'1500 रुपये याद रखना, वोट देते समय वफादार रहना', महाराष्ट्र मंत्री जयकुमार गोरे का बयान
Maharashtra Nikay Chunav: महाराष्ट्र के मंत्री जयकुमार गोरे ने 'माझी लाड़की बहिन योजना' की लाभार्थी महिलाओं से आगामी नगर निकाय चुनावों में देवेंद्र फडणवीस को वोट देने की अपील की.

महाराष्ट्र के मंत्री और बीजेपी नेता जयकुमार गोरे ने मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना की लाभार्थी महिलाओं से आगामी नगर निकाय चुनावों में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के प्रति वफादार रहने का आग्रह किया और कहा कि यहां तक उनके पति भी उन्हें सौ रुपये नहीं देते होंगे.
राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री ने शनिवार को सोलापुर जिले में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए महिलाओं से अनुरोध किया कि जो भी उन्हें पैसे दे, उन्हें ले लें, लेकिन यह याद रखें कि योजना के तहत उनके बैंक खातों में प्रतिमाह 1,500 रुपये डाले जा रहे हैं.
उन्होंने सभा में महिलाओं से कहा, “आपको अपने पतियों से 100 रुपये भी नहीं मिलते होंगे. देवभाऊ (फडणवीस) लाडकी बहिन योजना लेकर आए और आपको 1,500 रुपये दिए. अगर वह सत्ता में न रहे तो आपके खातों में पैसे आने बंद हो जाएंगे.”
दो दिसंबर को होंगे नगरपालिका परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव
महाराष्ट्र में 246 नगरपालिका परिषदों और 42 नगर पंचायतों के चुनाव दो दिसंबर को होंगे, और मतगणना तीन दिसंबर को की जाएगी. 1.07 करोड़ से अधिक मतदाता 6,859 नगरपालिका सदस्यों और 288 अध्यक्षों का चुनाव करेंगे.
गोरे ने कहा, “किसी से भी पैसा ले लो; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन उन्हें वोट मत देना. जब आप वोट डालो, तो देवाभाऊ की ओर से मिलने वाले 1,500 रुपये मत भूलना. वफादार रहना.” उन्होंने कहा, “यहां तक कि भाई भी, जब अपनी बहनों को राखी के मौके पर पैसे देते हैं, तो अपनी पत्नियों से अनुमति लेते हैं.”
मंत्री ने कहा कि सत्तारूढ़ ‘महायुति’ में शामिल दलों का दावा है कि खजाने की चाबी उनके पास है, हालांकि अंतिम निर्णय भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर निर्भर करता है.
'खड़े होते हैं सवाल'
हालांकि, मंत्री के इस बयान ने विपक्षी दलों को आलोचना का मौका दे दिया है. विपक्षी नेताओं ने इसे सरकारी योजना का राजनीतिकरण और मतदाताओं को प्रलोभन देने की कोशिश करार दिया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी सरकारी कल्याणकारी योजना के लाभार्थियों को सीधे किसी राजनीतिक दल के प्रति वफादारी दिखाने के लिए कहना, चुनावी नैतिकता और आदर्श आचार संहिता के दायरे में सवाल खड़े करता है, जिस पर चुनाव आयोग से संज्ञान लेने की मांग की जा सकती है.























