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एनसीपी का नया बॉस कौन होगा, जानिए चुनाव आयोग किन तथ्यों को ध्यान रखकर करता है फैसला?

अजित पवार ने एनसीपी पर दावा ठोक दिया है, जिसके बाद शरद पवार दांव-पेंच की राजनीति में जुट गए हैं. संख्या को लेकर दोनों गुट दावा कर रहा है. ऐसे में सवाल है कि चुनाव आयोग किस आधार पर सिंबल आवंटित करेगा?

महाराष्ट्र में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के भीतर जारी सियासी जंग अब आर-पार में बदल गई है. बागी अजित पवार गुट ने चुनाव आयोग में एनसीपी पर दावा ठोक दिया है. अजित ने आयोग से एनसीपी का सिंबल और नाम मांगा है. इधर, शरद पवार ने अजित गुट को सजा भुगतने की चेतावनी दी है. 

वाई.वी चौहान में शरद पवार के शक्ति प्रदर्शन में एनसीपी के 53 में से 18 विधायक शामिल हुए. पवार गुट को जेल में बंद नवाब मलिक का भी समर्थन माना जा रहा है. पवार के समर्थन में विधायकों की लामबंदी ने कई समीकरण उलट-पुलट दिए हैं. 

अजित के दावे और शरद पवार के शक्ति प्रदर्शन ने एनसीपी के सिंबल और नाम को लेकर सस्पेंस बढ़ा दिया है. मुंबई से दिल्ली तक एक ही सवाल पूछा जा रहा है कि एनसीपी का सिंबल किसे मिलेगा? 

इस स्टोरी के जरिए समझते हैं कि एनसीपी के संविधान, चुनाव आयोग के नियम और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के जरिए एनसीपी पर किसका दावा मजबूत है?

एनसीपी सिंबल पर 2 बयान

1. शरद पवार- मेरे साथ जो भी लोग हैं, वो सिंबल की चिंता न करे.  हमें सत्ता में लाने वाले लोग और पार्टी कार्यकर्ता हमारे साथ हैं. मैं किसी को भी पार्टी का चुनाव चिन्‍ह छीनने नहीं दूंगा.

2. अजित पवार- आप 83 साल के हो गए हैं, अब रुक जाइए. पार्टी में नए नेतृत्व को आगे बढ़ने दीजिए. आप रिटायर होकर हम सबको आशीर्वाद दीजिए. शरद पवार मेरे लिए देवता सामान हैं.

1. एनसीपी के संविधान में क्या है?
1999 में गठन के वक्त एनसीपी का संविधान बनाया गया था. कांग्रेस से निकाले जाने के बाद शरद पवार ने खुद की पार्टी बनाई थी, इसलिए एनसीपी का संविधान में कांग्रेस से ही मिलता-जुलता है. पार्टी में राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी के पास सबसे ज्यादा पावर दिया गया है. 

एनसीपी संविधान के आर्टिकल-21 (3) के मुताबिक वर्किंग कमेटी कोई भी फैसला कर सकती है. साथ ही पार्टी के संविधान में बदलाव और मर्जर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार भी राष्ट्रीय कमेटी को दिया गया है. 


एनसीपी का नया बॉस कौन होगा, जानिए चुनाव आयोग किन तथ्यों को ध्यान रखकर करता है फैसला?

एनसीपी के संविधान के अनुसार कमेटी के दो तिहाई लोग संविधान बदल सकते हैं और मर्जर करने या कोई भी संवैधानिक फैसला ले सकते हैं. यानी कुल मिलाकर कहा जाए तो एनसीपी के संविधान में राष्ट्रीय कार्यसमिति को अधिक पावर दिया गया है. 

अजित पवार के बगावत की खबर आते ही शरद पवार ने पहली कार्रवाई कार्रवाई प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे को कार्यसमिति से हटाने का किया. इसके पीछे पार्टी पर कब्जे की रणनीति को दुरुस्त करना था. 

पवार ने तुरंत एनसीपी के संविधान में संशोधन किया और सारे फैसले राष्ट्रीय समिति के हवाले कर दिया. इतना ही नहीं, 6 जुलाई को दिल्ली में कार्यसमिति की बैठक कर अपने पक्ष में गोलबंदी भी कर ली. 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पवार के इन फैसलों की वजह से चुनाव आयोग में उनका पलड़ा भारी पड़ सकता है. 

2. चुनाव आयोग का नियम क्या है?
राजनीतिक दलों के बीच विवाद सुलझाने का जिम्मा चुनाव आयोग का है. द इलेक्शन सिंबल ऑर्डर, 1968 के तहत चुनाव आयोग विवादों को सुलझाने का काम करती है. द इलेक्शन सिंबल ऑर्डर, 1968 के आर्टिकल-15 में चुनाव चिह्न तय करने के बारे में जिक्र किया गया है. आइए इसे एक-एक कर समझते हैं.

- विवाद की स्थिति को सुलझाने के लिए सबसे पहले आयोग पार्टी के संविधान का सहारा लेती है. आयोग यह देखती है कि पार्टी का संगठन का चुनाव कितने लोकतांत्रिक तरीके से हुआ है. शिवसेना फैसले में आयोग ने इसका जिक्र भी किया था. 


एनसीपी का नया बॉस कौन होगा, जानिए चुनाव आयोग किन तथ्यों को ध्यान रखकर करता है फैसला?

- संगठन के पदों पर काबिज नेताओं की राय को आयोग सबसे पहले तरजीह देती है. अगर, इसमें अस्पष्टता रहती है तो फिर आयोग विधायक और सांसदों की संख्या के आधार पर फैसला देती है. दिव्य मराठी के मुताबिक अजित गुट ने 5000 और शरद गुट ने 3000 एफिडेविट अभी तक दाखिल किया है.

- विधायक और सांसदों की बात की जाए तो अजित के साथ 32 विधायक और 2 सांसद हैं, जबकि शरद के समर्थन में 18 विधायक और 7 सांसद हैं.

- चूंकि, सिंबल पर विवाद सुलझने में वक्त लग सकता है. ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में आयोग की ओर से एनसीपी के सिंबल को जब्त कर दोनों नेताओं को अस्थाई सिंबल दिया जा सकता है.

3. कोर्ट ने सिंबल विवाद को लेकर क्या कहा है?
1971-72 में सादिक अली बनाम चुनाव आयोग के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आयोग अपने अधिकार का उपयोग कर इस पर फैसला ले सकती है. कोर्ट ने कहा कि संगठन के बहुमत को पहले देखा जाना चाहिए. 

हाल में एआईएडीएमके विवाद में भी संगठन को तरजीह देते हुए पहले मद्रास हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पलानीस्वामी को पार्टी की कमान देने के पक्ष में फैसला दिया. इसके बाद पलानीस्वामी ने एआईएडीएमके के संविधान में बदलाव कर खुद पावरफुल हो गए.

शिवसेना विवाद में भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि विधायक दल और राजनीतिक दल में फर्क होता है. स्पीकर को राजनीतिक दल के व्हिप को मान्यता देनी चाहिए.

अजित की मुश्किलेंः विधायकी और सांसदी बचाना जरूरी
अजित गुट के पास अभी 32 विधायकों का समर्थन प्राप्त है. सभी की सदस्यता बचाए रखने के लिए 36 विधायकों की जरूरत है. अजित अगर 36 विधायकों की हस्ताक्षर वाली सूची विधानसभा स्पीकर के पास जमा नहीं करते हैं, तो उनकी सदस्यता खतरे में आ सकती है.

अजिक गुट के सांसदों पर भी संकट है. एनसीपी के लोकसभा में 5 सांसद हैं, जिसमें से अजित के समर्थन में सिर्फ एक सांसद सुनील तटकरे हैं. राज्यसभा के 4 में से 3 सांसद शरद पवार के साथ हैं.

शरद की मुश्किलेंः जिला स्तर के नेताओं को साधना
विधायकों की संख्या के मामले में शरद पवार पिछड़ चुके हैं. ऐसे में सिंबल बचाने के लिए उनके पास संगठन का ही सहारा है. वर्किंग कमेटी के अधिकांश सदस्य उनके साथ हैं, लेकिन जिला स्तर के नेताओं को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है.

संख्या के मामले में जिला स्तर के नेताओं को साधना सबसे अहम है. शिंदे ने जिला स्तर के नेताओं का एफिडेविट जमा कर ही शिवसेना पर कब्जे की लड़ाई जीत ली थी.

एनसीपी में अजित ने कैसे लिखी बगावत की पटकथा?
शिंदे सरकार में मंत्री छगन भुजबल के मुताबिक 2022 से ही बीजेपी के साथ जाने की रणनीति पर काम हो रहा था. कई बार शरद पवार के साथ भी इसको लेकर चर्चा की गई. शरद पवार ने इस पर फैसला लेने की बात भी कही. हालांकि, पवार इस पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं ले पाए.

इसी बीच अप्रैल 2023 में अजित पवार की ओर से 40 विधायकों से हस्ताक्षर की खबर मीडिया में आई. शरद पवार इसके बाद एक्टिव हुए और अजित को फटकार लगाई. बवाल मचने पर अजित ने सफाई दी और कहा कि शरद पवार का साथ नहीं छोड़ूंगा. 

मई में शरद पवार ने अचानक अपना इस्तीफा दे दिया. पवार ने नई पीढ़ी को सत्ता सौंपने की बात कही, लेकिन अजित छोड़ सभी नेता उनके समर्थन में आ गए. इसके बाद शरद पवार ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया.

शरद पवार ने इसके बाद अजित का पर काटना शुरू किया. पहले बेटी सुप्रिया को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया और फिर जयंत को प्रदेश अध्यक्ष से नहीं हटाने की बात कही. पवार के इस फैसले से अजित काफी नाराज हो गए और बगावत की ठान ली. 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रफुल्ल पटेल और दिलीप वलसे पाटिल ने बीजेपी-एनसीपी गठबंधन का खाका खिंचा. सबकुछ फाइनल होने के बाद अजित ने अपने सरकारी आवास देवगिरी पर विधायकों की मीटिंग बुलाई. मीटिंग से पहले सुप्रिया से अजित की मुलाकात हुई थी. 

शरद पवार और सुप्रिया सुले को लगा कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए अजित ने यह मीटिंग रखी है, जिसमें वे नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे देंगे, लेकिन मीटिंग के बाद अजित सीधे राजभवन पहुंच गए. अजित डिप्टी सीएम, जबकि 8 अन्य लोगों ने मंत्री पद की शपथ ली.

छगन भुजबल के मुताबिक 40 विधायकों का हस्ताक्षर वाला लेटर चुनाव आयोग को भेजा गया है. कानूनविदों से भी सलाह ली गई है और शरद पवार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी. भुजबल ने एक इंटरव्यू में कहा कि अजित के साथ अन्याय हुआ, इसलिए एनसीपी टूट गई है.

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