Xप्लेन: भारत में शादी के लिए लड़कियों की कितनी कमी, जो जान दे रहे मर्द?
Unmarried Indian Men's: UNFPA की ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन’ रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में 2030 तक 30 से 40 मिलियन (3-4 करोड़) पुरुष 'विवाह बाजार' से बाहर रह जाएंगे.

भारत के कई राज्यों में शादी लायक लड़कियों की भारी कमी समाज की परेशानी बन चुकी है. यह सिर्फ एक भावनात्मक मुद्दा नहीं है, बल्कि सरकारी आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स इसकी गंभीरता को साबित करती हैं. महाराष्ट्र के जलगांव जिले से लेकर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान तक, हजारों गांवों में युवा दूल्हा ढूंढने पर मजबूर हैं क्योंकि दुल्हनें हैं ही नहीं. जब दुल्हन नहीं मिल पाती तो एक ही रास्ता बचता है- आत्महत्या. तो आइए इस मुद्दे को पूरी गहराई और आंकड़ों के साथ समझते हैं...
लड़की न मिलने की वजह से 29 आत्महत्याएं
जलगांव पुलिस ने 1 जनवरी से 30 जून 2026 के बीच हुई आत्महत्याओं का डेटा जारी किया है और आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. सिर्फ छह महीनों में जिले में कुल 431 लोगों ने आत्महत्या की. इनमें 383 पुरुष और 8 नाबालिग लड़के शामिल हैं, जबकि महिलाओं की संख्या 29 और नाबालिग लड़कियों की संख्या 11 रही. यानी, पुरुषों में आत्महत्या की दर महिलाओं की तुलना में दस गुना ज्यादा है.
जब पुलिस ने पुरुषों की आत्महत्याओं की वजह खंगाली, तो सबसे चौंकाने वाला कारण सामने आया. 29 युवाओं ने शादी के लिए रिश्ता न मिल पाने या शादी की बात न बन पाने के कारण आत्महत्या की. बाकी कारणों में 90 ने शराब की लत, 74 ने डिप्रेशन, 64 ने पारिवारिक झगड़े, 52 ने कर्ज और 44 ने बीमारी को वजह बताया.
जलगांव की जमीनी हकीकत: जहां 100 लड़कों पर सिर्फ 84 लड़कियां
जलगांव जिले के ग्रामीण इलाकों में एक अनोखी चुप्पी पसरी है. यह चुप्पी उन हजारों युवाओं की है जो उम्र के 30 से 35 साल के पड़ाव पर पहुंच गए हैं, लेकिन दुल्हन न होने की वजह से घर बसाने का सपना अधूरा है. हाल ही में मीडिया रिपोर्टों में जलगांव के चोपड़ा, भड़गांव और जामनेर जैसे इलाकों का जिक्र हुआ, जहां कुछ गांवों में 40 से ज्यादा कुंआरे युवक मौजूद हैं. इनमें से कई ऐसे हैं जो खेती-मजदूरी करते हैं और इतने सक्षम नहीं हैं कि दूसरे राज्य से दुल्हन लाने का खर्च उठा सकें.
जलगांव के इस संकट की जड़ 2011 की जनगणना में छिपी है. इस जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, जिले के कोर 0-6 वर्ष के बाल लिंगानुपात (चाइल्ड सेक्स रेशियो) में भारी गिरावट दर्ज की गई थी. जलगांव जिले का बाल लिंगानुपात 842 लड़कियां प्रति 1000 लड़के था. जो बच्चियां उस दौर में पैदा ही नहीं हुईं, वे आज शादी की उम्र में पहुंचने वाली थीं.
यही वजह है कि अब शादी की उम्र में लिंगानुपात का असंतुलन जमीन पर इस कदर दिख रहा है. स्थानीय समाजसेवियों की मानें तो दहेज की मांग बढ़ गई है और अंतरराज्यीय दुल्हन तस्करी के मामले भी सामने आए हैं.
हरियाणा और पंजाब का हाल: जहां 'मोलकी' दुल्हन का चलन आम
अगर जलगांव इस समस्या का ताजा उदाहरण है, तो हरियाणा इसकी पुरानी और गहरी जड़ है. हरियाणा के 'रंडा यूनियन' और अन्य अविवाहित संघों में कुल मिलाकर 1.25 लाख पंजीकृत सदस्य हैं. इन संघों के मुताबिक, हरियाणा में 40 वर्ष से अधिक आयु के अविवाहित और विधुर पुरुषों की अनुमानित आबादी 7 लाख है. यानी इतने सारे युवा हैं जिन्हें जीवन में जीवनसाथी नहीं मिल पाया.
हरियाणा राज्य दशकों से लिंगानुपात के मामले में देश का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य रहा है. इसका नतीजा यह हुआ है कि यहां दुल्हनों का अकाल पड़ गया है. अविवाहित पुरुषों का डेटा:
- भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के कराए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) की रिपोर्ट हमें चौंकाने वाला डेटा देती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा में 15-49 वर्ष की आयु के पुरुषों में विवाहित होने का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से काफी कम है.
- NFHS-5 के मुताबिक, हरियाणा में इस आयु वर्ग के 28.8% पुरुष कभी शादीशुदा नहीं रहे (नेवर मैरिड), जबकि महिलाओं में यह दर सिर्फ 14.6% है. इससे साफ पता चलता है कि राज्य में पुरुषों का एक बड़ा हिस्सा दुल्हन न होने की वजह से अविवाहित जिंदगी जी रहा है.
बाल लिंगानुपात का भयावह इतिहास:
- भारत की जनगणना 2011 के मुताबिक, हरियाणा का बाल लिंगानुपात 834 था, जो उस समय देश में सबसे खराब था. झज्जर जिले का बाल लिंगानुपात तो 774 लड़कियां प्रति 1000 लड़के था. महेंद्रगढ़ (778) और रेवाड़ी (784) जैसे जिलों की स्थिति भी भयावह थी. 2011 में जन्मे ये बच्चे अब किशोरावस्था में हैं. आने वाले 10-15 सालों में जब ये शादी के लायक होंगे, तब स्थिति और भयावह होने की आशंका है.
- पड़ोसी राज्य पंजाब में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है. NFHS-5 के मुताबिक, पंजाब में 15-49 आयु वर्ग के 31.7% पुरुष कभी शादीशुदा नहीं रहे, जो हरियाणा से भी ज्यादा है. इसकी बड़ी वजह जनगणना 2011 में दर्ज पंजाब का बाल लिंगानुपात है, जो 846 था.
अनुमानों पर नहीं, देश के आंकड़ों पर डालें नजर
यह समस्या सिर्फ हरियाणा या महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है. सरकारी आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से पूरे देश के हालात की गंभीर तस्वीर सामने आती है:
1. प्रोजेक्टेड डेटा में विवाह बाजार सूना
2022 में छपी प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में बताया कि धार्मिक आधार पर लिंगानुपात में असंतुलन भारत में एक बड़ी समस्या है. इस रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन’ रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में 2030 तक 30 से 40 मिलियन (3-4 करोड़) पुरुष 'विवाह बाजार' से बाहर रह जाएंगे. यह संख्या दुनिया के किसी भी देश में सबसे ज्यादा है.
2. लिंगानुपात में सुधार, लेकिन असर बाकी
NFHS-5 (2019-21) की रिपोर्ट निश्चित तौर पर उम्मीद जगाती है. इस रिपोर्ट ने पुष्टि की कि भारत में पहली बार जन्म के समय लिंगानुपात सामान्य हुआ है. हरियाणा का लिंगानुपात सुधरकर 916 प्रति 1000 पुरुष पर पहुंच गया. लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह सुधार पिछले दशकों में हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता. जो 3-4 करोड़ लड़कियां 'गायब' हैं, वे कभी वापस नहीं आएंगी और यही वजह है कि जलगांव और हरियाणा जैसे इलाकों में आज शादी का संकट गहराया हुआ है.
3. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-4 बनाम NFHS-5)
जहां NFHS-4 (2015-16) के दौरान राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों में लिंगानुपात चिंताजनक था, वहीं NFHS-5 में स्थिति में सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन यह सुधार एक समान नहीं है. ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में कन्या भ्रूण हत्या के मामले अभी भी सामने आते हैं. इसका सीधा असर आने वाले समय में इन क्षेत्रों के अविवाहित पुरुषों की संख्या पर पड़ना तय है.
नतीजा: सिर्फ अकेलापन नहीं, बल्कि सामाजिक बीमारियों की जड़
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि जब समाज के एक बड़े हिस्से के पुरुष शादी नहीं कर पाते, तो नतीजे बेहद खतरनाक होते हैं. हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 'मोलकी दुल्हन' यानी खरीदी गई दुल्हनों का बाजार इसी असंतुलन की वजह से फला-फूला है.
हर साल सैकड़ों लड़कियों को अवैध तरीके से गरीब राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम से लाकर इन इलाकों में बेच दिया जाता है. यूनाइटेड नेशंस (UN) की रिपोर्ट के मुताबिक, लिंगानुपात में असंतुलन का सीधा संबंध महिलाओं के खिलाफ हिंसा और तस्करी की घटनाओं में बढ़ोतरी से है.
क्या कहता है कानून और क्या हो रही है कोशिश?
इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 (PCPNDT कानून) को सख्ती से लागू करने का दावा किया है. 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं. NFHS-5 के सकारात्मक आंकड़े यह बताते हैं कि जागरूकता बढ़ी है और लिंग जांच पर कुछ हद तक लगाम लगी है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जनसांख्यिकीय क्षति पहले ही हो चुकी है.
जलगांव, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के हजारों गांवों में आज भी युवाओं की निगाहें उस दुल्हन के इंतजार में सड़कों पर टिकी रहती हैं, जो शायद कभी नहीं आएगी. यह संकट आने वाले कम से कम तीन दशकों तक भारतीय समाज को झकझोरता रहेगा.
























