य से काफई कम है. IMD के अनुसार, देशभर में 4 जून से 18 जीन के बीच केवल 42.6 मिलीमीटर ही बारिश हुई है.

- MJO कमजोर, एल नीनो भी मॉनसून की गति में बाधक.
भीषण गर्मी के बाद लोगों को मानसून का बेसब्री से इंतजार रहता है. इस बार हालात ऐसे हैं कि मानसून शुरू तो हुआ, लेकिन वो इतना कमजोर है कि महाराष्ट्र के दक्षिण हिस्सों में आकर रुक गया है. हालांकि, 24 से 25 जून तक मॉनसून के फिर से एक्टिव होने की संभावना हैं. मानसून 8 जून को साउथ कोंकण और उससे सटे साउथ मध्य महाराष्ट्र में प्रवेश किया था. 10 से 15 जून के बीच राज्य के अधिकतर हिस्सों में बारिश शुरू होने की उम्मीद थी, लेकिन 18 जून तक मानसून कोंकण बेल्ट में रुका हुआ है.
मानसून की गति में इस ब्रेक के कारण देशभर में बारिश में 41 प्रतिशत की कमी आई है, जो सामन्य से काफई कम है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, देशभर में 4 जून से 18 जीन के बीच केवल 42.6 मिलीमीटर ही बारिश हुई है, जोकि सामान्य 72.2 मिलीमीटर से काफी कम है. ऐसे में सबके मन में एक ही सवाल है कि आखिर ये मानसून में ब्रेक क्यों आ गया है? मानसून आगे क्यों नहीं बढ़ रहा? इन सवालों के जवाब खुद मौसम विभाग ने दिया है बताया कि मानसून की गति धीमी होने के पीछे पांच मुख्य बड़े कारण हैं.
मानसून पर अचानक ब्रेक! आखिर सैटेलाइट में बादल कहां गायब हो गए?
पहला कारण- अरब सागर से आ रही हवाओं की गति में कमी
मौसम विभाग के अनुसार, पहला कारण अरब सागर से उठने वाली कमजोर मानसूनी हवाएं हैं. मानसून की बारिश के लिए अरब सागर से नमी वाली तेज हवाएं काफी आवश्यक होती हैं. ये हवाएं जितनी तेज और मजबूत होती हैं, भारत तक उतनी तेजी से पहुंचती हैं. इससे वातावरण में नमी बढ़ती है और बादल बनते हैं, जिससे बारिश की संभावना बढ़ती है. फिलहाल ये मानसूनी हवाएं काफी कमजोर हैं, जिस कारण मानसून की गति धीमी हो गई है और बारिश भी कम हो रही है.
दूसरा कारण- कमजोर दक्षिणी-पश्चिमी निचली हवाएं
मानसून के प्रवाह के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा से आने वाली हवाओं की भूमिका काफी अहम होती हैं. ये हवाएं समुद्र से नमी उठाकर महाराष्ट्र और बाकी इलाकों तक लाती हैं, लेकिन ये अभी कमजोर पड़ गई हैं, जिससे महाराष्ट्र के तट और अंदरूनी इलाकों की ओर नमी का बहाव कम हुआ है.
तीसरा कारण- भूमध्य रेखा को पार करने वाली हवाओं
मानसून के समय पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर के ऊपर से कुछ हवाएं उठती हैं, जो अपने साथ बहुत सारी नमी (जलवाष्प) ले लेती है. ये हवाएं भूमध्य रेखा पार कर भारत के अंदर प्रवेश करती हैं और दक्षिण-पश्चिम मानसून का हिस्सा बनती हैं. एक तरह से ये हवाएं दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए नमी का स्रोत होती हैं, जो सामान्य तौर पर तेज और मजबूत होती हैं. इस बार ये हवाएं कमजोर हैं, जिस कारण नमी को नहीं उठा पा रहीं हैं. इस कारण नमी वाली हवाएं भारत तक नहीं पहुंच पा रहीं, जिससे मानसून के प्रवाह पर असर पड़ रहा है.
चौथा कारण- कम दबाव का क्षेत्र न बनना
मानसून केवल हवाओं से नहीं चलता, बल्कि उसे आगे बढ़ाने के लिए कम दबाव का क्षेत्र बनना या चक्रवाती परिसंचरण की भी आवश्यक होती है. आसान भाषा में समझें, जब किसी क्षेत्र में हवा गर्म होकर ऊपर उठती है तो वहीं नीचे की तरफ कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है, जिसे आसपास की हवाएं भरती हैं. ये हवाएं अगर समुद्र से आईं तो अपने साथ नमी लाती हैं, जिससे बादल बनेंगे और बारिश होगी. इस तरह ये प्रक्रिया लगातार होती रहती है, जिससे मानसून की बारिश जारी रहती है.
वर्तमान में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ही जगहों पर ऐसा कोई मजबूत सिस्टम नहीं बना है. इसके अलावा भारत के पश्चिमी तट (केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र) के पास अरब सागर में एक लंबी कम दबाव वाली पट्टी (ऑफशोर ट्रफ) नहीं बना है, जिससे मानसून की रफ्तार पर सीधा असर पड़ा है.
पांचवां कारण- मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) का कमजोर पड़ना
इन सभी कारणों के अलावा ‘मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन’ (MJO) का कमजोर दौर भी मानसून की रफ्तार को प्रभावित कर रहा है. MJO हवा, बादलों और बारिश का एक बैंड होता है जो भूमध्य रेखा के आसपास पश्चिम से पूर्व की ओर धीरे-धीरे घूमता रहता है. ये यदि भारत के लिए अनुकूल स्थिति में हो तो बादल भी बनते हैं और बारिश भी होती है, लेकिन वर्तमान में कमजोर है या भारत के फेवर में नहीं है, जिससे मानसून को बूस्ट नहीं मिल पा रहा. एक तरह से यदि MJO सक्रिय होता तो मानसून को बूस्ट मिलता और मानसून की हवाएं इन बादलों को उत्तर की ओर ले जातीं है, जिससे बारिश होती है.
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रशांत महासागर में एल नीनो के लिए बने हालात और वेस्टर्न जेट स्ट्रीम के सामान्य से ज्यादा दक्षिण की ओर बढ़ने से मानसून को तेज करने वाली हवाओं पर असर पड़ा है. इससे मानसून की गति धीमी हो गई है.
बता दें कि वेस्टर्न जेट स्ट्रीम ऊपरी ट्रोपोस्फीयर (क्षोभमंडल) में बहने वाली तेज हवाओं का बैंड है, जो पश्चिम से पूर्व की ओर अक्सर 150 किमी/घंटा से ज्यादा की गति से बहती है. इसकी गति 100–300 किमी/घंटा या उससे अधिक भी हो सकती है. ध्रुवीय और उष्णकटिबंधीय हवा के तापमान में अंतर के कारण चलने वाली ये हवाएं मौसम प्रणालियों को दिशा देती हैं.
























